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Wednesday, May 6, 2026

भक्त माई पंजीरी जी

वृंदावन के पास एक गाँव में भोली-भाली माई ‘पंजीरी’ रहती थी।दूध बेच कर वह अपनी जीवन नैया चलाती थी। वह मदनमोहन जी की अनन्य भक्त थी। 
ठाकुर मदनमोहन लाल भी उससे बहुत प्रसन्न रहते थे। वे उसे स्वप्न में दर्शन देते और उससे कभी कुछ खाने को माँगते, कभी कुछ। पंजीरी उसी दिन ही उन्हें वह चीज बनाकर भेंट करती,
वह उनकी दूध की सेवा नित्य करती थी, सबसे पहले उनके लिए प्रसाद निकालती, रोज उनके दर्शन करने जाती और दूध दे आती।
लेकिन गरीब पंजीरी को चढ़ावे के बाद बचे दूध से इतने पैसे भी नहीं मिलते थे कि दो वक्त का खाना भी खा पाये, अतः कभी कभी मंदिर जाते समय यमुना जी से थोड़ा सा जल दूध में मिला लेती।
फिर लौटकर अपने प्रभुजी की अराधना में मस्त होकर बाकी समय अपनी कुटिया में बाल गोपाल जी के भजन कीर्तन करके बिताती।
कृष्ण कन्हैया जी तो अपने भक्तों की टोह में रहते ही हैं, नित नई लीला करते हैं।
एक दिन पंजीरी के सुंदर जीवन क्रम में भी रोड़ा आ गया। जल के साथ-साथ एक छोटी सी मछली भी दूध में आ गई और मदनमोहन जी के चढ़ावे में चली गई।
दूध डालते समय मंदिर के गोसाईं की दृष्टि पड़ गई। गोसाईं जी को बहुत गुस्सा आया, उन्होंने दूध वापस कर दिया,
पंजीरी को खूब डाँटा फटकारा और मंदिर में उसका प्रवेश निषेध कर दिया।
पंजीरी पर तो जैसे आसमान टूट पड़ा। रोती-बिलखती घर पहुँची-ठाकुरजी; मुझसे बड़ा अपराध हो गया, क्षमा करो, पानी तो रोज मिलाती हूँ, तुमसे कहाँ छिपा है,
ना मिलाओ तो गुजारा कैसे हो ? और उस बेचारी मछली का भी क्या दोष ? उस पर तो तुम्हारी कृपा हुई तो तुम्हारे पास तक पहुँची।
लेकिन प्रभुजी, तुमने तो आज तक कोई आपत्ति नहीं की, प्रेम से दूध पीते रहे, फिर ये गोसाईं कौन होता है मुझे रोकने वाला।
और मुझे ज़्यादा दुःख इसलिए है कि तुम्हारे मंदिर के गोसाईं ने मुझे इतनी खरी खोटी सुनाई और तुम कुछ नहीं बोले।
ठाकुर, यही मेरा अपराध है तो मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि तुम अगर रूठे रहोगे, मेरा चढ़ावा स्वीकार नहीं करोगे तो मैं भी अन्न-जल ग्रहण नहीं करुंगी,
यहीं प्राण त्याग दूंगी। भूखी प्यासी, रोते रोते शाम हो गई।
तभी पंजीरी के कानों में एक मधुर कंठ सुनाई दिया- माई ओ माई, उठी तो दरवाजे पर देखा कि एक अतिसुंदर किंतु थका-हारा सा एक किशोर कुटिया में झाँक रहा है।
कौन हो बेटा...?
मैया, बृजवासी ही हूँ, मदन मोहन के दर्शन करने आया हूँ। बड़ी भूख लगी है कुछ खाने का मिल जाए तो तुम्हारा बड़ा आभारी रहूँगा।
पंजीरी के शरीर में ममता की लहर दौड़ गई। कोई पूछने की बात है बेटा, घर तुम्हारा है।
ना जाने तुम कौन हो जिसने आते ही मुझ पर ऐसा जादू बिखेर दिया।
बड़ी दूर से आए हो क्या ? क्या खाओगे ? अभी जल्दी से बना दूँगी।
अरे मैया, इस समय क्या रसोई बनाओगी, थोड़ा सा दूध दे दो वही पी कर सो जाउँगा।
दूध की बात सुनते ही पंजीरी की आँखें डबडबा आयीं, फिर अपने आप को सँभालते हुए बोली-
बेटा, दूध तो है पर सवेरे का है, जरा ठहरो अभी गैया को सहला कर थोड़ा ताजा दूध दुह लेती हूँ।
अरे नहीं मैया, उसमें समय लगेगा। सवेरे का भूखा प्यासा हूँ, दूध का नाम लेकर तूने मुझे अधीर बना दिया है,
अरे वही सुबह का दे दो, तुम बाद में दुहती रहना।
डबडबायी आँखों से बोली... थोड़ा पानी मिला हुआ दूध है।
अरे मैया तुम मुझे भूखा मारोगी क्या ? जल्दी से दूध छान कर दे दो वर्ना मैं यहीं प्राण छोड़ दूंगा।
पंजीरी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये बालक कैसी बात कर रहा है, दौड़ी-दौड़ी गई और झटपट दूध दे दिया।
दूध पीकर बालक का चेहरा खिल उठा।
मैया, कितना स्वादिष्ट दूध है। तू तो यूँ ही ना जाने क्या-क्या बहाने बना रही थी,
अब तो मेरी आँखों में नींद भर आई है, अब मैं सो रहा हूँ, इतना कहकर वो वहीं सो गया।
पंजीरी को फ़ुर्सत हो गई तो दिन भर की थकान, दुःख और अवसाद ने उसे फिर घेर लिया।
जाड़े के दिन थे ,भूखे पेट उसकी आँखों में नींद कहाँ से आती। जाडा़ बढ़ने लगा तो अपनी ओढ़नी बालक को ओढ़ा दी।
दूसरे प्रहर जो आँख लगी कि ठाकुर श्री मदन मोहन लाल जी को सम्मुख खड़ा पाया।
ठाकुर जी बोले, मैया, मुझे भूखा मारेगी क्या ? गोसाईं की बात का बुरा मान कर रूठ गयी।
खुद पेट में अन्न का एक दाना तक न डाला और मुझे दूध पीने को कह रही है।
मैंने तो आज तेरे घर आकर दूध पी लिया अब तू भी अपना व्रत तोड़ कर कुछ खा पी ले और देख,
मैं रोज़ तेरे दूध की प्रतीक्षा में व्याकुल रहता हूँ, मुझे उसी से तृप्ति मिलती है। अपना नियम कभी मत तोड़ना।
गोसाईं भी अब तेरे को कुछ ना कहेंगे। दूध में पानी मिलाती हो, तो क्या हुआ ? उससे तो दूध जल्दी हज़म हो जाता है। अब उठो और भोजन करो।
पंजीरी हड़बड़ाकर उठी, देखा कि बालक तो कुटिया में कहीं नहीं था।
सचमुच लाला ही कुटिया में पधारे थे। पंजीरी का रोम-रोम हर्षोल्लास का सागर बन गया।
झटपट दो टिक्कड़ बनाए और मदन मोहन जी को भोग लगाकर आनंदपूर्वक खाने लगी। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी।
थोड़ी देर में सवेरा हो गया पंजीरी ने देखा कि ठाकुर जी उसकी ओढ़नी ले गये हैं और अपना पीतांबर कुटिया में ही छोड़ गए हैं।
इधर मंदिर के पट खुलते ही गोसाईं ने ठाकुर जी को देखा तो पाया की प्रभुजी एक फटी पुरानी सी ओढ़नी ओढ़े आनंद के सागर में डूबे हैं।
उसने सोचा कि प्रभुजी ने अवश्य फिर कोई लीला की है, लेकिन इसका रहस्य उसकी समझ से परे था।
लीला-उद्घाटन के लिए पंजीरी दूध और ठाकुर जी का पीताम्बर लेकर मंदिर के द्वार पर पहुँची और बोली -
गुसाईं जी, देखो तो लाला को, पीतांबर मेरे घर छोड़ आये और मेरी फटी ओढ़नी ले आये।
कल सवेरे आपने मुझे भगा दिया था, लेकिन भूखा प्यासा मेरा लाला दूध के लिये मेरी कुटिया पर आ गया।
गोसाईं जी पंजीरी के सामने बैठ गए।
भक्त और भगवान के बीच मैंने क्या कर डाला, भक्ति बंधन को ठेस पहुंचा कर मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला, माई, मुझे क्षमा कर दो।
पंजीरी बोली.. गुसाई जी, देखी तुमने लाला की चतुराई, अपना पीतांबर मेरी कुटिया मे जानबूझकर छोड़ दिया और मेरी फटी-चिथड़ी ओढ़नी उठा लाये।
भक्तों के सम्मान की रक्षा करना तो इनकी पुरानी आदत है।
ठाकुरजी धीरे-धीरे मुस्कुरा रहे थे, अरे मैया तू क्या जाने कि तेरे प्रेम से भरी ओढ़नी ओड़ने में जो सुख है वो पीतांबर में कहाँ।

Tuesday, May 5, 2026

बाँसुरी की जादुई पुकार

 जब हीरों का हार छोड़कर चोर ने माँगा कृष्ण के चरणों का एक साधारण मोरपंख।"
"यह कहानी भक्त और भगवान के अटूट भाव पर आधारित है।"

लखन नाम का एक शातिर चोर था, जिसके मन में न तो ईश्वर के लिए कोई स्थान था और न ही इंसानियत के लिए। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी चोरी और हेरा-फेरी में गुज़ार दी थी। एक शाम उसे खबर मिली कि पास के गाँव के पुराने राधा-कृष्ण मंदिर में ठाकुर जी को बहुत कीमती और प्राचीन गहने पहनाए गए हैं।
लखन ने मन ही मन तय कर लिया कि आज की यह चोरी उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और आख़िरी चोरी होगी, जिससे वह अपनी आगे की ज़िंदगी ऐशो-आराम से बिताएगा।
आधी रात को जब पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था, लखन मंदिर की दीवार फाँदकर भीतर घुस गया। मंदिर के गर्भगृह में घना अँधेरा था और बस एक छोटा सा दीया टिमटिमा रहा था। जैसे ही वह प्रतिमा के करीब पहुँचा, उसे अचानक हवाओं में एक बहुत ही मधुर बाँसुरी की धुन सुनाई देने लगी।
वह चौंक गया क्योंकि मंदिर में उसके सिवा और कोई नहीं था। उसने अपनी आँखें मलीं और देखा कि राधा-कृष्ण की प्रतिमा से एक हल्की और अलौकिक नीली रोशनी निकल रही है।
लखन ने अपने डर को दबाया और प्रतिमा के गले से हीरों का हार उतारने के लिए हाथ बढ़ाया। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र श्री कृष्ण की मंद-मंद मुस्कुराती मूरत पर पड़ी, उसके हाथ जैसे पत्थर के हो गए। उसे लगा कि वे पत्थर की आँखें उसे देख रही हैं और पूछ रही हैं— "लखन, क्या तू सच में यही लेने आया है?" 
उस मुस्कान में इतनी करुणा और ऐसा खिंचाव था कि लखन की हिम्मत जवाब दे गई। उसके हाथ से औज़ार गिर पड़े और वह वहीं घुटनों के बल बैठ गया।
उस अँधेरे मंदिर में लखन को अपने जीवन का एक-एक पाप किसी फिल्म की तरह याद आने लगा। उसे याद आया कि कैसे उसने गरीबों को सताया लोगों की मेहनत की कमाई लूटी। पहली बार उसे अपने कृत्यों पर शर्म महसूस हुई। वह फफक-फफक कर रोने लगा और प्रतिमा के चरणों में सिर रखकर माफी माँगने लगा।
वह कहने लगा— "प्रभु, मैं तो आपको लूटने आया था, पर आपने तो मेरी आत्मा ही बदल दी"। पूरी रात वह उसी संगीत और उस दिव्य रोशनी के घेरे में रोता रहा।
सुबह जब मंदिर के पुजारी जी ने पट खोले, तो उन्होंने देखा कि एक आदमी ठाकुर जी के चरणों में सिर रखकर सोया हुआ है। उसके पास चोरी के औज़ार पड़े थे, लेकिन उसके हाथ में कोई गहना नहीं, बल्कि एक मुरझाया हुआ मोरपंख था जो शायद रात में प्रतिमा से उसके ऊपर गिर गया था।
पुजारी ने जब उसे जगाया, तो लखन की आँखों में वो शातिरपन नहीं, बल्कि एक असीम शांति थी। वह अब चोर नहीं, बल्कि एक 'भगत' बन चुका था। उस दिन के बाद लखन ने मंदिर की सेवा में अपना जीवन लगा दिया।

सीख : परमात्मा की शरण में जाने के लिए पहले से पवित्र होना ज़रूरी नहीं है। उनकी एक नज़र ही सबसे बड़े अपराधी को भी पवित्र करने की शक्ति रखती है। ईश्वर को केवल भाव चाहिए, चाहे वह पश्चाताप के आँसुओं में ही क्यों न हो। 

Saturday, May 2, 2026

सुखी-दुखी संसार

एक नगर में एक शीशमहल था। महल की हरेक दीवार पर सैकड़ों शीशे जडे़ हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल में घुस गया। महल के भीतर उसे सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो नाराज और दुखी लग रहे थे। उन्हें देखकर वह उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डरकर वहां से भाग गया। कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती।कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीशमहल पहुंचा। वह खुशमिजाज और जिंदादिल था। महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए।उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना। वहां फिर से आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।
शिक्षा:-
संसार एक ऐसा शीशमहल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं।जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता।

Friday, April 17, 2026

शांति

भगवान विष्णु सभी जीवों को कुछ न कुछ वस्तुएं भेट कर रहे थे। सभी जीव भेट स्वीकार करते और खुशी खुशी अपने निवास स्थान के लिए प्रस्थान करते। जब सब चले गए तो उनकी चरण सेविका श्री लक्ष्मी जी ने भगवान से कहा, "हे नाथ मैंने देखा कि आपने सभी को कुछ न कुछ दिया,अपने पास कुछ नहीं रखा लेकिन एक वस्तु आपने अपने पैरों के नीचे छिपा लिया है। वो वस्तु क्या है?"
श्री हरि मंद मंद मुस्कुराते रहे,उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया।
लक्ष्मी जी ने फिर कहा,"प्रभु हमसे न छुपाएं, मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है आपने कोई एक चीज़ अपने पैरों के नीचे छिपा रखा है,निवेदन है कृपया इस रहस्य से पर्दा उठाइए।"
श्री हरि बोले, "देवी मेरे पैरों के नीचे "शांति" है।शांति मैंने किसी को नहीं दिया,सुख सुविधा तो सभी के पास हो सकता हैं मगर शांति तो किसी दुर्लभ मनुष्य के पास ही होगा।ये मैं सब को नहीं दे सकता।जो मेरी प्राप्ति के लिए तत्पर्य होगा, जिसकी सारी चेष्टाएं मुझ तक पहुंचने की होगी, उसी को ये मिलेगी"
श्री हरि से आज्ञा लेकर शांति कहने लगी," हे जगत माता,श्री हरि ने मुझे अपने पैरों के नीचे नहीं छिपाया बल्कि मैं स्वयं उनके पैरों के नीचे छिप गई।

जय गजानन्द जी

उस समय की बात है जब भगवान विष्णु जी की शादी लक्ष्मी जी से तय हुई थी । शादी की खूब तैयारियां की गई। चारो और हर्षो उल्लास का वातावरण था। सारे देवी -देवता को बारात में चलने के लिए निमंत्रण दिया गया।
सारे देवी -देवता आये तो सब भगवान विष्णु से कहने लगे की गणेश जी को नहीं ले जायेंगे। वे बहुत मोटे हैं वो तो बहुत सारा खाते है।
दूंद दूछल्या , सूंड सून्डयाला , ऊखल से पाँव , छाजले से कान , मोटा मस्तक वाले है। इनको साथ ले जाकर क्या करेंगे , यही रखवाली के लिए छोड़ जाते हैं और विनायक जी को छोड़कर वे सब बारात में चले गए है।
इधर नारद जी ने गणेश जी को भड़का दिया ओर कहा की आज तो महाराज ने आपका बहुत बड़ा अपमान किया है। आप से बारात बुरी लगती इसीलिए आपको साथ नहीं ले गए और छोड़ कर चले गए । गणेश जी को क्रोध आ गया और उन्होंने चूहों की आज्ञा दी की सारी जमीन खोखली कर दे। धरती खोखली हो गयी इससे भगवान के रथ के पहिये धंस गए।
बहुत कोशिश करके सब परेशान हो गए किसी भी तरह से पहिये नहीं निकले तो हांथी को बुलाया। हाथी आया सारा दृश्य देखा और पहिये को हाथ लगा कर बोला ” जय गजानन्द जी ” और इतने में तुरन्त रथ निकल गया। सब देखते रह गए। सबको बड़ा आश्चर्य हुआ उन्होंने पूछा कि तुमने गजानन्द जी को क्यों याद किया। हाथी बोला ” गणेश जी को सुमरे बिना कोई काम सिद्ध नहीं होता ” जो भी सच्चे मन से गजानन्द जी को याद करता है उसके सब काम बड़ी आसानी से सिद्ध हो जाते है।
सब सोचने लगे हम तो गणेश जी को ही छोड़ आये। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और एक जने को भेज कर गणेश जी को बुलवाया व गणेश जी से माफ़ी माँगी और पहले गणेश जी का रिद्धि -सिद्धि से विवाह करवाया फिर भगवान विष्णु का लक्ष्मी जी के साथ हुआ। सभी बहुत ही खुश थे तभी से कोई भी शुभ काम शुरू करने से पहले विनायक जी का स्मरण किया जाता है।
जैसे भगवान का काम सिद्ध किया वैसे सबका सिद्ध करना।
बोलो विनायक जी की जय !

प्रभु जी का बहीखाता

एक बार की बात है, वीणा बजाते हुए नारद मुनि भगवान श्रीराम के द्वार पर पहुँचे। नारायण नारायण !! नारदजी ने देखा कि द्वार पर हनुमान जी पहरा दे रहे है।
हनुमान जी ने पूछा: नारद मुनि! कहाँ जा रहे हो?
नारदजी बोले: मैं प्रभु से मिलने आया हूँ। नारदजी ने हनुमानजी से पूछा प्रभु इस समय क्या कर रहे है?
हनुमानजी बोले: पता नहीं पर कुछ बही खाते का काम कर रहे है, प्रभु बही खाते में कुछ लिख रहे है।
नारदजी: अच्छा? क्या लिखा पढ़ी कर रहे है?
हनुमानजी बोले: मुझे पता नहीं मुनिवर आप खुद ही देख आना।
नारद मुनि गए प्रभु के पास और देखा कि प्रभु कुछ लिख रहे है।
नारद जी बोले: प्रभु आप बही खाते का काम कर रहे है? ये काम तो किसी मुनीम को दे दीजिए।
प्रभु बोले: नहीं नारद, मेरा काम मुझे ही करना पड़ता है। ये काम मैं किसी और को नही सौंप सकता।
नारद जी: अच्छा प्रभु ऐसा क्या काम है? ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिख रहे हो?
प्रभु बोले: तुम क्या करोगे देखकर, जाने दो।
नारद जी बोले: नही प्रभु बताईये ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिखते हैं?
प्रभु बोले: नारद इस बही खाते में उन भक्तों के नाम है जो मुझे हर पल भजते हैं। मैं उनकी नित्य हाजिरी लगाता हूँ ।
नारद जी: अच्छा प्रभु जरा बताईये तो मेरा नाम कहाँ पर है? नारदमुनि ने बही खाते को खोल कर देखा तो उनका नाम सबसे ऊपर था। नारद जी को गर्व हो गया कि देखो मुझे मेरे प्रभु सबसे ज्यादा भक्त मानते है। पर नारद जी ने देखा कि हनुमान जी का नाम उस बही खाते में कहीं नही है? नारद जी सोचने लगे कि हनुमान जी तो प्रभु श्रीराम जी के खास भक्त है फिर उनका नाम, इस बही खाते में क्यों नही है? क्या प्रभु उनको भूल गए है?
नारद मुनि आये हनुमान जी के पास बोले: हनुमान! प्रभु के बही खाते में उन सब भक्तों के नाम हैं जो नित्य प्रभु को भजते हैं पर आप का नाम उस में कहीं नहीं है?
हनुमानजी ने कहा: मुनिवर! होगा, आप ने शायद ठीक से नहीं देखा होगा?
नारदजी बोले: नहीं नहीं मैंने ध्यान से देखा पर आप का नाम कहीं नही था।
हनुमानजी ने कहा: अच्छा कोई बात नहीं। शायद प्रभु ने मुझे इस लायक नही समझा होगा जो मेरा नाम उस बही खाते में लिखा जाये। पर नारद जी प्रभु एक अन्य दैनंदिनी भी रखते है उसमें भी वे नित्य कुछ लिखते हैं।
नारदजी बोले: अच्छा?
हनुमानजी ने कहा: हाँ!
नारदमुनि फिर गये प्रभु श्रीराम के पास और बोले प्रभु! सुना है कि आप अपनी अलग से दैनंदिनी भी रखते है! उसमें आप क्या लिखते हैं?
प्रभु श्रीराम बोले: हाँ! पर वो तुम्हारे काम की नहीं है।
नारदजी: प्रभु! बताईये, मैं देखना चाहता हूँ कि आप उसमें क्या लिखते हैं ?
प्रभु मुस्कुराये और बोले: मुनिवर मैं इन में उन भक्तों के नाम लिखता हूँ जिन को मैं नित्य भजता हूँ।
नारदजी ने डायरी खोल कर देखा तो उसमें सबसे ऊपर हनुमान जी का नाम था। ये देख कर नारदजी का अभिमान टूट गया।
कहने का तात्पर्य यह है कि जो भगवान को सिर्फ जीव्हा से भजते है उनको प्रभु अपना भक्त मानते हैं, और जो ह्रदय से भजते है उन भक्तों के वे स्वयं भक्त हो जाते हैं। ऐसे भक्तों को प्रभु अपनी हृदय रूपी विशेष सूची में रखते हैं।
श्री धाम वृन्दावन

सच्चा-गायक

एक गाँव में गौरांग नामक एक गरीब लड़का रहता था। वह बहुत अच्छा गाता एवं डफली बजाता था। अपनी डफली लेकर वह रोज नदी किनारे चौराहे पर गीत गाता एवं डफली बजाता। लोग आते-जाते, पर ठहरकर न कोई उसका गाना सुनता, न प्रशंसा करता। वह बहुत दुःखी हो जाता। जब वह घर लौटता, बहुत उदास रहता। उसकी माँ उसे उदास देखती, तो उसे उस पर बहुत दया आती। उसे ढाढ़स बँधाती। प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरकर कहती, "बेटा निराश मत होना। अपना काम करते रहो। ईश्वर एक दिन जरूर तुम्हें सफलता देगा।"
गौरांग झुंझलाकर कहता, “माँ! मैं इतना अच्छा गाता-बजाता हूँ, फिर भी लोग मेरे गीत की कद्र नहीं करते ! आखिर मुझमें क्या कमी है माँ ?"
माँ कहती, "बेटा! यह सब भाग्य का खेल है। किसी मनुष्य का भाग्य पत्ते के पीछे होता है तो किसी का पत्थर के नीचे। पत्ता तो हवा के झोंके से उड़ जाता है, पर पत्थर को उड़ाने के लिए तो तूफान की जरूरत पड़ती है। तुम विश्वासपूर्वक अपना काम करते रहो। ईश्वर तुम्हारा भला करेगा।"
माँ के वचन गौरांग में उत्साह ला देता और वह दोगुने जोश के साथ गीत गाता एवं डफली बजाता। गौरांग की माँ अपने बेटे को बहुत प्यार करती थी। उसके प्रति उसके हृदय में ममता का अथाह सागर हिलोरें मारता रहता था। वह एक जमींदार के बगीचे की देखभाल करती थी। बदले में उसे अनाज, सब्जी, आम आदि मिल जाते थे। उन्हीं चीजों से उनका संसार चलता था।
एक दिन गौरांग जंगल में घूम रहा था, तभी उसकी दृष्टी एक घायल शिशु हिरणी पर पड़ी। वह दौड़कर हिरणी के निकट गया। देखा, उसकी एक टाँग टूटी हुई है और उसके शरीर में कुछ घाव भी हैं। उसे देखकर उसे दया आ गई। उसे उठाकर वह घर ले आया और अपनी माँ से कहा, "लगता है, किसी जंगली जानवर ने इसे घायल किया है। इस हालत में यह जंगल में मर जाती, इसीलिए मैं इसे उठाकर ले आया।"
माँ ने कहा, “बहुत अच्छा किया बेटा।" गौरांग उस शिशु हिरणी की मन लगाकर सेवा करता। सुबह उठकर वह उसके घावों को फिटकरी के जल से धोता, फिर वैद्यजी की जड़ी-बूटी लगाता, पाँव में पट्टी बाँधता, उसका खूब खयाल रखता। वह उस हिरणी से काफी घुल-मिल गया था। उसकी सेवा से हिरणी ठीक होने लगी। उसके घाव तो भर गए, पर पाँव ठीक नहीं हुए। वह लँगड़ाकर चलती थी।
हिरणी से गौरांग को इतना अधिक लगाव हो गया कि वह दीन-दुनिया से बेखबर हो गया। अपनी माँ को भी गौण समझने लगा। इससे उसकी माँ को बहुत चिंता हुई। एक दिन जब गौरांग घर में नहीं था तो उसकी माँ हिरणी को जंगल में एक सुरक्षित स्थान में छोड़ आई। घर आने पर गौरांग ने अपनी माँ से जब हिरणी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह इसके बारे में कुछ भी नहीं जानती है। गौरांग द्वारा बार-बार पूछने पर भी उसने अनभिज्ञता प्रकट की।
गौरांग अत्यंत दु:खी हो गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने डबडबाई आँखों से अपनी माँ से कहा, "पता नहीं उस बेचारी के साथ क्या हुआ होगा? अभी तो उसकी टाँग भी ठीक नहीं हुई थी। वह तो ठीक से भाग भी नहीं सकेगी। जंगली जानवरों से वह अपनी रक्षा कैसे कर पाएगी?"
उसकी माँ अपने बेटे के दुःख को देख दुःखी हुई, पर उसे सच्चाई बता नहीं पाई। उधर गौरांग खाट पर बैठा केवल आँसू बहाता रहा। उसने खाना भी नहीं खाया। रोते-रोते रात बीत गईं। सुबह पीड़ा से व्यथित हो उसने अपनी डफली उठाई, चौराहे पर गया और अत्यंत तल्लीन होकर गाना गाते हुए डफली बजाने लगा। डफली बजाने में वह इतना तन्मय हो गया कि उसे समय का ध्यान ही न रहा। जब उसने गाना समाप्त किया, तो देखा कि आस-पास भारी भीड़ इकट्ठी हो गई है और उसके सामने सिक्कों का ढेर लगा हुआ है और लोग 'वाह ! वाह !' करते हुए तालियाँ बजा रहे हैं। उसे लगा कि वह सपना देख रहा है! वह अवाक् चारों ओर देखता रहा। धीरे-धीरे भीड़ छंट गई, तब उसकी मदहोशी टूटी। सामने पड़े सिक्कों को समेटकर वह अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक घर पहुँचा। खुशी से झूमते हुए उसने अपनी माँ से कहा, "माँ! माँ ! देखो आज मुझे कितने पैसे मिले! आज तो सब लोग मेरे गाने पर तालियाँ बजा रहे हैं। कुछ तो रो भी रहे थे।"
माँ ने उसे अपने हृदय से लगा लिया। फिर बोली, “बेटा जब भी मैं तुम्हारा गाना सुनती थी, तो मुझे है। आज से तुम एक सच्चे गायक हो।"
गौरांग अपनी माँ से लिपटकर रोने लगा।