महामंत्र > हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे|हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे||

Thursday, February 26, 2026

भौतिक शक्ति ,प्रभु भक्ति

 ब्राह्मण हाथ में रामायण की पुस्तक लेकर दिन भर इधर से उधर घूमता रहता था कोई भी व्यक्ति रामायण सुनने के लिए मिल जाए मेरे को दान दक्षिणा मिल जाए तो मेरा जीवन चलता रहे वह अपने मन में सोचता रहता है 
भूख प्यास भी लग जाती है पर न उसको कोई खिलाने वाला था और नहीं उसको कोई पिलाने वाला था न कोई उसका घर था ना कोई उसका धोरी था उसके आगे पीछे कोई नहीं था ।
जंगल की तरफ आगे बढ़ता ही जा रहा था पर समझ में नहीं आ रहा था मैं करूं तो क्या करूं जिंदा रहूं या मृत्यु को गले लगाउ यह भी समझ में नहीं आ रहा था 
अचानक उसने देखा जंगल में एक संत उसकी तरफ आ रहे थे जिनके हाथ में कमंडल था संत को देखते हुए चरणों में नतमस्तक हो जाता है निवेदन करता है मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं ।
संत ने कहा तुम एक काम कर तुम यदि मेरे को प्रतिदिन तेरे हाथ में जो रामायण है इस रामायण को सुनना प्रारंभ कर दे मैं तुम्हारे को प्रतिदिन भोजन और अपनी अपनी तरफ से देना प्रारंभ कर दूंगा नदी किनारा पास में है अपन वहां चलते है और वहां पर एक कुटिया बना देते है जहां पर तुम मेरे को हमेशा रामायण सुनाते रहना में गांव में जाकर भिक्षा मांग कर ले आऊंगा तेरा पेट भी भर दूंगा और मैं अपना पेट भी भर लूंगा।
संत के बात पंडित स्वीकार कर लेता है क्योंकि उसको तो अपना पेट भरने से मतलब था दोनों नदी किनारे पहुंच जाते हैं वहां पर एक कुटिया बना लेते है सामने नदी मे सुबह शाम दोनों स्नान कर लेते हैं पंडित कथा सुनना प्रारंभ कर देता है कथा जब पूरी होती है तब संत शहर की ओर रवाना हो जाते हैं रोटी मांग कर ले आते हैं दोनों आपस में बांट कर खा लेते हैं और सो जाते हैं ।
एक बरस पूरा हो जाता है संत पंडित की कथा से बहुत ज्यादा खुश हो जाते हैं और कहते हैं बोल कोई भी तुम वरदान मांगना चाहता है तो मैं आज तेरे को वरदान देने के लिए तैयार हूं बोल तेरे को क्या चाहिए संत ने खुश होकर कहा 
यह बात सुनकर पंडित बहुत ज्यादा खुश हो जाता है हाथ जोड़कर निवेदन करता है महात्मा जी मेरे को कुछ भी नहीं चाहिए केवल मेरे पास में धन की कमी है मेरे को धन मिल जाए तो मैं मानूंगा मेरे को भगवान मिल गए हैं आप इसलिए आप मेरे को धन देने की कृपा करें ।
महात्मा जी तत्काल झोपड़ी का एक तीनका बाहर निकालते हैं अपने हाथों से तोड़ते हैं देखते देखते वहां पर सोने की मोहरे बरसने प्रारंभ हो जाती है। और धन का ढेर लग जाता है यह देखकर वह बहुत ही ज्यादा खुश हो जाता है 
महात्मा ने कहा और भी तेरे को कुछ मांगना हो तो तुम मांग सकता है अभी तेरे हाथ के अंदर है मांगना फिर तेरी हाथ में नहीं रहेगा इसलिए जो भी मांगना हो अभी तुम मांग सकता है ।
अपने सामने धन का भंडार देकर पंडित ने कहा महात्मा जी आपने मेरे को धन तो दे दिया है पर यदि मकान नहीं है तो धन का क्या मूल्य है मेरे को मकान चाहिए जिसके अंदर में आराम से रह सकूं 
महात्मा उसके तरफ देखना प्रारंभ कर देते हैं खुश होकर महात्मा के मुखारविंद से शब्द निकल जाता तथास्तु ।
तथास्तु शब्द निकलते ही ऐसा चमत्कार होता है जंगल के अंदर सात मंजिल की हवेली बनकर तैयार हो जाती है संत ने का यह हवेली तेरे रहने के लिए तैयार हो गया तुम आराम से यहां पर रह सकता है ।
इतनी बड़ी हवेली देखकर पंडित बहुत ज्यादा खुश हो जाता है महात्मा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना प्रारंभ कर देता है ।
महात्मा ने कहा और भी कुछ मांगना हो तो अभी तुम मांग सकते हो अभी तेरे पास में समय है फिर तेरे को वक्त नहीं मिलेगा और कुछ मांगना हो तो मांग ले
पंडित की लालसाएं इच्छाएं बढ़ते ही जा रही थी पंडित जी ने का महात्मा जी आपने धन दे दिया मकान दे दिया पर घर को चालने वाली यदि धर्मपत्नी मिल जाए तो कम से काम आराम से रोटी खाने को तो मिलेगी यदि आप मेरे को कुछ देना ही चाहती हैं तो एक अच्छी धर्मपत्नी मेरे को दे जिससे मेरा जीवन सफल बन जाए ।
महात्मा यह बात सुनकर अपनी नजर एक तरफ उठाकर देखी है और कहा देख पंडित उधर कौन जा रहा है तुम चाहे तो उसको अपने घर पर आराम से रख सकता है ।
पंडित ने देखा सामने एक नवयुवती जा रही थी वो तत्काल उसके पास में जाता है नवयुवती उसको देखते ही उसके प्रति आकर्षित हो जाती है उसके साथ में शादी करने के लिए तैयार हो जाती है शादी करके दोनों अपने मकान में रहना प्रारंभ कर देते है और संतों का सानिध्य है वह नहीं छोड़ते हैं ।
पर पंडित महात्मा को रामायण पाठ सुनाना कभी नहीं भुलता है वह समय पर आ जाता है महात्मा जी की सेवा भी करता है महात्मा जी खुश होकर पूछते हैं बोल भक्त और भी कुछ चाहिए क्या।
पंडित ने कहा महात्मा जी आपने मेरे को धन दे दिया मकान दे दिया पत्नी देदी पर घर में जब तक पुत्र रत्न नहीं हो तब तक घर का क्या मूल्य है वह ऐसी हो जाए तो सब सुख अपने आप ही मेरे को मिलने प्रारंभ हो जाएंगे ।
महात्मा के मुखारविंद से फिर शब्द निकल जाता है तथास्तु देश का परिणाम आता है कुछ समय के पश्चात पंडित के घर पर पुत्र रत्न भी जन्म ले लेता है 
महात्मा जी ने फिर पूछा बोल अब तेरी और कोई इच्छा बाकी रह गई है क्या 
तब पंडित ने कहा महात्मा जी अब केवल एक इच्छा बाकी है परमात्मा से मेरा साक्षात्कार हो जाए ।
महात्मा ने कहा परमात्मा से तेरा साक्षात्कार नहीं हो सकता है क्योंकि तेरा मन तो हमेशा धन में रहता है मकान में रहता है पत्नी में रहता है पुत्र में रहता है जब त तेरा मन इन चीजों में लगा हुआ रहेगा तब तक तेरे को कभी भी परमात्मा से साक्षात्कार करने का अवसर है वह प्राप्त नहीं होगा ।
यह बात कह कर संत वहां से जंगल की तरफ प्रस्थान कर जाते हैं पंडित संसार में उलट कर रह जाता है उसको परमात्मा के कभी भी दर्शन साक्षात्कार करने का अवसर भी प्राप्त नहीं होता है ।
पंडित के कानों में हमेशा ही महात्मा के शब्द गुंजित होते रहते थे जिसका मन भौतिकता में उलझा हुआ होता है उस का मन कभी भी भगवान की भक्ति में नहीं लगता है।

ये दुनिया कैसी है

एक व्यक्ति ने अपने गुरु से पूछा- मेरे कर्मचारी, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे और सभी लोग मतलबी हैं। कोई भी सही नहीं हैं क्या करूँ???
गुरु थोडा मुस्कुराये और उसे एक कहानी सुनाई।
एक गाँव में एक विशेष कमरा था जिसमे 100 शीशे लगे थे। एक छोटी लड़की उस कमरे में गई और खेलने लगी। उसने देखा 100 बच्चे उसके साथ खेल रहे हैं और वो उन प्रतिबिम्ब बच्चो के साथ खुश रहने लगी। जैसे ही वो अपने हाथ से ताली बजाती सभी बच्चे उसके साथ ताली बजाते। उसने सोचा यह दुनिया की सबसे अच्छी जगह है और यहां बार बार आना चाहेगी।
थोड़ी देर बाद इसी जगह पर एक उदास आदमी कहीं से आया। उसने अपने चारो तरफ हजारों दु:ख से भरे चेहरे देखे।वह बहुत दु:खी हुआ। उसने हाथ उठा कर सभी को धक्का लगाकर हटाना चाहा तो उसने देखा सैंकड़ो हाथ उसे धक्का मार रहे है। उसने कहा यह दुनिया की सबसे खराब जगह है वह यहां दोबारा कभी नहीं आएगा और उसने वो जगह छोड़ दी।
इसी तरह यह दुनिया एक कमरा है जिसमें हजारों शीशे लगे है। जो कुछ भी हमारे अंदर भरा होता है वो ही प्रकृति हमें लौटा देती है।
जग कैसा ? मुझ जैसा
अपने मन और दिल को साफ़ रखें तब यह दुनिया आपके लिए स्वर्ग की तरह ही दिखाई देगी।

Tuesday, February 24, 2026

समुद्र में पत्थर का पुल कैसे बनाया गया?

आज एक बहुत सुंदर कथा का रसास्वादन करिये।

              लंका के राजदरबार में सन्नाटा था। रावण के सबसे चतुर गुप्तचर , शुक और सारण , हाँफते हुए पहुँचे थे। वे अभी - अभी समुद्र तट से Aerial Surveillance' ( एरियल सर्विलांस - हवाई निगरानी )करके लौटे थे। उन्होंने जो देखा , वह उनकी कल्पना से परे था।
वे रावण के सामने झुके और बोले— "महाराज! वे वानर पत्थरों से समुद्र बाँधने की योजना बना रहे हैं।" रावण जोर से हंसा। उसकी वैज्ञानिक दृष्टि में यह Physically Impossible' ( फिजिकली इम्पॉसिबल - भौतिक रूप से असंभव ) था। लेकिन अहंकार में डूबा रावण यह भूल गया था कि शत्रु खेमे में Material Science' ( मैटेरियल साइंस - पदार्थ विज्ञान ) के दो महान दिग्गज 'नल' और 'नील' मौजूद थे।
 रावण अट्टहास कार्य हुए बोला , "पत्थर कभी तैर नहीं सकते! यह भौतिक विज्ञान ( Physics ) के विरुद्ध है।" लेकिन उसे आभास नहीं था कि रामेश्वरम के तट पर नल और नील—प्रकृति के नियमों को 'री-राइट' ( फिर से लिख ) रहे थे।
रामायण कि चौपाई है - 
कपि कौतुक करि गिरि उठवहिं ।
आनहिं नल नीलहिं देवहिं ॥
अर्थ: वानर खेल-खेल में ( कौतुक करि ) बड़े-बड़े पहाड़ों को उठा लेते और उन्हें लाकर नल और नील को देते। आगे का काम फिर उन्हें संभालना होता था। 
नल-नील ने पूरे क्षेत्र को तीन कार्य क्षेत्रों (Work Zones ) में विभाजित किया था। महेंद्र पर्वत और आसपास के पहाड़ों पर हनुमान , अंगद और द्विविद जैसे शक्तिशाली वानर बड़ी चट्टानें तोड़ रहे थे।
 पत्थरों को ढोने के लिए लाखों वानरों की एक 'ह्यूमन चेन' ( Human Chain - मानव श्रृंखला )बनाई गई थी।
 समुद्र तट पर नल और नील पत्थरों की कोडिंग (राम नाम लिखना) और उनकी गुणवत्ता ( Quality Check )की जाँच कर रहे थे।
नल और नील के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—हजारों वानरों द्वारा लाए गए पत्थरों को समुद्र के बीचों-बीच एक सही दिशा में जोड़ना। नल और नील ने हर पत्थर के उस हिस्से पर 'राम' नाम अंकित करवाया जिसे दूसरे पत्थर से जोड़ना था। यह आज के 'Barcode' ( बारकोड ) या 'Alignment Marker' ( अलाइनमेंट मार्कर - दिशा सूचक चिन्ह ) की तरह था।
 'राम' नाम लिखा होने से वानरों को पता चल जाता था कि पत्थर का Front Face' ( फ्रंट फेस - सामने का हिस्सा ) किस ओर रखना है। इससे लहरों के बीच भी पुल की सीध ( Alignment ) नहीं बिगड़ी। पत्थरों को इस तरह रखा गया कि उनके गुरुत्वाकर्षण केंद्र ( Center of Gravity ) एक रेखा में रहें।पत्थरों पर 'राम' नाम केवल आस्था का प्रतीक नहीं था, बल्कि वह एक यूनिक आईडी' ( Unique ID )की तरह काम करता था।
नल - नील ने पत्थरों को जोड़ों के हिसाब से चिन्हित किया था। पत्थरों पर लिखे अक्षरों की सीध से वानरों को पता चलता था कि कौन सा ,सिरा ( Side ) किस पत्थर में फिट होगा। यदि कोई पत्थर गलत तरीके से रखा जाता, तो वह 'अलाइनमेंट' ( Alignment) सीध से बाहर हो जाता, जिसे नल तुरंत पहचान लेते थे।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में उनकी इस 'विशेषज्ञता' को चौपाई में अमर कर दिया:
"नल नील कपि द्वौ भाई।
लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
 तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे।
 तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥"
अर्थ -नील को ऋषियों का आशीष' (आशीर्वाद )प्राप्त था। वैज्ञानिक दृष्टि से यह उनके Ancestral Knowledge' ( एंसेस्ट्रल नॉलेज - पूर्वजों का ज्ञान )और 'Structural Engineering' ( स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग - ढांचागत अभियांत्रिकी ) की क्षमता को दर्शाता है। उनके स्पर्श ( परस )में वह तकनीक थी जो पत्थरों की Specific Gravity' ( स्पेसिफिक ग्रेविटी - विशिष्ट घनत्व ) को समझकर उन्हें पानी पर संतुलित कर देती थी।
इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि समुद्र तट पर कभी पत्थरों का 'जाम' नहीं लगा और न ही नल-नील कभी खाली बैठे।
 जितनी तेजी से नल-नील पत्थरों को समुद्र में स्थापित ( Install ) कर रहे थे, उतनी ही तेजी से पीछे से पत्थरों की अगली खेप पहुँच रही थी।
अब यहां से शुरू होता है 
बैथीमेट्रिक सर्वे और टोपोग्राफी ( गहराई और धरातल का विज्ञान )। पुल बनाने से पहले नल-नील ने समुद्र के भीतर का नक्शा तैयार किया।
Bathymetric Survey (बैथीमेट्रिक सर्वे - जल के भीतर की गहराई का मापन): नल-नील ने Acoustic Sounding' ( अकूस्टिक साउंडिंग - ध्वनि तरंगों )और विशेष प्रकार के 'शंकु' (Cones) का प्रयोग किया। उन्होंने भारी धातुओं को लंबी डोरियों से बाँधकर समुद्र के तल (Sea Bed) की गहराई और वहां की मिट्टी की प्रकृति जाँची। आज इसे 'Sonar Mapping' (सोनार मैपिंग) का आदिम रूप कहा जा सकता है।
 Topographical Mapping ( टोपोग्राफिकल मैपिंग ) उन्होंने पाया कि रामेश्वरम से मन्नार के बीच 'कोरल रीफ' और 'चूना पत्थर' की एक उथली पट्टी पहले से मौजूद है। उन्होंने इसी प्राकृतिक Submerged Ridge' (जलमग्न पर्वत श्रेणी) को आधार बनाकर सेतु का अलाइनमेंट'तय किया। उन्होंने इसी को Foundation' ( फाउंडेशन - नींव )बनाया। आज नासा ( NASA )के उपग्रह भी इसी पट्टी की पुष्टि करते हैं।
 मैकेनिकल इंटरलॉकिंग और मरीन कंक्रीट ( समुद्री सीमेंट ) का प्रयोग पुल में शुरू हुआ। पत्थरों को केवल रखा नहीं गया , उन्हें 'लॉक' किया गया। Tenon and Mortise ( टेनन एंड मोर्टिस - चूल और छेद का जोड़ ) तकनीक के जरिए पत्थरों को विशेष खांचों' ( Grooves ) में तराशा गया। एक पत्थर का उभरा हिस्सा दूसरे के छेद में फिट हो जाता था।
चूंकि समुद्र में लहरें थी तो Chemical Binding ( केमिकल बाइंडिंग - रासायनिक जुड़ाव )बहुत जरूरी था। नल नील ने चूने (Lime) और प्राकृतिक गोंद (Natural Polymers) का एक 'पेस्ट' बनाया। यह मिश्रण खारे पानी के संपर्क में आते ही Marine Concrete' ( मरीन कंक्रीट )की तरह पत्थर बन जाता था।
समुद्र की लहरें किसी भी दीवार को तोड़ सकती हैं। नल-नील ने यहाँ Breakwater' ( ब्रेकवाटर - लहर रोधक )तकनीक का उपयोग किया।पुल के किनारों को ढलानदार  (Sloped ) बनाया गया। जब लहरें इनसे टकराती थीं, तो उनकी Kinetic Energy' ( काइनेटिक एनर्जी - गतिज ऊर्जा )नष्ट हो जाती थी और पुल पर दबाव नहीं पड़ता था।
समुद्र के नीचे रेत का बहाव लगातार बदलता रहता है, जो किसी भी नींव को हिला सकता है। नल - नील ने पुल को पूरी तरह 'कठोर' ( Rigid )बनाने के बजाय उसे लचीला' ( Flexible ) रखा। पुल के नीचे रेत की ऐसी परतें बिछाई गईं जो 'शॉक एब्जॉर्बर' का काम करती थीं।
नतीजा: जब भी समुद्री भूकंप या सुनामी जैसी लहरें आईं, पुल ने उस दबाव को सोख लिया और टूटा नहीं। इसे आज Base Isolation Technique'कहा जाता है, जिसका उपयोग गगनचुंबी इमारतों को भूकंप से बचाने में होता है।

समुद्र का नमक लोहे और साधारण पत्थर को गला देता है। नल और नील ने ऐसे पत्थरों ( Limestone / Pumice )का चयन किया जिनमें सिलिका की मात्रा अधिक थी। सिलिका नमक के साथ प्रतिक्रिया करके और कठोर हो जाता है। उन्होंने निर्माण के दौरान समुद्री वनस्पतियों के अर्क का उपयोग किया, जो पत्थरों के रोम-छिद्रों (Pores) को सील कर देते थे, जिससे नमक अंदर तक नहीं पहुँच पाता था।

जब बड़े पत्थर आपस में जुड़ गए, तो उनके बीच सूक्ष्म अंतराल (Gaps) रह गए थे। यहाँ नन्ही गिलहरी की मंडली भी जुट गई। गिलहरियों का प्रवेश एक 'इंजीनियरिंग मास्टरस्ट्रोक' था। Aggregate Filling ( एग्रीगेट फिलिंग - रिक्त स्थान की भराई )बहुत जरूरी थी। गिलहरियों द्वारा लाई गई रेत ने उन दरारों को भर दिया। इससे पुल की Load Bearing Capacity' ( लोड बेयरिंग कैपेसिटी - भार सहने की क्षमता )कई गुना बढ़ गई। रेत के कणों ने पत्थरों के बीच घर्षण पैदा किया , जिससे लहरों का प्रचंड वेग भी पुल को हिला नहीं सका। यह न केवल भक्ति थी, बल्कि Precision Engineering' ( प्रीसिजन इंजीनियरिंग - सूक्ष्म अभियांत्रिकी )का अंतिम चरण था।

पुल बनते समय जयश्री राम के जयकारे क्यों लगते थे , यह भक्ति नहीं थी , विज्ञान का हिस्सा था। नल और नील ने पत्थरों को 'वाइब्रेशनल ट्यूनिंग' ( Vibrational Tuning ) के साथ सेट करते थे। जब वानरों द्वारा एक साथ 'जय श्री राम' का जयघोष होता, तो उन ध्वनि तरंगों ( Sound Waves ) से पत्थरों के बीच मौजूद सूक्ष्म हवा के बुलबुले सक्रिय हो जाते। यह वैसा ही था जैसे आज के वैज्ञानिक 'Acoustic Levitation' ( अकूस्टिक लेविटेशन - ध्वनि से वस्तुओं को हवा में तैराना )की बात करते हैं।
नल-नील ने पत्थरों को केवल पानी में नहीं फेंका, बल्कि उन्हें वाइब्रेशनल बैलेंस' (Vibrational Balance )के साथ रखा। जब सेना 'राम' नाम का सामूहिक जयघोष करती थी, तो वह कंपन (Vibration) पत्थरों को एक-दूसरे के करीब खींचता था। इसे आधुनिक विज्ञान Sonic Bonding' ( सोनिक बॉन्डिंग - ध्वनि द्वारा जुड़ाव )कहता है।

उस समय नाइट सर्विलांस ( Night Surveillance )मौजूद था। रावण के गुप्तचरों ने देखा कि रात के सन्नाटे में भी पुल चमकता था। दरअसल, नल-नील ने 'Bioluminescent' ( बायोलुमिनेसेंट - प्राकृतिक रूप से चमकने वाले ) समुद्री शैवालों का लेप लगाया था, ताकि रात के अंधेरे में भी निर्माण कार्य जारी रह सके।

5 दिनों का चमत्कार इतिहास बना गया। 'फास्ट-ट्रैक' प्रोजेक्ट मैनेजमेंट हुआ। यह इतिहास का सबसे तेज निर्माण था। नल-नील ने 'Division of Labour' (डिवीजन ऑफ लेबर - श्रम विभाजन) का अद्भुत उदाहरण पेश किया। प्रथम दिन: १४ योजन (नींव और शुरुआती ढांचा)।
 
द्वितीय दिन: २० योजन ( गहरे पानी में प्रवेश और पत्थरों का अलाइनमेंट )।
 
 तृतीय दिन: २१ योजन (पुल की स्थिरता की जाँच)।
 
चतुर्थ दिन: २२ योजन (ऊपरी सड़क का निर्माण और कोटिंग)।
 
 पंचम दिन: २३ योजन (अंतिम छोर तक पहुँच और भार परीक्षण)।

जैसे ही पांचवें दिन का सूरज ढला, महासेतु बनकर तैयार था। वानर सेना का उत्साह चरम पर था। समुद्र जो पहले एक बाधा' ( Barrier ) था, अब एक राजमार्ग' ( Highway )बन चुका था। ज्ञान , विज्ञान और आस्था का महासंगम
राम सेतु केवल पत्थरों का जोड़ नहीं था। यह 'Hydraulics' ( हाइड्रोलिक्स - जल शक्ति विज्ञान ), 'Oceanography' ( ओशनोग्राफी - समुद्र विज्ञान ) और 'Acoustics' (वीअकूस्टिक - ध्वनि विज्ञान ) का वह संगम था जिसे देखकर रावण जैसा महान वैज्ञानिक भी चकित रह गया।

जब मंदोदरी ने वह पुल देखा, तो उसने रावण से कहा:- 
"कपिन्ह जलधि पाषान तहाए।
जेहिं बलु दीन्ह सो प्रभु घर आए॥"
अर्थ: "जिनके प्रताप से वानरों ने समुद्र पर पाषाण (पत्थर) तैरा दिए हैं, वह प्रभु अब स्वयं आपके द्वार (लंका) पर आ गए हैं, अब भी संधि कर लीजिए।"

लेकिन रावण को अभी भी यकीन नहीं था। सेतु के पूर्ण होने पर रावण अपने दिव्य Pushpaka Vimana' ( पुष्पक विमान ) से वहां पहुँचा।
जब रावण अपने Pushpaka Vimana' ( पुष्पक विमान )से ऊपर से गुजरा, तो वह एक इंजीनियर की दृष्टि से इस सेतु को देखकर स्तब्ध रह गया।

गोस्वामी जी लिखते हैं

"बाँध्यो सेतु नील नल नागर । राम कृपाँ जस भयउ उजागर॥
जहँ तहँ देखि कपिन कै भीरा। रावन हृदयँ भई अति पीरा॥"
 अर्थ 
"बाँध्यो सेतु नील नल नागर": रावण ने देखा कि चतुर (नागर) नल और नील ने समुद्र पर सेतु बाँध लिया है। यहाँ 'नागर' शब्द का अर्थ है— निपुण' या 'Professional Engineers'।
"राम कृपाँ जस भयउ उजागर": यह पुल प्रभु राम की कृपा और उनके प्रताप का यश चारों ओर फैला रहा था।
"जहँ तहँ देखि कपिन कै भीरा": उस पुल पर यहाँ-वहाँ वानरों की विशाल सेना (भीड़) को चलते हुए देखकर रावण चकित रह गया।
"रावन हृदयँ भई अति पीरा": यह दृश्य देखकर रावण के हृदय में अति पीरा' ( अत्यंत पीड़ा और भय ) उत्पन्न हुई।

 उसे लगा कि लंका की अभेद्यता' को नल-नील के 'Geometric Precision' ( ज्यामितीय सटीकता )ने नष्ट कर दिया है। यह एक 'Advanced Stealth Vehicle' ( पुष्पक )और एक 'Solid Logistics Link' ( सेतु )के बीच के विज्ञान का आमना-सामना था।

रावण ने विमान को आसमान में स्थिर किया। पुष्पक का Mercury Vortex Engine' ( पारे का इंजन )उसे हवा में रुकने (Hovering) की शक्ति देता था। वहां से रावण ने सेतु की 'Geometrical Precision' ( ज्यामितीय सटीकता )देखी और दंग रह गया। एक महान वैज्ञानिक होने के नाते वह समझ गया कि यह केवल 'लीला' नहीं, बल्कि 'परम विज्ञान' है।

अब तक रावण इसे केवल अपने गुप्तचरों की 'अफवाह' मान रहा था। लेकिन जब उसने खुद अपनी आँखों से ३० मील लंबा वह मार्ग देखा, तो उसका Logistical Confidence' ( सामरिक आत्मविश्वास ) टूट गया। उसे समझ आ गया कि समुद्र अब लंका की रक्षा करने वाली 'खाई' (Moat) नहीं रहा, बल्कि वह तो अब दुश्मन का 'हाइवे' (Highway) बन चुका है।

 रावण को शारीरिक चोट नहीं लगी थी, लेकिन उसकी 'Intellectual Superiority' ( बौद्धिक श्रेष्ठता )को गहरी चोट पहुँची थी। वह खुद को महानतम शिल्पी और ज्ञानी मानता था, पर दो वानरों (नल-नील) ने वह कर दिखाया जो रावण की कल्पना में भी नहीं था।

 रावण ने देखा कि पुल इतना मजबूत था कि उस पर 'भीरा' (लाखों वानरों का भार) आसानी से टिका हुआ था। यह पुल की 'Load Bearing Capacity' (भार सहने की क्षमता )का साक्षात प्रमाण था।

Tuesday, February 17, 2026

दो पीढ़ियों के बीच तुलना

दो पीढ़ियों के बीच तुलना…
हर किसी को ज़रूर पढ़नी चाहिए 
एक युवक ने अपने पिता से पूछा:
“आप लोग पहले कैसे जीते थे?”
– तकनीक नहीं थी
– हवाई जहाज़ नहीं थे
– इंटरनेट नहीं था
– कंप्यूटर नहीं थे
– नाटक नहीं थे
– टीवी नहीं था
– सिनेमा नहीं था
– वायु प्रदूषण नहीं था
– गाड़ियाँ नहीं थीं
– मोबाइल फोन नहीं थे
उसके पिता ने उत्तर दिया:
“जैसे आज तुम्हारी पीढ़ी जी रही है…”
– भक्ति नहीं
– ज्ञान नहीं
– संतों का परिचय नहीं
– ग्रंथों का ज्ञान नहीं
– शांति नहीं
– संयम नहीं
– धर्मनिष्ठा नहीं
– कुल-धर्म और परंपराएँ नहीं
– प्रार्थनाएँ नहीं
– त्योहार नहीं
– करुणा नहीं
– सम्मान नहीं
– आदर नहीं
– आदर्श नहीं
– संस्कार नहीं
– लज्जा नहीं
– रिश्ते-नाते नहीं
– नम्रता नहीं
– स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता नहीं
– समय का नियोजन नहीं
– खेल नहीं
– पढ़ने की आदत नहीं
– सेवा भाव नहीं
“हम, जो 1940 से 1980 के बीच जन्मे लोग हैं, वास्तव में धन्य हैं।
हमारा जीवन इसका जीवंत प्रमाण है:”
खेलते समय और साइकिल चलाते हुए हमने कभी हेलमेट नहीं पहना।
 स्कूल से आने के बाद शाम तक खेलते रहते थे, कभी टीवी नहीं देखते थे।
 हमने इंटरनेट मित्रों के साथ नहीं, बल्कि सच्चे मित्रों के साथ खेला।
प्यास लगने पर नल का पानी पिया, बोतलबंद पानी नहीं।
 हम कभी बीमार नहीं पड़े, फिर भी चार दोस्त एक ही गिलास में जूस पी लेते थे।
रोज़ भरपेट चावल खाने के बावजूद हमारा वजन कभी नहीं बढ़ा।
 नंगे पाँव चलने पर भी हमारे पैरों को कुछ नहीं हुआ।
 माता-पिता ने हमें स्वस्थ रखने के लिए कभी सप्लीमेंट्स का उपयोग नहीं किया।
 हम अपने खिलौने खुद बनाते थे और उनसे खेलते थे।
 हमारे माता-पिता अमीर नहीं थे, लेकिन उन्होंने हमें प्यार दिया, भौतिक चीज़ें नहीं।
हमारे पास मोबाइल, डीवीडी, प्ले स्टेशन, एक्सबॉक्स, वीडियो गेम, पर्सनल कंप्यूटर या इंटरनेट चैट नहीं था — लेकिन हमारे पास सच्चे दोस्त थे।
 हम बिना बुलाए दोस्तों के घर चले जाते थे और उनके साथ भोजन करते थे।
 आज की दुनिया के विपरीत, हमारे रिश्तेदार पास-पास रहते थे, इसलिए पारिवारिक समय और रिश्ते खुशहाल थे।
 हम भले ही ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों में हों, लेटिन उन तस्वीरों में रंगीन यादें हैं।
हम एक अनोखी और सबसे समझदार पीढ़ी हैं,
क्योंकि हम आख़िरी पीढ़ी थे जिन्होंने अपने माता-पिता की बात मानी,
और पहली पीढ़ी हैं जिन्हें अपने बच्चों की बात सुननी पड़ी।
और हम ही वे लोग हैं जो आज भी समझदार हैं और
उस तकनीक को सीखने-समझने में आपकी मदद कर रहे हैं
जो हमारे समय में अस्तित्व में ही नहीं थी।

अंत में —
दिन तो चले गए, लेकिन यादें रह गईं।

Wednesday, February 11, 2026

वास्तविक चरित्र

राजा भोज के दरबार में एक विद्वान आए। वे अनेक भाषाऐं धारा प्रवाह रूप से बोलते थे।
भोज यह जानना चाहते थे कि उनकी मातृ-भाषा क्या है? पर संकोचवश पूछ न सके।
विद्धान जी के चले जाने के बाद राजा ने अपनी शंका दरबारियों के सामने रखी और पूछा- क्या आपमें से कोई बता सकता है कि विद्धान जी की मातृभाषा क्या है?
विदूषक ने कहा- आज तो नहीं कल मैं पता लगा दूँगा कि उनकी अपनी भाषा क्या है?
दूसरे दिन नियत समय पर पंडित जी आए और दरबार समाप्त होने पर जब वे जाने लगे तो विदूषक ने उन्हें सीढियों पर धक्का लगा दिया, जिससे वे गिर पडे, उन्हें थोडी चोट लगी।
विदूषक की अशिष्टता पर उन्हें बहुत क्रोध आया और वे धडाधड गालियाँ देने लगे। जिस भाषा में वे गालियाँ दे रहे थे उसे ही उनकी मातृ-भाषा मान लिया गया।
प्रकट में विदूषक पर राजा ने भी क्रोध दिखाया पर मन ही मन सभी ने उसकी सूझ की प्रशंसा की।
विद्धान जी के जाने के बाद विदूषक बोला- “तोता तभी तक राम-राम कहता है जब तक कोई मुसीबत उस पर नहीं आती। पर जब बिल्ली सामने आती है तो वह बस टें-टें ही बोलता है। इसी प्रकार क्रोध में मनुष्य असली भाषा बोलने लगता है।”
राज पुरोहित ने कहा- “विपत्ति आने पर मनुष्य के असली व्यक्तित्व का पता चलता है। साधारण समय में लोग आवरण में छिपे रहते हैं पर कठिनाई के समय वे वैसा ही आचरण करते हैं जैसे कि वस्तुतः वे होते हैं।

शिक्षा 
जो मौका मिलने पर या विपत्ति में भी स्वार्थ के लिए गलत मार्ग न अपनाए वही ईमानदार और वास्तविक चरित्रवान है।

जगन्नाथ का भात,जगत पसारे हाथ

एक बार तुलसीदास जी महाराज को किसी ने बताया कि जगन्नाथ जी में तो साक्षात भगवान ही दर्शन देते हैं, बस फिर क्या था सुनकर तुलसीदास जी महाराज तो बहुत ही प्रसन्न हुए और अपने इष्टदेव का दर्शन करने श्रीजगन्नाथपुरी को चल दिए।

महीनों की कठिन और थका देने वाली यात्रा के उपरांत जब वह जगन्नाथ पुरी पहुंचे तो मंदिर में भक्तों की भीड़ देख कर प्रसन्न मन से अंदर प्रविष्ट हुए। जगन्नाथ जी का दर्शन करते ही उन्हें बड़ा धक्का सा लगा, वह निराश हो गये। और विचार किया कि यह हस्तपादविहीन देव हमारे जगत में सबसे सुंदर नेत्रों को सुख देने वाले मेरे इष्ट श्री राम नहीं हो सकते।

इस प्रकार दुखी मन से बाहर निकल कर दूर एक वृक्ष के तले बैठ गये। सोचा कि इतनी दूर आना व्यर्थ हुआ। क्या गोलाकार नेत्रों वाला हस्तपादविहीन दारुदेव मेरा राम हो सकता है? कदापि नहीं।

रात्रि हो गयी, थके-माँदे, भूखे-प्यासे तुलसी का अंग टूट रहा था। अचानक एक आहट हुई। वे ध्यान से सुनने लगे। अरे बाबा! तुलसीदास कौन है?

एक बालक हाथों में थाली लिए पुकार रहा था। तुलसीदास ने सोचा साथ आए लोगों में से शायद किसी ने पुजारियों को बता दिया होगा कि तुलसीदास जी भी दर्शन करने को आए हैं इसलिये उन्होने प्रसाद भेज दिया होगा। तुलसीदास उठते हुए बोले, 'हाँ भाई! मैं ही हूँ तुलसीदास।'

बालक ने कहा, 'अरे! आप यहाँ हैं। मैं बड़ी देर से आपको खोज रहा हूँ।'

बालक ने कहा, 'लीजिए, जगन्नाथ जी ने आपके लिए प्रसाद भेजा है।'

तुलसीदास बोले, 'भैया कृपा करके इसे वापस ले जायँ।'

बालक ने कहा, आश्चर्य की बात है, 'जगन्नाथ का भात-जगत पसारे हाथ' और वह भी स्वयं महाप्रभु ने भेजा और आप अस्वीकार कर रहे हैं, कारण?

तुलसीदास बोले, 'अरे भाई ! मैं बिना अपने इष्ट को भोग लगाये कुछ ग्रहण नहीं करता। फिर यह जगन्नाथ का जूठा प्रसाद जिसे मैं अपने इष्ट को समर्पित न कर सकूँ, यह मेरे किस काम का?'

बालक ने मुस्कराते हुए कहा 'अरे, बाबा! आपके इष्ट ने ही तो भेजा है।'

तुलसीदास बोले, 'यह हस्तपादविहीन दारुमूर्ति मेरा इष्ट नहीं हो सकता।'

बालक ने कहा कि फिर आपने अपने श्रीरामचरितमानस में यह किस रूप का वर्णन किया है...

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना ।।

आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।

अब तुलसीदास की भाव-भंगिमा देखने लायक थी। नेत्रों में अश्रु-बिन्दु, मुख से शब्द नहीं निकल रहे थे। थाल रखकर बालक यह कहकर अदृश्य हो गया कि 'मैं ही तुम्हारा राम हूँ। मेरे मंदिर के चारों द्वारों पर हनुमान का पहरा है। विभीषण नित्य मेरे दर्शन को आता है। कल प्रातः तुम भी आकर दर्शन कर लेना।'

तुलसीदास जी की स्थिति ऐसी की रोमावली रोमांचित थी, नेत्रों से अस्त्र अविरल बह रहे थे और शरीर की कोई सुध ही नहीं। उन्होंने बड़े ही प्रेम से प्रसाद ग्रहण किया।

प्रातः मंदिर में जब तुलसीदास जी महाराज दर्शन करने के लिए गए तब उन्हें जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के स्थान पर श्री राम, लक्ष्मण एवं जानकी के भव्य दर्शन हुए। भगवान ने भक्त की इच्छा पूरी की।

जिस स्थान पर तुलसीदास जी ने रात्रि व्यतीत की थी, वह स्थान 'तुलसी चौरा' नाम से विख्यात हुआ। वहाँ पर तुलसीदास जी की पीठ 'बड़छतामठ' के रूप में प्रतिष्ठित है..!!

Wednesday, January 7, 2026

हनुमान जी किसके भक्त

एक बार प्रभु श्रीरामजी और माता सीताजी में एक मीठी बहस छिड़ गई।
विषय था: "हनुमान किसे ज्यादा मानते हैं?"
श्रीरामजी बोले: "हनुमान मेरा भक्त है।"
माता सीताजी बोलीं: "आप भ्रम में हैं प्रभुजी, वह मुझे अधिक मानता है।"
तय हुआ कि हनुमान जी की परीक्षा ली जाए। जब हनुमान जी चरण सेवा के लिए आए, तो दोनों ने एक साथ अपनी-अपनी मांग रख दी।
 माता सीताजी बोलीं: "हनुमान! प्यास लगी है, जल ले आओ।"
 उसी क्षण श्रीरामजी बोले: "हनुमान! बहुत गर्मी है, पंखा झलो, वरना मैं मूर्छित हो जाऊंगा।"
हनुमान जी ठिठक गए! धर्मसंकट!
पहले जल लाएं या पंखा झलें? दोनों ही कार्य अति शीघ्र करने थे। हनुमान जी समझ गए कि आज "दाल में कुछ काला है"।
 हनुमान जी की बुद्धिमत्ता:
उन्होंने जोर से जयकारा लगाया— "जय सियाराम जी!"
और अपनी भक्ति के प्रभाव से अपनी दोनों भुजाएं लंबी कर दीं।
एक हाथ से माता सीताजी को जल का गिलास दिया और उसी क्षण दूसरे हाथ से प्रभु रामजी को पंखा झलने लगे।
हनुमान जी ने हंसकर कहा:
"प्रभुजी! न मैं केवल रामजी का भक्त हूँ, न केवल सीताजी का... मैं तो युगल सरकार 'सीतारामजी' का भक्त हूँ।"
हनुमान जी की यह चतुरता और प्रेम देखकर प्रभु रामजी और माता सीताजी गदगद हो गए और उन्हें गले लगा लिया।
सच है, जहाँ रामजी, वहाँ सीताजी और जहाँ ये दोनों, वहाँ हनुमान! 
जय सिया रामजी! जय हनुमानजी!