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Saturday, August 15, 2026

कलयुग का दरोगा

गांव के एक छोटे से किनारे पर, झोंपड़ी में रहने वाला बृजलाल नामक एक गरीब किसान रहता था। ज़मीन थोड़ी थी, शरीर थका हुआ, लेकिन मन में ईमानदारी और भगवान पर अटूट विश्वास था।
एक दिन सुबह के वक्त, जब वो अपने छोटे से खेत में गया, तो उसकी निगाह एक हरे-भरे पौधे पर पड़ी। हैरानी की बात ये थी कि उसने वहां कुछ बोया ही नहीं था, लेकिन लौकी का पौधा लहलहा रहा था। और उस पर तीन मोटी-ताज़ी लौकियाँ लगी थीं—साफ़, चमकती हुई, मानो खुद कुदरत ने उसे एक तोहफा भेजा हो।
उसने खुशी-खुशी तीनों लौकियाँ तोड़ीं, घर लौटते हुए बच्चों से कहा, "अगर ये बिक गईं, तो मिठाई लाऊंगा।" घरवालों की आंखों में एक उम्मीद सी चमक उठी।
गाँव के हाट में पहुंचकर बृजलाल एक किनारे बैठ गया। भीड़-भाड़ से दूर, सिर पर पुरानी टोपली लगाए, आँखों में एक भोलापन लिए वो राहगीरों की तरफ उम्मीद से देखता रहा।
तभी गाँव के प्रधान जी आये। भारी मूँछें, सीना फुलाया हुआ, और साथ में दो चमचों की टोली। उन्होंने एक लौकी उठाई और बोले, "बृजलाल, बाद में पैसे दे दूंगा।" किसान ने कुछ कहने की कोशिश की, पर शब्द गले में अटक गए। प्रधान चलते बने।
कुछ देर बाद थाने का मुंशी रामदयाल आया। बिना कुछ पूछे दूसरी लौकी उठाई और बोले, "कितनी बढ़िया माल है, भई वाह!" और मुस्कुराते हुए चल दिया।
अब बस एक लौकी बची थी। बृजलाल का मन घबरा रहा था। वह आसमान की तरफ देखकर बुदबुदाया, "हे भगवान, कम से कम ये बचा ले।"
तभी सामने से दरोगा रघुनाथ सिंह आते दिखाई दिए—ऊँचा कद, मूंछें तनी हुईं, आँखों में तेज और चेहरे पर कठोर पर सच्ची इंसानियत का भाव।
उन्होंने रुककर पूछा, “किसके लिए बैठा है लौकी लेकर?”
बृजलाल हकलाते हुए बोला, “मालिक… दो तो ले गए… ये बची है, आप चाहें तो ले जाइए…”
दरोगा ने गौर से देखा। कुछ समझ में आया। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “बताओ, क्या हुआ?”
किसान ने धीरे-धीरे पूरा हाल सुना दिया।
दरोगा मुस्कुराए। बोले, “चलो, मेरे साथ।”
पहले वो प्रधान जी के घर पहुंचे। वहां प्रधान जी चारपाई पर ताव देते बैठे थे और उनकी पत्नी लौकी काट रही थी। दरोगा ने पूछा, “ये लौकी कहाँ से लाई?”
प्रधान बोले, “बाजार से खरीदी है।”
“कितने में?” दरोगा ने फिर पूछा।
अब प्रधान जी की आवाज़ हल्की हो गई, आँखें बृजलाल पर टिक गईं। दरोगा ने तीखा स्वर अपनाया, “सीधा-सीधा बोलो। किसान को एक हज़ार रुपये दो नहीं तो चोरी और दबाव की FIR लिखूँगा।”
बहुत कहासुनी के बाद, प्रधान ने बुझे मन से एक हज़ार रुपये थमा दिए।
फिर दरोगा किसान को लेकर थाने पहुंचे। वहां सब सिपाही कतार में खड़े किए गए। बृजलाल ने कांपते हुए एक हवलदार की तरफ इशारा किया। दरोगा गरजे, “वर्दी में हो और हरकत चोरों जैसी? शर्म नहीं आती?”
उन्होंने जेब से हज़ार रुपये निकलवाए और किसान को सौंप दिए।
अब बृजलाल और भी घबरा गया। सोच रहा था, कहीं दरोगा अब सब रुपये न छीन ले।
वो धीरे से जाने लगा।
तभी दरोगा ने आवाज़ लगाई, “अरे रुक, तीसरी लौकी का क्या?”
फिर उन्होंने अपने पर्स से एक हज़ार का नोट निकाला और किसान के हाथ में रखा।बोले, “ये तीसरी लौकी का दाम है। अब जब भी किसी ने तुझे सताया,सीधे मेरे पास आना।बृजलाल की आंखें भर आईं। वह हाथ जोड़कर बोला, “मालिक,आज के दिन भगवान ने खुद दरोगा का रूप लिया है।

Wednesday, August 12, 2026

सेवाराम और मोतीलाल

सेवाराम और मोतीलाल दो घनिष्ठ मित्र थे ।दोनों ही गली-गली जाकर पीठ पर पोटली लादकर कपड़े बेचने का काम करते थे ।सर्दियों के दिन थे वह गांव-गांव जाकर कपड़े बेच रहे थे तभी एक झोपड़ी के बाहर एक बुढ़िया जो कि ठंड से कांप रही थी तो सेवाराम ने अपनी पोटली से एक कंबल निकालकर उस माई को दिया और कहां माई तुम ठंड से कांप रही हो यह कंबल ओढ़ लो तो बूढ़ी माई कंबल लेकर बहुत खुश हुई और जल्दी जल्दी से उसने कंबल से अपने आप को ढक लिया और सेवाराम को खूब सारा आशीर्वाद दिया। तभी उसने सेवाराम को कहा मेरे पास पैसे तो नहीं है लेकिन रुको मैं तुम्हें कुछ देती हूं। वह अपनी झोपड़ी के अंदर गई तभी उसके हाथ में एक बहुत ही सुंदर छोटी सी ठाकुर जी की प्रतिमा थी ।वह सेवाराम को देते हुए बोली कि मेरे पास देने के लिए पैसे तो नहीं है लेकिन यह ठाकुर जी है इसको तुम अपनी दुकान पर लगा कर खूब सेवा करना देखना तुम्हारी कितनी तरक्की होती है ।यह मेरा आशीर्वाद है तो तभी मोतीराम बुढ़िया के पास आकर बोला, अरे ओ माता जी क्यों बहाने बना रही हो अगर पैसे नहीं है तो कोई बात नहीं लेकिन हमें झूठी तसल्ली मत दो हमारे पास तो कोई दुकान नहीं है। हम इसको कहां लगाएंगे ।इनको तुम अपने पास ही रखो। लेकिन सेवाराम जो कि बहुत ही नेक दिल था और ठाकुर जी को मानने वाला था वह बोला नहीं-नहीं माताजी अगर आप इतने प्यार से कह रही हैं तो यह आप मुझे दे दो। पैसों की आप चिंता मत करो तो सेवाराम ने जल्दी से अपने गले में पढ़े हुए परने में ठाकुर जी को लपेट लिया और उनको लेकर चल पड़ा ।तो बुढ़िया दूर तक उनको आशीर्वाद दे रही थी। हरी तुम्हारा ध्यान रखेंगे ठाकुर जी तुम्हारा ध्यान रखेंगे। वह तब तक आशीर्वाद देती रही जब तक कि वह दोनों उनकी आंखों से ओझल ना हो गए ।और ठाकुर जी का ऐसा ही चमत्कार हुआ अब धीरे-धीरे दोनों की कमाई ज्यादा होने लगी अब उन्होंने एक साइकिल खरीद ली अब साइकिल पर ठाकुरजी को आगे टोकरी में रखकर और पीछे पोटली रखकर गांव गांव कपड़े बेचने लगे ।अब फिर उनको और ज्यादा कमाई होने लगी तो उन्होंने एक दुकान किराए पर ले ले और वहां पर ठाकुर जी को बहुत ही सुंदर आसन पर विराजमान करके दुकान का मुहूर्त किया। धीरे-धीरे दुकान इतनी चल पड़ी कि अब सेवाराम और मोती लाल के पास शहर में बहुत ही बड़ी बड़ी कपड़े की दुकाने और कपड़े की मिल्लें हो गई। 
 1 दिन मोतीलाल सेवाराम को कहता कि देखो आज हमारे पास सब कुछ है यह हम दोनों की मेहनत का नतीजा है लेकिन सेवाराम बोला नहीं नहीं हम दोनों की मेहनत के साथ-साथ यह हमारे ठाकुर जी हमारे हरि की कृपा है। तो मोतीलाल बात को अनसुनी करके वापस अपने काम में लग गया। एक दिन सेवाराम की सेहत थोड़ी ढीली थी इसलिए वह दुकान पर थोड़ी देरी से आया तो मोतीलाल बोला अरे दोस्त आज तुम देरी से आए हो तुम्हारे बिना तो मेरा एक पल का गुजारा नहीं तुम मेरा साथ कभी ना छोड़ना तो सेवाराम हंसकर बोला अरे मोतीलाल चिंता क्यों करते हो मैं नहीं आऊंगा तो हमारे ठाकुर जी तो है ना ।यह कहकर सेवा राम अपने काम में लग गया। पहले दोनों का घर दुकान के पास ही होता था लेकिन अब दोनों ने अपना घर दुकान से काफी दूर ले लिया। अब दोनों ही महल नुमा घर में रहने लगे। दोनों ने अपने बच्चों को खूब पढ़ाया लिखाया । सेवाराम के दो लड़के थे दोनों की शादी कर दी थी और मोती लाल के एक लड़का और एक लड़की थी मोतीलाल ने अभी एक लड़के की शादी की थी अभी उसने अपनी लड़की की शादी करनी थी। सेहत ढीली होने के कारण सेवाराम अब दुकान पर थोड़े विलंब से आने लगा तो एक दिन वह मोतीलाल से बोला अब मेरी सेहत ठीक नहीं रहती क्या मैं थोड़ी विलम्ब से आ सकता हूं तो मोतीलाल ने कहा हां भैया तुम विलम्ब से आ जाओ लेकिन आया जरूर करो मेरा तुम्हारे बिना दिल नहीं लगता। फिर अचानक एक दिन सेवाराम 12:00 बजे के करीब दुकान पर आया लेकिन आज उसके चेहरे पर अजीब सी चमक थी चाल में एक अजीब सी मस्ती थी चेहरे पर अजीब सी मुस्कान थी वह आकर गद्दी पर बैठ गया तो मोतीलाल ने कहा भैया आज तो तुम्हारी सेहत ठीक लग रही है तो सेवाराम ने कहा भैया ठीक तो नहीं हूं लेकिन आज से मैं बस केवल 12:00 बजे आया करूंगा और 5:00 बजे चला जाया करूंगा। मैं तो केवल इतना ही दुकान पर बैठ सकता हूं ।तो मोतीलाल ने कहा कोई बात नहीं जैसी तुम्हारी इच्छा। अब तो सेवाराम रोज 12:00 बजे आता और 5:00 बजे चला जाता लेकिन उसकी शक्ल देखकर ऐसा नहीं लगता था कि वह कभी बीमार भी है। लेकिन मोतीलाल को अपने दोस्त पर पूरा विश्वास था कि वह झूठ नहीं बोल सकता और मेहनत करने से वह कभी पीछे नहीं हट सकता ।
एक दिन मोतीलाल की बेटी की शादी तय हुई तो वह शादी का निमंत्रण देने के लिए सेवाराम के घर गया ।घर जाकर उसको उसके बेटा बहू सेवाराम की पत्नी सब नजर आ रहे थे लेकिन सेवाराम नजर नहीं आ रहा था तो उसने सेवाराम की पत्नी से कहा भाभी जी सेवाराम कहीं नजर नहीं आ रहा तो उसकी पत्नी एकदम से हैरान होती हुई बोली यह आप क्या कह रहे हैं? तभी वहां उसके बेटे भी आ गए और कहने लगी काका जी आप कैसी बातें कर रहे हो हमारे साथ कैसा मजाक कर रहे हो। तो मोतीलाल बोला कि मैंने ऐसा क्या पूछ लिया मैं तो अपने प्रिय दोस्त के बारे में पूछ रहा हूं क्या उसकी तबीयत आज भी ठीक नही है क्या वह अंदर आराम कर रहा है।मै खुद अंदर जाकर उसको मिल आता हूं।तो मोतीलाल उसके कमरे में चला गया लेकिन सेवाराम उसको वहां भी नजर नहीं आया। तभी अचानक उसकी नजर उसके कमरे में सेवाराम के तस्वीर पर पडी ।वह एकदम से हैरान होकर सेवा राम की पत्नी की तरफ देखता हुआ बोला ।अरे भाभी जी यह क्या आपने सेवाराम की तस्वीर पर हार क्यों चढ़ाया हुआ है तो सेवा राम की पत्नी आंखों में आंसू भर कर बोली। मुझे आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी भैया कि आप ऐसा मजाक करेंगे। मोतीलाल को कुछ समझ नहीं आ रहा था तभी सेवाराम का बेटा बोला क्या आपको नहीं पता कि पिताजी को गुजरे तो 6 महीने हो चुके हैं ।मोतीलाल को तो ऐसा लगा कि जैसे उसके सिर पर बिजली गिर पड़ी हो ।वह एकदम से थोड़ा लड़खडाता हुआ पीछे की तरफ हटा और बोला ऐसा कैसे हो सकता है वह तो हर रोज दुकान पर आते हैं। बीमार होने के कारण थोड़ा विलंब से आता है वह 12:00 बजे आता है और 5:00 बजे चला जाता है। तो उसकी पत्नी बोली ऐसा कैसे हो सकता है कि आपको पता ना हो आप ही तो हर महीने उनके हिस्से का मुनाफे के पैसे हमारे घर देने आते हो 6 महीनों से तो आप हमें दुगना मुनाफा दे कर जा रहे हो। मोतीलाल का तो अब सर चकरा गया उसने कहा मैं तो कभी आया ही नहीं। 6 महीने हो गए यह क्या मामला है तभी उसको सेवाराम की कही बात आई मैं नहीं रहूंगा तो मेरे हरी है ना मेरे ठाकुर जी है ना वह आएंगे ।तो मोतीलाल को जब यह बातें याद आई तो वह जोर जोर से रोने लगा और कहने लगा हे ठाकुर जी, हे हरि आप अपने भक्तों के शब्दों का कितना मान रखते हो जोकि अपने विश्राम के समय मंदिर के पट 12:00 बजे बंद होते हैं और 5:00 बजे खुलते हैं और आप अपने भक्तों के शब्दों का मान रखने के लिए कि मेरे हरी आएंगे मेरे ठाकुर जी आएंगे तो आप अपने आराम के समय मेरी दुकान पर आकर अपने भक्तों का काम करते थे । इतना कहकर वह फूट-फूट कर रोने लगा और कहने लगा ठाकुर जी आप की लीला अपरंपार है मैं ही सारी जिंदगी नोट गिनने में लगा रहा असली भक्त तो सेवाराम था जो आपका प्रिय था और आपने उसको अपने पास बुला लिया और उसके शब्दों का मान रखने के लिए आप उसका काम खुद स्वयं कर रहे थे। और उसके हिस्से का मुनाफा भी उसके घर मेरे रूप में पहुँचा रहे थे। इतना कहकर वह भागा भागा दुकान की तरफ गया और वहां जाकर जहां पर ठाकुर जी जिस गद्दी पर आकर बैठते थे जहां पर अपने चरण रखते थे वहां पर जाकर गद्दी को अपने आंखों से मुंह से चुमता हुआ चरणों में लौटता हुआ जार जार रोने लगा। और ठाकुर जी की जय जयकार करने लगा।
 ठाकुर जी तो हमारे ऐसे हैं । सेवाराम को उन पर विश्वास था कि मैं ना रहूंगा मेरे ठाकुर जी मेरा सारा काम संभालेंगे ।विश्वास के तो बेड़ा पार है इसलिए हमें हर काम उस पर विश्वास रख कर अपनी डोरी उस पर छोड़ देनी चाहिए। जिनको उन पर पूर्ण विश्वास है वह उनकी डोरी कभी भी नहीं अपने हाथ से छूटने देंते।
जय हो ठाकुर जी आपकी ।

Tuesday, August 11, 2026

शोरगुल किसलिये

मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी। हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी। मक्खी भिनभिनाई की आवाज मे कहा, ‘भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना, वजन ज्यादा लगे तो खबर कर देना, मैं हट जाऊंगी।’ लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा। 
फिर हाथी एक पुल पर से गुजरने लगा, बड़ी पहाड़ी नदी थी, भयंकर गङ्ढ था, मक्खी ने कहा कि ‘देखलो, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना। मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी।’ हाथी के कान में थोड़ी-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी, पर उसने कुछ ध्यान न दिया। फिर मक्खी के विदा होने का वक्त आ गया। उसने कहा, ‘यात्रा बड़ी सुखद हुई, साथी-संगी रहे, मित्रता बनी, अब मैं जाती हूं, कोई काम हो, तो मुझे कहना.. तब मक्खी की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी, उसने कहा, ‘तू कौन है कुछ पता नहीं, कब तू आयी, कब तू मेरे शरीर पर बैठी, कब तू उड़ गयी, इसका मुझे कोई पता नहीं है। लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी... 
सन्त कहते हैं, ‘हमारा होना भी ऐसा ही है। इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। हाथी और मक्खी के अनुपात से भी कहीं छोटा, हमारा और ब्रह्मांड का अनुपात है। हमारे ना रहने से क्या फर्क पड़ता है? लेकिन हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं। वह शोरगुल किसलिये है? वह मक्खी क्या चाहती थी? वह चाहती थी कि हाथी स्वीकार करे, मैं भी हूँ.. मेरा भी अस्तित्व है, वह कहना चाहती थी। 
हमारा अहंकार अकेले नहीं जी सकता, दूसरे उसे मानें तो ही जी सकता है। इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें, हमारी तरफ देखें और हमारी उपेक्षा न हो। 
सन्त विचार- हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों को दिखाने के लिये... स्नान करते हैं सजाते-संवारते हैं ताकि दूसरे हमें सुंदर समझें, धन इकट्ठा करते, मकान बनाते, तो दूसरों को दिखाने के लिये.. दूसरे देखें और स्वीकार करें कि हम कुछ विशिष्ट हैं, ना कि साधारण। हम मिट्टी से ही बने हैं और फिर मिट्टी में मिल जाएंगे। हम अज्ञान के कारण खुद को खास दिखाना चाहते हैं वरना तो हम बस एक मिट्टी के पुतले हैं और कुछ नहीं। अहंकार सदा इस तलाश में रहता है कि वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें।
शिक्षा - याद रखना चाहिए आत्मा के निकलते ही यह मिट्टी का पुतला फिर मिट्टी बन जाएगा इसलिए हमे झूठा अहंकार त्याग कर,जब तक जीवन है सदभावना पूर्वक जीना चाहिए और सब का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि जीवों में परमात्मा का अंश आत्मा  हैं।

Sunday, August 9, 2026

श्री कृष्ण ने स्त्री रूप लीला

मीरा का मान रखने के लिये स्वयं श्री कृष्ण ने स्त्री रूप धारण किया !!
राणा सांगा के पुत्र और अपने पति राजा भोजराज की मृत्यु के बाद जब संबन्धीयो के मीरा बाई पर अत्याचार अपने चरम पर जा पहुँचे तो मीरा बाई मेवाड़ को छोड़कर तीर्थ को निकल गई। घूमते-घूमते वे वृन्दावन धाम जा पहुँची।
जीव गोसांई वृंदावन में वैष्णव-संप्रदाय के मुखिया थे। मीरा जीव गोसांई के दर्शन करना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने मीरा बाई से मिलने से मना कर दिया। उन्होंने मीरा को संदेशा भिजवाया कि वह किसी औरत को अपने सामने आने की इजाजत नहीं देंगे। मीराबाई ने इसके जवाब में अपना संदेश भिजवाया कि "वृंदावन में हर कोई औरत है। अगर यहां कोई पुरुष है तो केवल गिरिधर गोपाल। आज मुझे पता चला कि वृंदावन में कृष्ण के अलावा यहां कोई और भी पुरुष है।"
जीव गुसाईं ने सुबह जब भगवान कृष्ण के मंदिर के पट खोले तो हैरत से उनकी आँखें फटी रह गई ! सामने विराजमान भगवान कृष्ण की मूर्ति घाघरा चोली पहने हुये थी, कानों में कुंडल, नाक में नथनी, पैरों में पाजेब, हाथों में चूड़ियाँ मतलब वे औरत के संपूर्ण स्वरूप को धारण किये हुये थे।
जीव गुसाईं ने मंदिर सेवक को आवाज लगाई, किसने किया ये सब ??
कृष्ण की सौगंध पुजारी जी मंदिर में आपके जाने के बाद किसी का प्रवेश नही हुआ ये पट आपने ही बंद किये और आपने ही खोले।
जीव गुसाईं अचंभित थे, सेवक बोला कुछ कहूँ पुजारी जी।
वे खोए-खोए से बोले, हाँ बोलो..
पास ही धर्मशाला में एक महिला आई हुई हैं जिसने कल आपसे मिलने की इच्छा जताई थी, आप तो किसी महिला से मिलते नहीं इसलिये आपने उनसे मिलने से मना कर दिया, परन्तु लोग कहते हैं कि वो कोई साधारण महिला नही उनके एकतारे में बड़ा जादू हैं कहते हैं वो जब भजन गाती हैं तो हर कोई अपनी सुधबुध बिसरा जाता हैं, कृष्ण भक्ति में लीन जब वो नाचती हैं तो स्वयं कृष्ण का स्वरूप जान पड़ती हैं। आपने उनसे मिलने से इंकार किया कही ऐसा तो नही भगवान जी आपको कोई संदेश देना चाहते हो ?
जीव गुसाईं तुरंत समझ गए कि उनसे बहुत बड़ी भूल हो गई हैं, मीरा बाई कोई साधारण महिला नही अपितु कोई परम कृष्णभक्त हैं।
वे सेवक से बोले भक्त मुझे तुरंत उनसे मिलना हैं चलो कहाँ ठहरी हैं वो मैं स्वयं उनके पास जाऊँगा।
जीव गुसाईं मीरा जी के सामने नतमस्तक हो गये और भरे कंठ से बोले मुझ अज्ञानी को आज आपने भक्ति का सही स्वरूप दिखाया हैं देवी इसके लिये मैं सदैव आपका आभारी रहूंगा।आईए चलकर स्वयं अपनी भक्ति की शक्ति देखिये।
मीरा बाई केवल मुस्कुराई वे कृष्ण कृष्ण करती उनके पीछे हो चली। मंदिर पहुँचकर जीव गौसाई एक बार फिर अचंभित हुये कृष्ण भगवान वापस अपने स्वरूप में लौट आये थे, पर एक अचम्भा और भी था उन्हें कभी कृष्ण की मूर्ति में मीरा बाई दिखाई पड़ती तो कभी मीराबाई में कृष्ण।

सिमटता अंतिम संस्कार

रिश्तों की राख और वीडियो कॉल पर सिमटता अंतिम संस्कार: आधुनिक समाज की ढहती मानवीय संवेदनाएँ
मुम्बई के कभी जाने-माने कपड़ा व्यापारी रहे 74 वर्षीय शिवचरण राम रतन गुप्ता जब जीवन के ढलान पर पहुँचे, तो उन्हें शायद इस बात का गुमान भी नहीं रहा होगा कि जिन तीन बेटियों को उन्होंने उँगली पकड़कर चलना सिखाया, पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाया और धूमधाम से विदा किया, वही बेटियाँ जीवन के अंतिम पड़ाव पर उनके लिए पराए से भी बदतर साबित होंगी। व्यापार में घाटा होने और परिस्थितियाँ विपरीत होने पर शिवचरण जी सोनीपत के वृद्धाश्रम में शरण लेने को मजबूर हुए। अपनी बीमार और मानसिक अवसाद से जूझ रही पत्नी को भी उन्होंने वृद्धाश्रम में ही बुलवाया। दुखद बात यह रही कि कुछ माह बाद जब उनकी पत्नी ने दम तोड़ा, तो तीनों बेटियों में से कोई भी उनके अंतिम दर्शन के लिए नहीं पहुँची। अपनी जन्मदात्री माँ का अंतिम संस्कार बेटियों ने मोबाइल की स्क्रीन पर वीडियो कॉल के जरिए देखा। माँ के जाने के बाद शिवचरण जी अकेले पड़ गए और सोनीपत के ही एक अन्य नि:शुल्क वृद्धाश्रम 'समाज कल्याण शिक्षा समिति' में चले गए, जहाँ वे गुमनामी और अकेलेपन में अपने दिन काटने लगे।
4 अगस्त की अलसुबह जब शिवचरण जी का निधन हुआ, तो वृद्धाश्रम संचालक ने तुरंत उनकी बेटियों को सूचित किया। परंतु संवेदनाओं का दिवालियापन तो देखिए, बड़ी बेटी ने आने से स्पष्ट इनकार कर दिया और अंतिम संस्कार के खर्च के रूप में वृद्धाश्रम के नंबर पर ₹5100 ऑनलाइन ट्रांसफर कर दिए। बेटी का कहना था कि दूरी बहुत ज्यादा है, इसलिए वे नहीं आ सकतीं और पिता का दाह संस्कार करके चिता की वीडियो कॉल से तस्वीर दिखा दी जाए। लावारिसों की तरह समाजसेवियों और स्थानीय श्मशान सेवा समिति के सहयोग से उनका अंतिम संस्कार किया गया और वह ₹5,100 की राशि भी वापस लौटा दी गई। हद तो तब हो गई जब 48 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पिता की अस्थियाँ श्मशान घाट में लावारिस पड़ी रहीं। जब बेटियों से अस्थियाँ ले जाकर गंगा में प्रवाहित करने का अनुरोध किया गया, तो जवाब मिला कि "जब पिताजी ही नहीं रहे, तो अस्थियों का क्या करेंगे, आप ही विसर्जित कर देना।" जिस पिता ने अपना पूरा जीवन बच्चों के भविष्य को सींचने में लगा दिया, उसकी अस्थियों को दो गज पवित्र जल भी अपने औलाद के हाथों नसीब नहीं हुआ।
शिवचरण राम रतन गुप्ता की यह गाथा केवल एक व्यक्ति या परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे भारतीय समाज के नैतिक और सामाजिक पतन का एक भयावह आईना है। आज देश के कोने-कोने में स्थित वृद्धाश्रम ऐसे ही बदनसीब माँ-बाप की चीखों और सिसकियों से भरे पड़े हैं। कहीं प्रोफेसर भाई और शिक्षित भतीजों ने छल से जायदाद अपने नाम करवाकर बुजुर्ग को बेघर कर दिया, तो कहीं 18 किल्ले जमीन के मालिक माँ-बाप को औलाद ने चार दिन तक भूखा रखकर मारपीट कर घर से खदेड़ दिया। विडंबना यह है कि समाज में जैसे-जैसे शिक्षा, संपन्नता और आधुनिकता बढ़ रही है, वैसे-वैसे पारिवारिक मूल्यों और मानवीय मर्यादाओं का क्षरण हो रहा है। उच्च पदों पर बैठे, विदेशों में बसे या अत्यधिक पढ़े-लिखे बच्चे अक्सर आर्थिक दौड़ और पारिवारिक गृह-क्लेश का बहाना बनाकर अपने बूढ़े माँ-बाप को बोझ समझने लगते हैं।
अत्यधिक भौतिकवादी होते इस दौर में 'मर्यादा' और 'मानवता' पूरी तरह तार-तार हो चुकी है। जिस देश में श्रवण कुमार की गाथाएँ गाई जाती थीं, जहाँ माता-पिता को ईश्वर से भी ऊँचा दर्जा दिया जाता था, वहाँ आज औलाद अपने ही जन्मदाताओं की मृत्यु को महज़ एक नोटिफिकेशन और वीडियो कॉल तक सीमित कर चुकी है। आर्थिक तंगी, आपसी अनबन या व्यस्तता चाहे जो भी कारण हों, लेकिन किसी भी तर्क से उस औलाद के अपराध को क्षम्य नहीं ठहराया जा सकता जो जीवित रहते माँ-बाप को दाने-दाने के लिए तरसाए और मरने के बाद उनकी अस्थियों तक का दुलार न दे सके। यदि आज भी समाज ने इस गंभीर पतन पर आत्मचिंतन नहीं किया और अपनी नई पीढ़ी को मानवीय संवेदनाओं के संस्कार नहीं दिए, तो याद रहे कि समय का चक्र निर्दयी है और जो बीज आज बोए जा रहे हैं, कल उसकी फसल इन्हीं औलादों को भी काटनी पड़ेगी।

Friday, August 7, 2026

राज्य के मंत्री

पुराने जमाने की बात है। एक राजा ने दूसरे राजा के पास एक पत्र और सुरमे की एक छोटी सी डिबिया भेजी। 
पत्र में लिखा था कि जो सुरमा भिजवा रहा हूं, वह अत्यंत मूल्यवान है। इसे लगाने से अंधापन दूर हो जाता है। राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे किस-किस को दे।उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी-खासी थी, पर सुरमे की मात्रा बस इतनी  थी जिससे दो आंखों की रोशनी लौट सके। 
राजा इसे अपने किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ति को देना चाहता था। तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। वह मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था।राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेंगी।
राजा ने मंत्री को बुलवा भेजा और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, ‘इस सुरमे को आंखों में डालें। आप पुन: देखने लग जाएंगे। ध्यान रहे यह केवल 2 आंखों के लिए है।’ मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। उसकी रोशनी आ गई। उस आंख से मंत्री को सब कुछ दिखने लगा।  फिर उसने बचा- खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया। 
यह देखकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, ‘यह आपने क्या किया? 
अब तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी। लोग आपको काना कहेंगे।’ मंत्री ने जवाब दिया, ‘राजन, चिंता न करें। 
मैं काना नहीं रहूंगा। मैं आंख वाला बनकर हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंगा। 
मैंने चखकर यह जान लिया है कि सुरमा किस चीज से बना है।  मैं अब स्वयं सुरमा बनाकर नेत्रहीनों को बांटूंगा।’ 
राजा ने मंत्री को गले लगा लिया और कहा, ‘यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। अगर हर राज्य के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा।

Thursday, August 6, 2026

एक बार भगवान शिवजी ने शनिदेव जी को पीपल के पेड़ से 19 वर्षों तक लटकाकर रखा था।

उन्होंने ऐसा क्यों किया था, शनिदेव जी को ऐसी सजा क्यों दी थी, चलिए जानते हैं.
पौराणिक प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार सूर्यदेव जी ने अपने सभी पुत्रों को उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें अलग-अलग लोक बाँट दिए लेकिन शनिदेव जी अपनी शक्ति के अहंकार में चूर इस बात से खुश नहीं थे। इसलिए, उन्होंने अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए बाकी लोकों पर भी अधिकार जमा लिया।शनिदेव जी की इस हरकत से सूर्यदेव जी बहुत दुःखी थे और वो मदद माँगने भगवान् शिवजी के पास पहुंचे।
भगवान् शिवजी ने सूर्यदेव जी की आराधना पर अपने गणों को शनिदेव जी से युद्ध करने के लिए भेजा, लेकिन शनिदेव जी ने सभी को परास्त कर दिया। इसके बाद भगवान शंकरजी स्वयं शनिदेव जी से युद्ध करने आये। शनिदेव जी ने भगवान शंकर पर मारक दृष्टि डाली, तो भगवन शंकरजी ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर शनिदेव जी के अहंकार को तोड़ दिया।
शनिदेव जी को सबक सिखाने के लिए भगवान् शिवजी ने उन्हें 19 वर्षों तक पीपल के पेड़ से उल्टा लटका दिया। इन्ही 19 वर्षों के दौरान शनिदेव जी भगवान शंकरजी की उपासना करते रहे। यही वजह है कि शनि महादशा 19 वर्षों की होती है।
पुत्र की यह दशा सूर्यदेव जी से देखी नहीं गयी। उन्होंने भगवान् शिवजी से अपने पुत्र की ग़लती की माफी माँगी और भगवान शिवजी से शनिदेव जी के लिए जीवनदान भी माँगा। इसके बाद भगवान शिवजी ने शनिदेव जी को मुक्त कर दिया और भगवान शिवजी ने शनिदेव जी को उनकी शक्तियों का प्रयोग न्यायसंगत तरीके से करने का आशीर्वाद दिया है। उसके बाद से शनिदेव जी उनके मार्गदर्शन के अधीन रहते हैं। भगवन शिवजी ने शनिदेव जी को अपना शिष्य बनाकर उन्हें दंडाधिकारी नियुक्त कर दिया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शनिदोष से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिवजी की पूजा की जाती है क्योंकि शनिदेव जी न केवल भगवान् शिव के प्रति बहुत आदर रखते हैं, हमेशा उनकी भक्ति में डूबे रहते हैं बल्कि उनसे डरते भी हैं।
ऐसा माना जाता है कि भगवान शिवजी की पूजा से शनिदेव जी का क्रोध शांत होता है और व्यक्ति को शनिदोष से राहत मिलती है।