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Sunday, April 12, 2026

गोपीभाव की महिमा

भगवान श्री कृष्ण गोपियों के नित्य ऋणी हैं, उन्होंने अपना यह सिद्धात घोषित किया है:-

             “ये यथा माँ प्रपधन्ते तांस्तथै भजाम्यहम।“ 

          अर्थात जो मुझे जैसे भजते है उन्हें मैं वैसे ही भजता हूँ। इसका यह तात्पर्य समझा जाता है कि भक्त जिस प्रकार से और जिस परिमाण के फल को दृष्टि में रखकर भजन करता है, भगवान उसको उसी प्रकार और उसी परिमाण में फल देकर उसका भजन करते हैं।
          सकाम, निष्काम शांत, दास्य, वात्सल्य, सख्य, आदि कि जिस प्रकार की कामना, भावना, भक्त की होती है, भगवान उसे वही वस्तु प्रदान करते हैं। परन्तु गोपियों के सम्बन्ध में भगवान के इस सिद्धात वाक्य कि रक्षा नहीं हो सकी इसके प्रधान तीन कारण है-

01. गोपी के कोई भी कामना नहीं है। अतएव श्रीकृष्ण उन्हें क्या दें।

02. गोपी की कामना है केवल श्रीकृष्णसुख की, श्रीकृष्ण इस कामना की पूर्ति करने जाते हैं तो उनको स्वयं अधिक सुखी होना पडता है। अतः इस दान से ऋण और भी बढ़ता है।

03. जहाँ गोपियों ने सर्व त्याग करके केवल श्री कृष्ण के प्रति ही अपने को समर्पित कर दिया है, वहाँ श्रीकृष्ण का अपना चित्त बहुत जगह बहुत से प्रेमियों के प्रति प्रेम युक्त है अतएव गोपी प्रेम अनन्य और अखंड है कृष्ण प्रेम विभक्त और खंडित है।

          इसी से गोपी के भजन का बदला उसी रूप में श्रीकृष्ण उसे नहीं दे सकते, और इसी से अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए वे कहते हैं, "गोपियों तुमने मेरे लिए घर की उन बेडियों को तोड़ डाला है, जिन्हें बड़े-बड़े योगी-यति भी नहीं तोड़ पाते, मुझसे तुम्हारा यह मिलन, यह आत्मिक संयोग सर्वथा निर्मल और सर्वथा निर्दोष है। यदि मैं अमर शरीर से, अमर जीवन से, अनंत काल तक, तुम्हारे प्रेम, सेवा और त्याग का बदला चुकाना चाहूँ, तो भी नहीं चुका सकता। मैं सदा तुम्हारा ऋणी हूँ तुम अपने सौम्य स्वभाव से ही, प्रेम से ही, मुझे उऋण कर सकती हो परन्तु मैं तो तुम्हारा ऋणी ही हूँ। 
          इसलिए प्रेममार्गी भक्त को चाहिये कि वह अपनी समझ से तन, मन, वचन से होने वाली प्रत्येक चेष्टा को श्रीकृष्ण सुख के लिए ही करे, जब-जब मन में प्रतिकूल स्थिति प्राप्त हो, तब-तब उसे श्रीकृष्ण कि सुखेच्छाजनित स्थिति समझकर परमसुख का अनुभव करे, यों करते-करते जब प्रेमी भक्त केवल श्रीकृष्णसुख-काम अनन्यता पर पहुँच जाता है, तब श्रीकृष्ण के मन की बात भी उसे मालूम होने लगती है गोपियों के श्रीकृष्णानुकुल जीवन में यह प्रत्यक्ष प्रमाण है।
          इसलिए भगवान अर्जुन से कहते हैं, "गोपियाँ, मेरी सहायिका, मेरी गुरु, शिष्या, भोग्या, बान्धव स्त्री हैं। अर्जुन ये गोपियाँ मेरी क्या नहीं हैं ? सबकुछ हैं मेरी महिमा को, मेरी सेवा को, मेरी श्रद्धा को, और मेरे मन के भीतरी भावों को गोपियाँ ही जानती हैं दूसरा कोई नहीं जानता।"

गोपियों की मटकियाँ

श्रीकृष्ण नित्य ही मथुरा माखन लेकर जाती हुयी गोपियों का माखन खा जाते हैं, और कंकड़ मार कर उनकी मटकियाँ भी फोड़ देते हैं। 
श्रीकृष्ण के माखन खाने से तो गोपियों का मन खुश होता था परन्तु उनके मटकी फोड़ देने से वे बहुत चिन्तित हो जाती थीं,माखन तो वे अपने प्रेम से ही कान्हा के लिये तैयार किया करती थीं किन्तु मटकी तो दाम चुका कर मिलती थे एक बार सभी गोपियाँ एकत्र हो इस की शिकायत ले श्रीजी के समक्ष जा पहुँचीं। श्रीजी अपने प्रियतम के इस कृत्य को सुन अति-द्रवित हो उठीं, और श्रीकृष्ण से मान कर बैठीं।जब श्रीकृष्ण को श्रीजी के मान का पता चला तोअति-विचलित हो उठे और अविलम्ब श्रीजी को मनाने के लिये उनके पास चल दिये। राह में उन्हें सखी चित्रा मिली उन्होंने उन्हें श्रीजी के मान का कारण बताया, तथा उनका मान समाप्त करने के लिये बताया कि आपने जितनी गोपियों की मटकियाँ फोड़ी हैं उनके बदले उन्हें एक की जगह दस मटकियाँ बनाकर देनी होगीं वह भी सुन्दर चित्रकारी के साथ।
 श्रीजी को मान में देखना श्रीकृष्ण के लियै सम्भव नहीं होता इसलिये वे अविलम्ब श्रीजी का मान भंग करने के लिये सभी गोपियों की इच्छानुसार उसनी पसन्द की मटकियाँ बना कर देने लगे। जब सभी गोपियाँ की मटकियाँ बना दी तब जाकर श्रीजी का मान भंग हुआ।





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Sunday, March 29, 2026

चुहिया का स्वयंवर

गंगा नदी के तट पर कुछ तपस्वियों का आश्रम था जहाँ याज्ञवल्क्य नाम के ऋषि रहते थे. एक दिन वो नदी के किनारे आचमन कर रहे थे. उसी वक़्त आकाश में एक बाज अपने पंजे में एक चुहिया को दबाये जा रहा था जो उसकी पकड़ से छूटकर ऋषि की पानी से भरी हथेली में आ गिरी. ऋषि ने उसे एक पीपल के पत्ते पर रखा और दोबारा नदी में स्नान किया. चुहिया अभी मरी नहीं थी इसलिए ऋषि ने अपने तप से उसे एक कन्या बना दिया और आश्रम में ले आये. अपनी पत्नी से कहा इसे अपनी बेटी ही समझकर पालना. दोनों निसंतान थे इसलिए उनकी पत्‍नी ने कन्या का पालन बड़े प्रेम से किया. कन्या उनके आश्रम में पलते हुए बारह साल की हो गयी तो उनकी पत्‍नी ने ऋषि से उसके विवाह के लिए कहा।
ऋषि ने कहा में अभी सूर्य को बुलाता हूँ. यदि यह हाँ कहे तो उसके साथ इसका विवाह कर देंगे ऋषि ने कन्या से पूछा तो उसने कहा यह अग्नि जैसा गरम है,कोई इससे अच्छा वर बुलाइये।
तब सूर्य ने कहा बादल मुझ से अच्छे हैं, जो मुझे ढक लेते हैं बादलों को बुलाकर ऋषि ने कन्या से पूछा तो उसने कहा यह बहुत काले हैं कोई और वर ढूँढिए।
फिर बादलों ने कहा वायु हमसे भी वेगवती है जो हमें उड़ाकर ले जाती है।
तब ऋषि ने वायु को बुलाया और कन्या की राय माँगी तो उसने कहा “पिताजी यह तो बड़ी चंचल है. किसी और वर को बुलाइए।
इस पर वायु बोले पर्वत मुझसे अच्छा है, जो तेज़ हवाओं में भी स्थिर रहता है।
अब ऋषि ने पर्वत को बुलाया और कन्या से पूछा. कन्या ने उत्तर दिया “पिताजी, ये बड़ा कठोर और गंभीर है, कोई और अच्छा वर ढूँढिए न।
इस पर पर्वत ने कहा चूहा मुझसे अच्छा है, जो मुझमें छेद कर अपना बिल बना लेता है।
ऋषि ने तब चूहे को बुलाया और बेटी से कहा “पुत्री यह मूषकराज क्या तुम्हें स्वीकार हैं?
कन्या ने चूहे को देखा और देखते ही वो उसे बेहद पसंद आ गया. उस पर मोहित होते हुए वो बोली आप मुझे चुहिया बनाकर इन मूषकराज को सौंप दीजिये।
ऋषि ने तथास्तु कह कर उसे फिर चुहिया बना दिया और मूषकराज से उसका स्वयंवर करा दिया।

शिक्षा :-
जन्म से जिसका जैसा स्वभाव होता है वह कभी नहीं बदल सकता,जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।

Tuesday, March 24, 2026

श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र की महिमा

देवी दुर्गा के १०८ नामों का यह पवित्र स्तोत्र दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र वास्तव में साधना का एक अत्यंत सरल और प्रभावशाली माध्यम है, किन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि यद्यपि लगभग ९०% लोगों को इन नामों का ज्ञान है, फिर भी उनकी वास्तविक महिमा से अधिकांश लोग अनभिज्ञ रहते हैं। सामान्यतः लोग इन नामों को केवल एक पाठ या परंपरा के रूप में देखते हैं, परंतु वास्तव में ये नाम केवल शब्द नहीं, बल्कि देवी की जीवंत शक्तियाँ हैं। प्रत्येक नाम अपने भीतर एक विशेष ऊर्जा और कृपा का संचार करता है। कैलासपति महादेव ने अपनी प्रिया को यह नाम (भक्तों के उद्धार के लिए संवाद रूप में) बताये हैं। जिनके स्मरण या सुमिरन से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।-जब साधक श्रद्धा और विश्वास के साथ इन नामों का जप करता है, तब वह धीरे-धीरे इन शक्तियों से जुड़ने लगता है और उसका जीवन भीतर से परिवर्तित होने लगता है।

इन १०८ नामों की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सरलता है। ये नाम इतने सहज और स्पष्ट हैं कि कोई भी व्यक्ति- चाहे वह विद्वान हो या अनपढ़- उन्हें आसानी से याद कर सकता है। आज के युग में जब यू ट्यूब जैसे माध्यम उपलब्ध हैं, तो इन नामों को सुनकर स्मरण करना और भी सरल हो गया है। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन इन नामों को सुनता है, तो कुछ ही समय में ये स्वतः ही उसकी स्मृति में स्थिर हो जाते हैं। यह सरलता ही इस स्तोत्र की विशेष शक्ति है, क्योंकि यह हर वर्ग के व्यक्ति के लिए साधना का द्वार खोलती है।

भक्ति के मार्ग में विद्वता की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सच्चे भाव की आवश्यकता होती है, और यह स्तोत्र उसी भाव को जागृत करता है। यदि कोई साधक इन नामों का नित्य १० बार उच्चारण करता है, तो शास्त्रों के अनुसार मात्र तीन महीनों में ही उसे अद्भुत कृपा का अनुभव होने लगता है। यहाँ “अद्भुत कृपा” का अर्थ केवल भौतिक लाभ नहीं, बल्कि मानसिक शांति, आत्मबल, और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन से है।

जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से इन नामों का जप करता है, तब उसका मन शुद्ध होने लगता है, उसके विचार सकारात्मक बनते हैं, और उसके भीतर एक नई ऊर्जा का संचार होता है। यह परिवर्तन धीरे-धीरे उसके जीवन के सभी क्षेत्रों में दिखाई देने लगता है- चाहे वह परिवार हो, कार्यक्षेत्र हो या व्यक्तिगत जीवन। इस प्रकार यह स्तोत्र केवल एक धार्मिक पाठ नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और सफल बनाने का एक साधन बन जाता है।

विशेष रूप से नारियों के लिए यह स्तोत्र अत्यंत उपयोगी और कल्याणकारी है। जो महिलाएँ विभिन्न कारणों से विस्तृत पूजा-पाठ नहीं कर पातीं, वे भी अपने दैनिक कार्य करते हुए इन नामों को सुन सकती हैं। उदाहरण के लिए, रोटी बनाते समय यदि वे इन नामों का श्रवण करती हैं, तो भी उन्हें इसका पूर्ण लाभ प्राप्त होता है। 

भक्ति का संबंध बाहरी क्रियाओं से अधिक आंतरिक भावना से होता है। यदि मन में श्रद्धा और समर्पण हो, तो साधना किसी भी परिस्थिति में की जा सकती है। इस प्रकार यह स्तोत्र उन सभी के लिए एक वरदान है, जो समयाभाव के कारण नियमित पूजा नहीं कर पाते, लेकिन फिर भी देवी की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं।

साध्वी और नियमपूर्वक साधना करने वाली नारियों के लिए इसका प्रभाव और भी अधिक बताया गया है। यदि कोई साध्वी नारी नवरात्रि के पावन दिनों में बैठकर नियमानुसार प्रतिदिन १२ बार इसका पाठ करती है, तो शास्त्रों के अनुसार वह “सर्वज्ञ” हो जाती है। यहाँ “सर्वज्ञ” होने का अर्थ यह नहीं कि वह सब कुछ जानने लगती है, बल्कि उसका विवेक अत्यंत प्रखर हो जाता है। वह सही और गलत का निर्णय करने में सक्षम हो जाती है, उसके भीतर आत्मज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है, और वह जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने लगती है। यह अवस्था वास्तव में आध्यात्मिक उन्नति का उच्च स्तर है, जिसे प्राप्त करना हर साधक का लक्ष्य होता है।

इस स्तोत्र के पाठ के लिए कुछ विशेष नियम भी बताए गए हैं, जो इसकी प्रभावशीलता को और बढ़ाते हैं। देवी की पूजा करके, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके, श्रद्धा और एकाग्रता के साथ इसका पाठ करना विशेष फलदायी माना गया है। उत्तर दिशा ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा मानी जाती है, इसलिए इस दिशा में बैठकर किया गया जप साधक के मन को अधिक स्थिर और केंद्रित करता है। इसके अतिरिक्त, कुमारी पूजन और देवी का ध्यान करके इस स्तोत्र का पाठ करना इसकी शक्ति को और अधिक बढ़ा देता है। यह सब नियम साधना को अनुशासित और प्रभावशाली बनाने के लिए हैं।
इस स्तोत्र की महिमा केवल इसके जप तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके माहात्म्य में भी अनेक अद्भुत फल बताए गए हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि-

जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, उसके लिए तीनों लोकों में कुछ भी असाध्य नहीं रहता। नित्य १० पाठ अखण्ड ब्रह्मचर्य पूर्वक सतत् ३ माह में यह स्तोत्र भक्त को अद्वितीय कर देता है। आर्या स्तोत्र की भाँति यह अद्वितीय स्तोत्र बहुत ही सौभाग्य से साधक को प्राप्त होता है और परम सौभाग्य से ही साधक इसकी सहस्र आवृत्ति कर पाता है। उसे धन, धान्य, संतान, वाहन और सभी प्रकार के भौतिक सुख प्राप्त होते हैं, और अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ति भी होती है। 

इसे अष्टगंध से लिखने की महिमा भी अत्यधिक है। जो भोजपत्र पर अष्टगंध से लिखकर इसे अपने कंठ पर धारण करता है वह साक्षात् शिव के तुल्य हो जाता है। ऐसे धारणकर्ता के दर्शन साक्षात् परमात्मा शिव के दर्शन के समान फलदायी होते हैं।

यह दर्शाता है कि यह स्तोत्र केवल सांसारिक सुखों के लिए ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मुक्ति के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह साधक को जीवन के चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- प्राप्त करने में सहायता करता है।

इसके अतिरिक्त, इस स्तोत्र में यंत्र और विशेष तिथियों पर इसके पाठ के भी निर्देश दिए गए हैं, जो इसकी तांत्रिक और गूढ़ साधना को दर्शाते हैं। उदाहरण के लिए, विशेष योग में यंत्र लिखकर और इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को विशेष सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं। यह दर्शाता है कि यह स्तोत्र केवल सामान्य भक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि उच्च स्तर की साधना के लिए भी उपयोगी है। हालांकि, इन गूढ़ साधनाओं के लिए उचित मार्गदर्शन और शुद्ध भाव अत्यंत आवश्यक है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र केवल १०८ नामों का एक संग्रह नहीं है, बल्कि यह देवी की सम्पूर्ण शक्ति का संक्षिप्त रूप है। यह स्तोत्र साधक के जीवन को भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। जो व्यक्ति इसे श्रद्धा, विश्वास और नियम के साथ अपनाता है, उसके जीवन में निश्चित ही अद्भुत परिवर्तन होता है। यह स्तोत्र हमें यह सिखाता है कि भक्ति का मार्ग सरल है, लेकिन उसमें निरंतरता और सच्चे भाव की आवश्यकता है।

इस प्रकार यह स्तोत्र हर व्यक्ति के लिए एक अमूल्य धरोहर है- चाहे वह विद्वान हो या सामान्य गृहस्थ, पुरुष हो या नारी। यदि इसे सही भाव और विधि के साथ अपनाया जाए, तो यह न केवल जीवन की समस्याओं को दूर करता है, बल्कि साधक को एक उच्च आध्यात्मिक अवस्था तक भी पहुँचाता है। यही इसकी वास्तविक महिमा है और यही इसका सर्वोच्च फल है।
 
    * श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् *

ईश्वर उवाच।
शतनाम प्रवक्ष्यामि श‍ृणुष्व कमलानने।
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती।।१।।

ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।
आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी।।२।।

पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः।
मनो बुद्धिरहङ्कारा चित्तरूपा चिता चितिः।।३।।

सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी।।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः।।४।।

शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी।।५।।

अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।
पट्टाम्बर परीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी।।६।।

अमेयविक्रमा क्रुरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता।।७।।

ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः।।८।।

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहन वाहना।।९।।

निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी।।१०।।

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा।।११।।

अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः।।१२।।

अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला।।१३।।

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी।।१४।।

शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी।।१५।।

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम्।
नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति।।१६।।

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च।
चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्।।१७।।

कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्।
पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम्।।१८।।

तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैः सुरवरैरपि।
राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात्।।१९।।

गोरोचनालक्तककुङ्कुमेव सिन्धूरकर्पूरमधुत्रयेण।
विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः।।२०।।

भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते।
विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम्।।२१।।

   ।। इति श्रीविश्वसारतन्त्रे दुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रं समाप्तम् ।।

Wednesday, March 11, 2026

मन एक जगह रुकता नहीं

एक बार शंकराचार्य अपने शिष्यों के साथ नदी के किनारे बैठे थे। सुबह का सूरज धीरे-धीरे उग रहा था। हवा शांत थी। सब लोग ध्यान कर रहे थे। लेकिन एक शिष्य के चेहरे पर बेचैनी साफ दिख रही थी।
यह देखकर शंकराचार्य ने धीरे से पूछा :--
“आज तुम्हारा मन बहुत बेचैन है। तुम्हें क्या परेशान कर रहा है?”
शिष्य ने सिर झुकाकर कहा
“स्वामी, जब मैं ध्यान के लिए बैठता हूँ, तो मन रुकता ही नहीं। कभी भक्ति, कभी गुस्सा, कभी इच्छा। कभी पुरानी यादें, कभी भविष्य का डर। मन मेरी सुनता ही नहीं। मैं इस मन को कैसे पकड़ूँ?”
शंकराचार्य थोड़ा मुस्कुराए और बोले
“क्या तुम नदी देख रहे हो?”
शिष्य ने कहा
“हाँ, स्वामी।”
“नदी बह रही है, है ना?”
“हाँ, यह रुकती नहीं।”
“क्या इसका बहाव रोका जा सकता है?”
“यह मुमकिन नहीं है, स्वामी।”
“लेकिन क्या नदी के किनारे खड़े व्यक्ति को याद है?”
“नहीं, स्वामी।” 
शंकराचार्य ने धीरे से कहा
“मन एक नदी की तरह है। यह बहता रहता है। विचार इसका पानी हैं। तुम उस पानी को रोकने की कोशिश कर रहे हो। इसीलिए यह मुश्किल है। तुम पानी नहीं हो। तुम किनारा हो।”
शिष्य ने हैरानी से उनकी तरफ देखा। उन्होंने आगे कहा
“मन गुस्सा, इच्छाएं, डर लाता है। उन्हें आने दो। उन्हें जाने दो। उनके गवाह बनो। फिर मन तुम पर अपनी ताकत खो देता है।”
उसी समय, एक बंदर वहां आया। वह पेड़ से पेड़ पर कूद रहा था, एक पल के लिए कूद रहा था। शंकराचार्य ने उसकी तरफ इशारा किया और कहा “क्या तुम यह देख रहे हो? 
बंदर एक जगह नहीं रहता। मन और भी बेचैन होता है। अगर तुम इसे बांधने की कोशिश करोगे, तो यह और भी दूर भागेगा।”
शिष्य ने पूछा
“तो मन का क्या किया जाए, स्वामी?”
शंकराचार्य ने ज़मीन पर एक पत्थर उठाया और कहा
“यह पत्थर शांत है। क्योंकि इसमें कोई विचार नहीं हैं। लेकिन यह समझदार नहीं है।
मन अशांत हो जाता है। यह स्वाभाविक है। लेकिन तुम्हें इसका मालिक बनना होगा।”
उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं और कहा
“एक पल के लिए अपनी आँखें बंद करो। जो भी विचार तुम्हारे मन में आए, उसे पकड़कर मत रखो। उसे दबाओ मत। बस देखो।”
कुछ पलों बाद, शिष्य ने अपनी आँखें खोलीं। उसके चेहरे पर शांति आ गई।
“स्वामी… विचार आए… लेकिन मैं उनमें नहीं गया। जैसे ही मैंने देखा, वे अपने आप चले गए।”
शंकराचार्य ने कहा
“यही मन का राज़ है।
तुम मन को कंट्रोल करने की कोशिश मत करो।
मन को समझो।
मन दुश्मन नहीं है मन एक टूल है।
जब यह अज्ञान से मिलता है, तो यह बंधन है
जब यह ज्ञान से मिलता है, तो यह मुक्ति है।
शिष्य ने फिर पूछा
स्वामी, क्या ऐसा कोई दिन आएगा जब मन पूरी तरह से रुक जाएगा?
शंकराचार्य ने नदी की ओर देखा और कहा
जब नदी समुद्र से मिलती है, तो वह बहती नहीं है।
जब मन खुद को जान लेता है, तो वह लहर नहीं बनता। 
उस दिन गुस्सा आता है पर टिकता नहीं,इच्छा आती है पर कसती नहीं
डर आता है पर टिकता नहीं वहाँ मन गुलाम बन जाता है स्वयं राजा बन जाता है।
शिष्य ने सिर झुकाया। उस दिन उसे मन को जीतने का तरीका मिल गया।पकड़कर नहीं जानकर।

मरने के कितने दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक

मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता। हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद स्वर्ग-नरक की मान्यता है। पुराणों के अनुसार जो मनुष्य अच्छे कर्म करता है, वह स्वर्ग जाता है,जबकि जो मनुष्य जीवन भर बुरे कामों में लगा रहता है, उसे यमदूत नरक में ले जाते हैं। सबसे पहले जीवात्मा को यमलोक लेजाया जाता है। वहां यमराज उसके पापों के आधार पर उसे सजा देते हैं।

मृत्यु के बाद जीवात्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है, इसका विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में है। गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य के प्राण निकलते हैं और किस तरह वह पिंडदान प्राप्त कर प्रेत का रूप लेता है।

गरुड़ पुराण के अनुसार जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है। उसकी सभी इंद्रियां नष्ट हो जाती हैं। वह जड़ अवस्था में आ जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उसके मुंह से झाग निकलने लगता है और लार टपकने लगती है। पापी पुरुष के प्राण नीचे के मार्ग से निकलते हैं।

- मृत्यु के समय दो यमदूत आते हैं। वे बड़े भयानक, क्रोधयुक्त नेत्र वाले तथा पाशदंड धारण किए होते हैं। वे नग्न अवस्था में रहते हैं और दांतों से कट-कट की ध्वनि करते हैं। यमदूतों के कौए जैसे काले बाल होते हैं। उनका मुंह टेढ़ा-मेढ़ा होता है। नाखून ही उनके शस्त्र होते हैं। यमराज के इन दूतों को देखकर प्राणी भयभीत होकर मलमूत्र त्याग करने लग जाता है। उस समय शरीर से अंगूष्ठमात्र (अंगूठे के बराबर) जीव हा हा शब्द करता हुआ निकलता है।

- यमराज के दूत जीवात्मा के गले में पाश बांधकर यमलोक ले जाते हैं। उस पापी जीवात्मा को रास्ते में थकने पर भी यमराजके दूत भयभीत करते हैं और उसे नरक में मिलने वाली यातनाओं के बारे में बताते हैं। यमदूतों की ऐसी भयानक बातें सुनकर पापात्मा जोर-जोर से रोने लगती है, किंतु यमदूत उस पर बिल्कुल भी दया नहीं करते हैं।

- इसके बाद वह अंगूठे के बराबर शरीर यमदूतों से डरता और कांपता हुआ, कुत्तों के काटने से दु:खी अपने पापकर्मों को याद करते हुए चलता है। आग की तरह गर्म हवा तथा गर्म बालू पर वह जीव चल नहीं पाता है। वह भूख-प्यास से भी व्याकुल हो उठताहै। तब यमदूत उसकी पीठ पर चाबुक मारते हुए उसे आगे ले जाते हैं। वह जीव जगह-जगह गिरता है और बेहोश हो जाता है। इस प्रकार यमदूत उस पापी को अंधकारमय मार्ग से यमलोक ले जाते हैं।

- गरुड़ पुराण के अनुसार यमलोक 99 हजार योजन (योजन वैदिक काल की लंबाई मापने की इकाई है। एक योजन बराबर होता है, चार कोस यानी 13-16 कि.मी) दूर है। वहां पापी जीव को दो- तीन मुहूर्त में ले जाते हैं। इसके बाद यमदूत उसे भयानक यातना देते हैं। यह याताना भोगने के बाद यमराज की आज्ञा से यमदूत आकाशमार्ग से पुन: उसे उसके घर छोड़ आते हैं।

- घर में आकर वह जीवात्मा अपने शरीर में पुन: प्रवेश करने की इच्छा रखती है, लेकिन यमदूत के पाश से वह मुक्त नहीं हो पातीऔर भूख-प्यास के कारण रोती है। पुत्र आदि जो पिंड और अंत समयमें दान करते हैं, उससे भी प्राणी की तृप्ति नहीं होती, क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती। इस प्रकार भूख-प्यास से बेचैन होकर वह जीव यमलोक जाता है।

- जिस पापात्मा के पुत्र आदि पिंडदान नहीं देते हैं तो वे प्रेत रूप हो जाती हैं और लंबे समय तक निर्जन वन में दु:खी होकर घूमती रहती है। काफी समय बीतने के बाद भी कर्म को भोगना ही पड़ता है, क्योंकि प्राणी नरक यातना भोगे बिना मनुष्य शरीर नहीं प्राप्त होता। गरुड़ पुराण के अनुसार मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान अवश्य करना चाहिए। उस पिंडदान के प्रतिदिन चार भाग हो जाते हैं। उसमें दो भाग तो पंचमहाभूत देह को पुष्टि देने वाले होते हैं, तीसरा भाग यमदूत का होता है तथा चौथा भाग प्रेत खाता है। नवें दिन पिंडदान करने से प्रेत का शरीर बनता है। दसवें दिनपिंडदान देने से उस शरीर को चलने की शक्ति प्राप्त होती है।

- गरुड़ पुराण के अनुसार शव को जलाने के बाद पिंड से हाथ के बराबर का शरीर उत्पन्न होता है। वही यमलोक के मार्ग में शुभ-अशुभ फल भोगता है। पहले दिन पिंडदान से मूर्धा (सिर), दूसरे दिन गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से हृदय, चौथे दिन के पिंड से पीठ, पांचवें दिन से नाभि, छठे और सातवें दिन से कमर और नीचे का भाग, आठवें दिन से पैर, नवें और दसवें दिन से भूख-प्यास उत्पन्न होती है। यह पिंड शरीर को धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल प्रेतरूप में ग्यारहवें और बारहवें दिन का भोजन करता है।

- यमदूतों द्वारा तेरहवें दिन प्रेत को बंदर की तरह पकड़ लिया जाता है। इसके बाद वह प्रेत भूख-प्यास से तड़पता हुआ यमलोक अकेला ही जाता है। यमलोक तक पहुंचने का रास्ता वैतरणी नदी को छोड़कर छियासी हजार योजन है। उस मार्ग पर प्रेत प्रतिदिन दो सौ योजन चलता है। इस प्रकार 47 दिन लगातार चलकर वह यमलोक पहुंचता है। मार्ग में सोलह पुरियों को पार कर पापी जीव यमराज के घर जाता है।

- इन सोलह पुरियों के नाम इस प्रकार है - सौम्य, सौरिपुर, नगेंद्रभवन, गंधर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापाद, दु:खद, नानाक्रंदपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण,शीतढ्य, बहुभीति। इन सोलह पुरियों को पार करने के बाद यमराजपुरी आती है। पापी प्राणी यमपाश में बंधा मार्ग में हाहाकार करते हुए यमराज पुरी जाता है... ।

Monday, March 2, 2026

पचास राजकुमारियों से विवाह की रोचक कथा


परम तपस्वी सौभरि ऋषि एक बार यमुना के जल में तपस्या कर कर रहे थे। माया बड़े-बड़े महात्माओं को भी आकर्षित लेती है। उन्होंने देखा कि दो मछलियाँ मैथुन (संभोग) कर रही थीं। 
यह दृश्य देखकर उनके हृदय में विचार आया कि मैथुन में सुख अवश्य है, तभी यह छोटा सा जीव भी इतना आनंदित हो रहा है। यह सोचकर उन्होंने निश्चय कर लिया कि उन्हें भी यह सुख प्राप्त करना चाहिए।
महान तपस्वी सौभरि जी के मन में विवाह की इच्छा उत्पन्न हुई। वे सीधे राजा मान्धाता के पास गए। राजा के महल में पचास राजकुमारियाँ थीं। 
सौभरि ऋषि ने राजा से कहा, "मुझे एक राजकुमारी भिक्षा में दीजिए, जिससे मैं विवाह कर सकूं।" 
यह स्थिति राजा के लिए एक बड़ी समस्या बन गई, क्योंकि सौभरि ऋषि के शरीर से मछलियों जैसी जल की गंध आ रही थी और उनका शरीर इतना दुर्बल था कि उनकी हड्डियाँ दिखाई दे रही थीं। ऐसे में कौन सी राजकुमारी उन्हें पसंद करेगी? 
इन कारणों से राजा ने कूटनीतिक उत्तर दिया, "ब्रह्मण, जो कन्या आपको पसंद कर ले, आप उसे स्वीकार कर सकते हैं।"
सौभरि ऋषि ने राजा मान्धाता का भाव समझ लिया। उन्होंने सोचा, "तुम मुझे बूढ़ा और कुरूप समझकर ऐसा कह रहे हो। क्योंकि मेरे शरीर पर झुर्रियाँ पड़ गई हैं, बाल सफेद हो गए हैं, और मेरा रूप बिगड़ चुका है, तो तुम यह मान रहे हो कि मुझे कोई स्वीकार नहीं करेगा। 
पर मैं अब ऐसा रूप धारण करूंगा कि तुम्हारी सभी पचास राजकुमारियाँ मुझसे विवाह करने के लिए आपस में झगड़ेंगी।"
सौभरि ऋषि ने राजा से कहा, "अपनी राजकुमारियों को आदेश दीजिए कि सौभरि ऋषि महल में पधार रहे हैं। जो भी मुझे अपना पति बनाना चाहें, वे मुझे वरण कर सकती हैं।" 
तपस्वी महापुरुषों के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं होता। सौभरि जी ने अपने संकल्प से अत्यंत सुंदर रूप धारण कर लिया। 
देखिए, जब कामना जागृत हुई, तो भजन और तप का प्रयोग कहाँ होने लगा! सौभरि जी के सुंदर रूप को देखकर पचासों राजकुमारियाँ उनसे विवाह करने के लिए दौड़ पड़ीं और अंततः सभी ने उन्हें अपना पति बना लिया।
वे पचासों कन्याएँ इतने सामर्थ्यशाली महात्मा को अपने पति के रूप में पाकर अत्यंत सुखी हो गईं। लेकिन जल्द ही वे एक-दूसरे से कलह करने लगीं और कहने लगीं, "यह तुम्हारे योग्य नहीं, बल्कि मेरे योग्य हैं।" 
इस स्थिति को देखकर सौभरि जी ने कहा, "झगड़ो मत। मैं तुम सबके योग्य हूँ।" 
अपनी तपस्या के प्रभाव से उन्होंने नई सृष्टि की रचना की। यमुना किनारे उन्होंने कई महल, उपवन और नगरों का निर्माण कर दिया। 
सुगंधित पुष्पों के बगीचे, कमलों से भरे सरोवर, और सुंदर-सुंदर स्थानों के साथ महलों में बहुमूल्य शैयाएँ, आसन, वस्त्र, आभूषण, दास-दासियाँ- यह सब उन्होंने अपनी तपस्या से प्रकट कर दिया। अब सौभरि जी के पास एक राजा के समान वैभव था।
जब सौभरि जी पचास राजकुमारियों से विवाह करके अपने नए जीवन की ओर बढ़े, तो राजा मान्धाता के मन में यह चिंता थी कि इतने बड़े परिवार के लिए यह ऋषि भोजन और अन्य आवश्यकताओं की व्यवस्था कैसे करेंगे। 
इस पर सौभरि जी ने राजा से कहा, "कल यमुना किनारे आकर देख लेना।" 
अगले दिन, जब सात द्वीपों वाले इस विश्व के राजा मान्धाता यमुना किनारे पहुँचे, तो सौभरि जी का अद्भुत वैभव देखकर आश्चर्यचकित रह गए। उनके पास ऐसी भोग-सामग्री थी, जो स्वयं राजा मान्धाता के पास भी नहीं था। यह सब सौभरि जी की तपस्या के बल से संभव हुआ था।
सौभरि जी गृहस्थ जीवन के सुखों में रम गए और अपनी इंद्रियों से विषयों का भरपूर सेवन करने लगे। 
लेकिन विषयों का सेवन करने से कामना की तृप्ति कभी नहीं होती; जैसे घी की कुछ बूंदें आग की लपटों को और भी भड़काती हैं। इसी प्रकार, उनका भोगों का असंतोष बढ़ने लगा। 
पचास राजकुमारियों और इतना वैभव-संपन्न जीवन जीने के बाद भी वे तृप्त नहीं हो सके।
सौभरि जी एक दिन यमुना तट पर बैठे और गहरे चिंतन में डूब गए। उन्होंने सोचा, "मछली के एक क्षण के कुसंग ने मेरी यह स्थिति बना दी कि मैंने अपनी सारी तपस्या खो दी। व}ह भी केवल भोगों के लिए! 
अरे, मैं तो बड़ा तपस्वी और संयमी था। यह मुझसे ऐसी चूक कैसे हो गई? यह मेरा पतन देखो! मैंने दीर्घकाल से अपने ब्रह्म तेज को अक्षय रखा था, परंतु जल के भीतर विहार करती हुई एक मछली के संसर्ग ने मेरा ब्रह्म तेज नष्ट कर दिया।
सङ्गं त्यजेत् मिथुन-व्रतिनां मुमुक्षुः सर्वात्मना न विसृजेद बहिर-इंद्रियाणि!
एकश चरण रहसि चित्तं अनंत इशे नगुजिता तद-वृतिषु साधुषु चेत!
प्रसंगःश्रीमद् भागवतम् 9.6.51
भव-बन्धन से मुक्ति चाहने वाले व्यक्ति को यौन-जीवन में रुचि रखने वाले व्यक्तियों की संगति छोड़ देनी चाहिए तथा अपनी इन्द्रियों को बाह्य कार्यों में (देखने, सुनने, बोलने, चलने आदि में) व्यस्त नहीं रखना चाहिए। 
उसे सदैव एकांत स्थान में रहना चाहिए, तथा अपने मन को भगवान के चरण-कमलों में पूरी तरह से स्थिर करना चाहिए, तथा यदि वह किसी प्रकार की संगति करना चाहता है, तो उसे ऐसे व्यक्तियों की संगति करनी चाहिए जो उसी प्रकार से उसमें रुचि रखते हों।
हमें मैथुन धर्म से युक्त किसी भी प्राणी पर दृष्टि नहीं डालनी चाहिए, चाहे वह कोई पशु-पक्षी ही क्यों न हो। यदि किसी जीव को मैथुन करते हुए अचानक देख लें, तो तुरंत अपनी दृष्टि हटा लें और नाम जप शुरू करें। 
दोबारा उधर देखने की भूल न करें। यदि दोबारा देखा, तो वह दृश्य मन में संकल्प बना देगा और धीरे-धीरे वह क्रिया में परिवर्तित हो सकता है।
असंग रहें, निरंतर भगवद् चिंतन में लीन रहें, और अपनी इंद्रियों को अंतर्मुख बनाए रखें। किसी को मैथुन (सहवास) करते हुए देखकर आकर्षित न हों, अन्यथा सौभरि जी की दुर्दशा को स्मरण करें। 
वे स्वयं यह कह रहे हैं कि, "मेरी दशा देख लो।" दुनिया के विघ्नों और आकर्षणों से बचने के लिए सौभरि जी जल को स्तंभित करके भजन कर रहे थे, फिर भी विघ्न उत्पन्न हो गया। इसलिए, भगवद् नाम का निरंतर जप करें और इंद्रियों को स्वतंत्रता न दें। 
कोई ऐसा बाहरी दृश्य-चाहे मोबाइल में हो या कहीं और-न देखें, जो आपको भगवद् विमुख कर दे। सौभरि जी कहते हैं, "मैं पहले एकांत में तपस्या में लीन था। लेकिन मछली का मैथुन देखने मेरी तपस्या भंग हो गई और मैंने पचास विवाह किए।
अब सोचो, यदि एक तपस्वी महात्मा मछली की काम क्रीड़ा देखकर पतित हो सकता है, तो मोबाइल पर गलत दृश्य देखने वाले कैसे संभल सकते हैं? 
यदि आप सर्च करके गंदे और अश्लील दृश्य देखेंगे, तो क्या आप भजन कर पाएंगे? नहीं। इसलिए, इंद्रियों को वश में रखें और भगवद् चिंतन में लीन रहें।
यह मोबाइल कलयुग की एक बहुत बड़ी कुचाल है। यदि इसका सही उपयोग कर पाओ, तो केवल महापुरुषों के वचन सुनो या अत्यंत आवश्यक कार्य पूरे करो। अन्यथा, इसे स्विच ऑफ करके रख दो। 
बार-बार मोबाइल देखने से चित्त में ऐसा आकर्षण बैठ जाएगा कि एकांत में गंदी बातें देखने की आदत लग जाएगी। यदि मोबाइल का सही प्रयोग न हुआ, तो यह आपको भ्रष्ट और नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। 
सौभरि जी कहते हैं, "मैं पहले एकांत में अकेला तपस्या में लीन था। लेकिन मछली की मैथुन क्रीड़ा देखने के बाद मेरी तपस्या भंग हो गई। मैंने पचास विवाह किए, फिर संतानों के कारण मेरा परिवार पाँच हज़ार से अधिक लोगों का हो गया। 
सोचो, कहाँ मैं अकेला भगवत चिंतन में लीन था, और कहाँ पाँच हज़ार लोगों की चिंता में फँस गया। विषयों में सत् बुद्धि मान लेने के कारण माया ने मेरी बुद्धि का हरण कर लिया।"
सौभरि जी को जब यह ज्ञान हुआ, तो उन्होंने तत्काल सन्यास लिया और वन को चले गए। 
अपने पति को ही सर्वस्व मानने वाली उन पत्नियों ने एकांत वन में भगवद् चिंतन करते हुए शरीर त्याग दिया। सौभरि जी ने घोर तपस्या करके अपने शरीर को सुखा दिया और अंततः परमात्मा में लीन हो गए। 
उनकी पचासों पत्नियां सौभरि जी के चरण चिंतन और भगवत आराधना के बल पर उत्तम गति को प्राप्त हुईं।
सौभरि जी के पावन चरित्र से हमें यह शिक्षा लेनी चाहिए कि किसी भी जीव को मैथुन करते हुए कदापि नहीं देखना चाहिए। यदि एक बार दृष्टि चली जाए, तो दोबारा उधर न देखें। 
ऐसा दृश्य मन में स्फुरणा पैदा करता है, जो संकल्प का रूप ले लेती है और अंततः क्रिया बन जाती है। इसलिए, स्फुरणा को शुरुआत में ही कुचल देना चाहिए। 
इसके लिए, नाम का जप करें ताकि स्फुरणा समाप्त हो जाए और मन में कोई संकल्प पनपने न पाए। यही हमारे लिए उत्तम मार्ग है।