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Friday, April 17, 2026

काजल की नेग

आज लाला कन्हैया के आँखन मे काजल लगाने को दिन है ! 
नन्द बाबा की बहन सुनन्दा देवी जो कन्हैया की बुआ लगती है चटकती मटकती आयी और यशोदा जी से बोली की..
सुनन्दा जी -- भाभी जी लाला को काजल लगावे का हक हमारो है।
श्री यशोदा जी -- हाँ बीबी जी लगाओ आप ही लगाओ।
सुनन्दा जी -- ऐसे नही लगाऊँगी मेरो को भी नेग चाहिये।
यशोदा जी -- हाँ बीबी जी आपको भी नेग मिलेगो।
सुनंदा जी -- देखो भाभी जब लाला के नाल छेदन के समय नाल काटने वारी दासी नेग के लिये मचल गई की.... 
व्रजरानी बहुत दिन बाद लाला हुआ हुआ है नेग सोच समझकर देना तो आपने अपने गले का नौलखा हार उतार कर उसे पहना दी ...
वाते कमती मुझे मत करियो नही तो ननद भाभी दोनन की झगड़ा बन जायेगी और हमेशा के लिये ननद भौजाई की शिकायत बनी रहेगी।
यशोदा जी -- नही नही बीबी जी वाते बढ़ चढ़के मिलेगो।
फिर सुनन्दा बुआ ने लाला श्यामसुन्दर को काजल लगाई और सोच रही है की देखे भाभी क्या देती है... 
ज्योंही सुनन्दा बुआ ने हाथ बढ़ाये की लाओ मेरा नेग दो तो श्री यशोदा जी ने कन्हैया को उठाकर उनकी गोदी मे दे दी ...
और सुनन्दा जी के मुखमंडल पर दृष्टि डाली की बीबी जी कछु कसर रह गयी हो तो दउँ कछु और ?
आँखन मे आँसू आ गये। सुनन्दा बुआ के बोली भाभी याते कीमती और क्या हो सकता है। तूने तो अपना सर्वस्व दे दिवो।
अब लाला मुझे नेग मे मिल्यो तो लाला तो हमारो हय गयो।
लेकिन भाभी मेरी छाती मे दूध नाय। लाला को दूध पिलावे को कोई धाय रखनो पड़ेगो और देख तेरी छाती मे दूध फालतू पड़ो रहेगो। 
क्या फायदो धाय रखने को। लेव मै तोहि को अपने लाला के लिये धाय के रुप मे नियुक्त करती हूँ। मेरो लाला को खूब ध्यान रखियो और उन्होने लाला कन्हैया को यशोदा जी के गोद मे दे दिया। 
इस तरह से खूब आनन्द हो रहा है ब्रज मे।
भगवान श्रीकृष्ण साक्षात् लीलावतार हैं। उनकी लीलाएं अनन्त हैं। उन्होंने अपनी दिव्य लीलाओं के माध्यम से विभिन्न प्रयोजनों हेतु अनेक प्राणियों का उद्धार किया।
गोपियां श्रीकृष्ण प्रेम की पराकाष्ठा हैं। गोपियों के मन, वाणी और शरीर श्रीकृष्ण में ही तल्लीन रहते। गोपियों का हृदय प्रेममय है, श्रीकृष्णमय है, अमृतमय है।

ईश्वर का धन्यवाद

एक राजा थे सूर्यसेन। वह बहुत बड़े दानी थे। उनका प्रतिदिन का नियम था सवेरे जल्दी उठते नदी में स्नान करके पूजा-पाठ करते तथा उसके बाद निर्धनों को दान दिया करते तब जाकर वह अन्न-जल ग्रहण किया करते थे। 
उनकी दयालुता की भावना देखकर उनके आस-पड़ोस के शत्रु राजा भी मन ही मन बहुत प्रभावित थे।
राजा सूर्यसेन के राज्य में प्रतिदिन सैंकड़ों की संख्या में भिक्षुक आते थे, उन भिक्षुकों में दो व्यक्ति जिनका नाम रोहन व सोहन था कई वर्षों से लगातार राजमहल में आते थे। 
अब तो राजा उनको नाम से भी पहचानने लगे थे वे दोनों बहुत ईमानदार थे अर्थात जितना एक दिन के लिये पर्याप्त होता उतना ही दान लिया करते थे।
कई बार राजा ने उनको अधिक दान देने का प्रयास भी किया किन्तु वे दोनों सिर्फ उतना ही दान स्वीकारते जिससे उनको दो वक्त का भोजन मिल जाये। 
दोनों में एक विशेष बात यह थी कि दान लेने के बाद रोहन तो राजा का धन्यवाद करता किन्तु सोहन कहता था हे ईश्वर! आपका धन्यवाद (ईश्वर का धन्यवाद) करता।
राजा को लगता कि दान तो इसे मैं देता हूं, लेकिन सोहन ने कभी मुझे धन्यवाद नहीं करता बल्कि हर बार यही कहता है कि ईश्वर का धन्यवाद। 
यहां पर राजा का अहंकार जाग जाता था, वह चाहता था कि सोहन भी रोहन की भाँति उनको धन्यवाद दे।
एक बार जब राजा दान दे रहे थे तो सदैव की भांति रोहन ने कहा – महाराज आपका बहुत-बहुत धन्यवाद तो सोहन ने दान लेने के बाद कहा ईश्वर का बहुत-बहुत धन्यवाद। 
उस दिन राजा ने सभी भिक्षुओं को तो जाने दिया किन्तु उन दोनों को राजमहल में रुकने को कहा। और सोहन से पूछा तुम्हे दान तो में देता हूँ किन्तु तुमने मेरा धन्यवाद कभी नही किया, सोहन ने कहा राजन ये आप समझते हैं कि आप दे रहे हैं देने वाला तो ईश्वर है आप तो निमित्त है, आप अपनी इच्छा से किसी को कुछ नही दे सकते, सोहन की बात सुनकर राजा ने मन ही मन निश्चय किया कल में इसके साथी रोहन को धनवान बना दूंगा तब इसे पता लगेगा कि कोंन है देने वाला..
अगले दिन राजा ने दोनो को अपने बाग में घूमने का अवसर दिया, पहले रोहन को अपने बाग में भेजा। रोहन बड़ा प्रश्नन था कि राजा ने मुझे अपने बाग में जाने का अवसर दिया वह बाग की सुंदरता में इतना खो गया कि आस पास का ध्यान ही ना रहा। 
वहां पर राजा ने धन से भरी एक पोटली रखी थी जिसकी ओर उसका ध्यान ही ना गया। अब वह वापस आ गया राजा ने पूछा कि क्या तुम्हें वहां कुछ मिला ? 
रोहन बोला नहीं महाराज, मुझे तो कुछ भी नहीं मिला लेकिन बाग बहुत ही अच्छा था।
अब सोहन की बारी थी। वह मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ बाग में घूम रहा था कि उन्होंने उसे यह अवसर दिया कि आज राजा के बाग में घूमने का मौका मिला। 
वह बड़ा सतर्क होकर वहां चल रहा था तभी उसकी दृष्टि उस पोटली पर पड़ी जिस पर रोहन की दृष्टि नहीं पड़ी थी। 
वह वापस आया और राजा को वह धन से भरी पोटली राजा को दे दी।
अगले दिन राजा ने रोहन को एक बड़ा सा कटहल दिया और सोहन को मात्र कुछ रूपये दे दिये सोहन ने सदैव की भांति ईश्वर को धन्यवाद दिया। 
अब रोहन बेमन से उस कटहल को लेकर चल दिया और सोचने लगा कि राजा ने आज आखिर यह क्या दिया है, और उसने बाजार में जाकर वह कटहल सब्जी वाले को बेच दिया।
सोहन ने उन रूपयों का कटहल उसी सब्जी वाले से खरीदा और संयोग से ये वही था जिसे रोहन ने बेचा था। 
घर जाकर जब उसने वह काटा तो उसकी आंखे खुली की खुली रह गईं उस कटहल में से सोने की कुछ अशर्फियां निकलीं
अगले दिन भिक्षा के लिए अकेला रोहन ही राजमहल पहुंचा तो राजा ने उससे सोहन के बारे में पूछा।
रोहन ने राजा से बताया कि वह अब नहीं आयेगा उसे कहीं से सोने की अशर्फियां मिल गयी हैं अब वह एक धनवान व्यक्ति बन चुका है। 
राजा ने अपना माथा पकड़ लिया। राजा ने सोचा कि मैंने कितना प्यास किया कि रोहन दान के लिये हमेशा मुझे ही धन्यवाद देता है उसको धनवान किया जाये किन्तु सोहन ठीक कहता था देने वाला ईश्वर ही है हम तो केवल निमित्त है...
सोहन ठीक ही हर बात के लिए ईश्वर का धन्यवाद करता था।
राजा का घमण्ड टूट चुका था अब राजा ने कहा हे ईश्वर! मुझे सही मार्ग दिखाने के लिए आपका धन्यवाद।

भगवान शिव और विष्णु

भगवान  विष्णु ने एक बार अत्यंत मनमोहक 'किशोर रूप' धारण किया।
  कारण: शिव जी के मन में अपने आराध्य (विष्णु जी) के उस सुंदर रूप को हर दिशा से निहारने की तीव्र इच्छा जगी।
  परिणाम: चूँकि ब्रह्मा जी के चार मुख थे और इंद्र की हजार आँखें थीं, वे उस रूप का अधिक आनंद ले रहे थे। शिव जी की इसी अनन्य भक्ति ने उन्हें एक मुख से 'पंचमुखी' बना दिया।

एक समय की बात है, वैकुंठ के स्वामी भगवान श्री हरि विष्णु ने एक अत्यंत दिव्य और चित्त को हर लेने वाला 'किशोर रूप' धारण किया। उनके इस रूप की आभा इतनी अलौकिक थी कि समस्त देवलोक उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़ा।
ब्रह्मा जी अपने चार मुखों से उन्हें देख रहे थे, शेषनाग अपने अनेक फणों से उस छवि को निहार रहे थे और देवराज इंद्र अपनी सहस्त्र (हजार) आंखों से उस दिव्यता का पान कर रहे थे। वहाँ महादेव भी उपस्थित थे। जब उन्होंने विष्णु जी के उस अनुपम सौंदर्य को देखा, तो उनके मन में एक अनूठा भाव जागा।
उन्होंने सोचा, "मेरे पास तो केवल दो नेत्र और एक ही मुख है। मैं अपने प्रभु के इस मनोहर रूप को पूरी तरह कैसे देख पाऊं? काश! मेरे भी कई मुख होते ताकि मैं हर दिशा से इस सुंदरता को एक साथ निहार सकता।"
जैसे ही महादेव के मन में अपने आराध्य के प्रति यह शुद्ध प्रेम और इच्छा उत्पन्न हुई, तत्काल उनके एक मुख से पांच दिव्य मुख प्रकट हो गए और प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र सुशोभित हो उठे। इस प्रकार महादेव 'पंचानन' कहलाए।

शिवपुराण के अनुसार, ये पांच मुख केवल दिशाओं के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये ब्रह्मांड के पांच प्रमुख कार्यों और तत्वों के स्वामी हैं:
 * सद्योजात (पश्चिम मुख): यह श्वेत वर्ण का है। यह मन की शुद्धता और 'सृष्टि' का प्रतीक है।
 * वामदेव (उत्तर मुख): यह कृष्ण वर्ण का है। यह अहंकार का शुद्धिकरण और 'स्थिति' का प्रतीक है।
 * अघोर (दक्षिण मुख): यह नील/काला वर्ण है। यह बुद्धि और 'संहार' का प्रतीक है, जो बुराई का अंत करता है।
 * तत्पुरुष (पूर्व मुख): यह पीत (पीला) वर्ण है। यह आत्मा और 'तिरोभाव' का प्रतीक है। इसी मुख से गायत्री मंत्र का प्राकट्य माना जाता है।
 * ईशान (ऊर्ध्व मुख): यह स्फटिक के समान चमकता हुआ मुख है। यह आकाश तत्व और 'अनुग्रह' का प्रतीक है।

भगवान शिव का पंचानन स्वरूप हमें सिखाता है कि भक्ति में ही शक्ति है। जब भक्त के मन में ईश्वर को देखने की सच्ची तड़प होती है, तो स्वयं महादेव उसे अनंत दृष्टियाँ प्रदान करते हैं। जो मनुष्य शिव के इन पांच रूपों का ध्यान करता है, उसके पांचों तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) संतुलित हो जाते हैं और उसे परम शांति प्राप्त होती है।

शनि और पीपल में सम्बंध

पुराणों की माने तो एक बार त्रेता युग मे अकाल पड़ गया था । उसी युग मे एक कौशिक मुनि अपने बच्चो के साथ रहते थे । बच्चो का पेट न भरने के कारण मुनि अपने बच्चो को लेकर दूसरे राज्य मे रोज़ी रोटी के लिए जा रहे थे। 
रास्ते मे बच्चो का पेट न भरने के कारण मुनि ने एक बच्चे को रास्ते मे ही छोड़ दिया था । बच्चा रोते रोते रात को एक पीपल के पेड़ के नीचे सो गया था तथा पीपल के पेड़ के नीचे रहने लगा था। तथा पीपल के पेड़ के फल खा कर बड़ा होने लगा था। तथा कठिन तपस्या करने लगा था। 
एक दिन ऋषि नारद वहाँ से जा रहे थे । नारद जी को उस बच्चे पर दया आ गयी तथा नारद जी ने उस बच्चे को पूरी शिक्षा दी थी तथा विष्णु भगवान की पूजा का विधान बता दिया था।
अब बालक भगवान विष्णु की तपस्या करने लगा था । एक दिन भगवान विष्णु ने आकर बालक को दर्शन दिये तथा विष्णु भगवान ने कहा कि हे बालक मैं आपकी तपस्या से प्रसन्न हूँ। आप कोई वरदान मांग लो।
बालक ने विष्णु भगवान से सिर्फ भक्ति और योग मांग लिया था । अब बालक उस वरदान को पाकर पीपल के पेड़ के नीचे ही बहुत बड़ा तपस्वी और योगी हो गया था।
एक दिन बालक ने नारद जी से पूछा कि हे प्रभु हमारे परिवार की यह हालत क्यो हुई है । मेरे पिता ने मुझे भूख के कारण छोड़ दिया था और आजकल वो कहा है।
नारद जी ने कहा बेटा आपका यह हाल शानिमहाराज ने किया है । देखो आकाश मे यह शनैश्चर दिखाई दे रहा है । बालक ने शनैश्चर को उग्र दृष्टि से देखा और क्रोध से उस शनैश्चर को नीचे गिरा दिया । उसके कारण शनैश्चर का पैर टूट गया । और शनि असहाय हो गया था।
 शनि का यह हाल देखकर नारद जी बहुत प्रसन्न हुए। नारद जी ने सभी देवताओ को शनि का यह हाल दिखाया था। शनि का यह हाल देखकर ब्रह्मा जी भी वहाँ आ गए थे । और बालक से कहा कि मैं ब्रह्मा हूँ आपने बहुत कठिन तप किया है।
आपके परिवार की यह दुर्दशा शनि ने ही की है । आपने शनि को जीत लिया है। आपने पीपल के फल खाकर जीवंन जीया है । इसलिए आज से आपका नाम पिपलाद ऋषि के नाम जाना जाएगा।और आज से जो आपको याद करेगा उसके सात जन्म के पाप नष्ट हो जाएँगे।
तथा पीपल की पूजा करने से आज के बाद शनि कभी कष्ट नहीं देगा । ब्रह्मा जी ने पिपलाद बालक को कहा कि अब आप इस शनि को आकाश मे स्थापित कर दो। बालक ने शनि को ब्रह्माण्ड मे स्थापित कर दिया। 
तथा पिपलाद ऋषि ने शनि से यह वायदा लिया कि जो पीपल के वृक्ष की पूजा करेगा उसको आप कभी कष्ट नहीं दोगे। शनैश्चर ने ब्रह्मा जी के सामने यह वायदा ऋषि पिपलाद को दिया था।
उस दिन से यह परंपरा है जो ऋषि पिपलाद को याद करके शनिवार को पीपल के पेड़ की पूजा करता है उसको शनि की साढ़े साती , शनि की ढैया और शनि महादशा कष्ट कारी नहीं होती है। 
शनि की पूजा और व्रत एक वर्ष तक लगातार करनी चाहिए। शनि कों तिल और सरसो का तेल बहुत पसंद है इसलिए तेल का दान भी शनिवार को करना चाहिए। पूजा करने से तो दुष्ट मनुष्य भी प्रसन्न हो जाता है।
तो फिर शनि जी क्यो नहीं प्रसन्न होंगे ? इसलिए शनि की पूजा का विधान तो भगवान ब्रह्मा जी ने दिया है।
   

Sunday, April 12, 2026

गोपीभाव की महिमा

भगवान श्री कृष्ण गोपियों के नित्य ऋणी हैं, उन्होंने अपना यह सिद्धात घोषित किया है:-

             “ये यथा माँ प्रपधन्ते तांस्तथै भजाम्यहम।“ 

          अर्थात जो मुझे जैसे भजते है उन्हें मैं वैसे ही भजता हूँ। इसका यह तात्पर्य समझा जाता है कि भक्त जिस प्रकार से और जिस परिमाण के फल को दृष्टि में रखकर भजन करता है, भगवान उसको उसी प्रकार और उसी परिमाण में फल देकर उसका भजन करते हैं।
          सकाम, निष्काम शांत, दास्य, वात्सल्य, सख्य, आदि कि जिस प्रकार की कामना, भावना, भक्त की होती है, भगवान उसे वही वस्तु प्रदान करते हैं। परन्तु गोपियों के सम्बन्ध में भगवान के इस सिद्धात वाक्य कि रक्षा नहीं हो सकी इसके प्रधान तीन कारण है-

01. गोपी के कोई भी कामना नहीं है। अतएव श्रीकृष्ण उन्हें क्या दें।

02. गोपी की कामना है केवल श्रीकृष्णसुख की, श्रीकृष्ण इस कामना की पूर्ति करने जाते हैं तो उनको स्वयं अधिक सुखी होना पडता है। अतः इस दान से ऋण और भी बढ़ता है।

03. जहाँ गोपियों ने सर्व त्याग करके केवल श्री कृष्ण के प्रति ही अपने को समर्पित कर दिया है, वहाँ श्रीकृष्ण का अपना चित्त बहुत जगह बहुत से प्रेमियों के प्रति प्रेम युक्त है अतएव गोपी प्रेम अनन्य और अखंड है कृष्ण प्रेम विभक्त और खंडित है।

          इसी से गोपी के भजन का बदला उसी रूप में श्रीकृष्ण उसे नहीं दे सकते, और इसी से अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए वे कहते हैं, "गोपियों तुमने मेरे लिए घर की उन बेडियों को तोड़ डाला है, जिन्हें बड़े-बड़े योगी-यति भी नहीं तोड़ पाते, मुझसे तुम्हारा यह मिलन, यह आत्मिक संयोग सर्वथा निर्मल और सर्वथा निर्दोष है। यदि मैं अमर शरीर से, अमर जीवन से, अनंत काल तक, तुम्हारे प्रेम, सेवा और त्याग का बदला चुकाना चाहूँ, तो भी नहीं चुका सकता। मैं सदा तुम्हारा ऋणी हूँ तुम अपने सौम्य स्वभाव से ही, प्रेम से ही, मुझे उऋण कर सकती हो परन्तु मैं तो तुम्हारा ऋणी ही हूँ। 
          इसलिए प्रेममार्गी भक्त को चाहिये कि वह अपनी समझ से तन, मन, वचन से होने वाली प्रत्येक चेष्टा को श्रीकृष्ण सुख के लिए ही करे, जब-जब मन में प्रतिकूल स्थिति प्राप्त हो, तब-तब उसे श्रीकृष्ण कि सुखेच्छाजनित स्थिति समझकर परमसुख का अनुभव करे, यों करते-करते जब प्रेमी भक्त केवल श्रीकृष्णसुख-काम अनन्यता पर पहुँच जाता है, तब श्रीकृष्ण के मन की बात भी उसे मालूम होने लगती है गोपियों के श्रीकृष्णानुकुल जीवन में यह प्रत्यक्ष प्रमाण है।
          इसलिए भगवान अर्जुन से कहते हैं, "गोपियाँ, मेरी सहायिका, मेरी गुरु, शिष्या, भोग्या, बान्धव स्त्री हैं। अर्जुन ये गोपियाँ मेरी क्या नहीं हैं ? सबकुछ हैं मेरी महिमा को, मेरी सेवा को, मेरी श्रद्धा को, और मेरे मन के भीतरी भावों को गोपियाँ ही जानती हैं दूसरा कोई नहीं जानता।"

गोपियों की मटकियाँ

श्रीकृष्ण नित्य ही मथुरा माखन लेकर जाती हुयी गोपियों का माखन खा जाते हैं, और कंकड़ मार कर उनकी मटकियाँ भी फोड़ देते हैं। 
श्रीकृष्ण के माखन खाने से तो गोपियों का मन खुश होता था परन्तु उनके मटकी फोड़ देने से वे बहुत चिन्तित हो जाती थीं,माखन तो वे अपने प्रेम से ही कान्हा के लिये तैयार किया करती थीं किन्तु मटकी तो दाम चुका कर मिलती थे एक बार सभी गोपियाँ एकत्र हो इस की शिकायत ले श्रीजी के समक्ष जा पहुँचीं। श्रीजी अपने प्रियतम के इस कृत्य को सुन अति-द्रवित हो उठीं, और श्रीकृष्ण से मान कर बैठीं।जब श्रीकृष्ण को श्रीजी के मान का पता चला तोअति-विचलित हो उठे और अविलम्ब श्रीजी को मनाने के लिये उनके पास चल दिये। राह में उन्हें सखी चित्रा मिली उन्होंने उन्हें श्रीजी के मान का कारण बताया, तथा उनका मान समाप्त करने के लिये बताया कि आपने जितनी गोपियों की मटकियाँ फोड़ी हैं उनके बदले उन्हें एक की जगह दस मटकियाँ बनाकर देनी होगीं वह भी सुन्दर चित्रकारी के साथ।
 श्रीजी को मान में देखना श्रीकृष्ण के लियै सम्भव नहीं होता इसलिये वे अविलम्ब श्रीजी का मान भंग करने के लिये सभी गोपियों की इच्छानुसार उसनी पसन्द की मटकियाँ बना कर देने लगे। जब सभी गोपियाँ की मटकियाँ बना दी तब जाकर श्रीजी का मान भंग हुआ।





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Sunday, March 29, 2026

चुहिया का स्वयंवर

गंगा नदी के तट पर कुछ तपस्वियों का आश्रम था जहाँ याज्ञवल्क्य नाम के ऋषि रहते थे. एक दिन वो नदी के किनारे आचमन कर रहे थे. उसी वक़्त आकाश में एक बाज अपने पंजे में एक चुहिया को दबाये जा रहा था जो उसकी पकड़ से छूटकर ऋषि की पानी से भरी हथेली में आ गिरी. ऋषि ने उसे एक पीपल के पत्ते पर रखा और दोबारा नदी में स्नान किया. चुहिया अभी मरी नहीं थी इसलिए ऋषि ने अपने तप से उसे एक कन्या बना दिया और आश्रम में ले आये. अपनी पत्नी से कहा इसे अपनी बेटी ही समझकर पालना. दोनों निसंतान थे इसलिए उनकी पत्‍नी ने कन्या का पालन बड़े प्रेम से किया. कन्या उनके आश्रम में पलते हुए बारह साल की हो गयी तो उनकी पत्‍नी ने ऋषि से उसके विवाह के लिए कहा।
ऋषि ने कहा में अभी सूर्य को बुलाता हूँ. यदि यह हाँ कहे तो उसके साथ इसका विवाह कर देंगे ऋषि ने कन्या से पूछा तो उसने कहा यह अग्नि जैसा गरम है,कोई इससे अच्छा वर बुलाइये।
तब सूर्य ने कहा बादल मुझ से अच्छे हैं, जो मुझे ढक लेते हैं बादलों को बुलाकर ऋषि ने कन्या से पूछा तो उसने कहा यह बहुत काले हैं कोई और वर ढूँढिए।
फिर बादलों ने कहा वायु हमसे भी वेगवती है जो हमें उड़ाकर ले जाती है।
तब ऋषि ने वायु को बुलाया और कन्या की राय माँगी तो उसने कहा “पिताजी यह तो बड़ी चंचल है. किसी और वर को बुलाइए।
इस पर वायु बोले पर्वत मुझसे अच्छा है, जो तेज़ हवाओं में भी स्थिर रहता है।
अब ऋषि ने पर्वत को बुलाया और कन्या से पूछा. कन्या ने उत्तर दिया “पिताजी, ये बड़ा कठोर और गंभीर है, कोई और अच्छा वर ढूँढिए न।
इस पर पर्वत ने कहा चूहा मुझसे अच्छा है, जो मुझमें छेद कर अपना बिल बना लेता है।
ऋषि ने तब चूहे को बुलाया और बेटी से कहा “पुत्री यह मूषकराज क्या तुम्हें स्वीकार हैं?
कन्या ने चूहे को देखा और देखते ही वो उसे बेहद पसंद आ गया. उस पर मोहित होते हुए वो बोली आप मुझे चुहिया बनाकर इन मूषकराज को सौंप दीजिये।
ऋषि ने तथास्तु कह कर उसे फिर चुहिया बना दिया और मूषकराज से उसका स्वयंवर करा दिया।

शिक्षा :-
जन्म से जिसका जैसा स्वभाव होता है वह कभी नहीं बदल सकता,जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।