महामंत्र > हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे|हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे||

Friday, August 7, 2026

राज्य के मंत्री

पुराने जमाने की बात है। एक राजा ने दूसरे राजा के पास एक पत्र और सुरमे की एक छोटी सी डिबिया भेजी। 
पत्र में लिखा था कि जो सुरमा भिजवा रहा हूं, वह अत्यंत मूल्यवान है। इसे लगाने से अंधापन दूर हो जाता है। राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे किस-किस को दे।उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी-खासी थी, पर सुरमे की मात्रा बस इतनी  थी जिससे दो आंखों की रोशनी लौट सके। 
राजा इसे अपने किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ति को देना चाहता था। तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। वह मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था।राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेंगी।
राजा ने मंत्री को बुलवा भेजा और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, ‘इस सुरमे को आंखों में डालें। आप पुन: देखने लग जाएंगे। ध्यान रहे यह केवल 2 आंखों के लिए है।’ मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। उसकी रोशनी आ गई। उस आंख से मंत्री को सब कुछ दिखने लगा।  फिर उसने बचा- खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया। 
यह देखकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, ‘यह आपने क्या किया? 
अब तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी। लोग आपको काना कहेंगे।’ मंत्री ने जवाब दिया, ‘राजन, चिंता न करें। 
मैं काना नहीं रहूंगा। मैं आंख वाला बनकर हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंगा। 
मैंने चखकर यह जान लिया है कि सुरमा किस चीज से बना है।  मैं अब स्वयं सुरमा बनाकर नेत्रहीनों को बांटूंगा।’ 
राजा ने मंत्री को गले लगा लिया और कहा, ‘यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। अगर हर राज्य के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा।

Thursday, August 6, 2026

एक बार भगवान शिवजी ने शनिदेव जी को पीपल के पेड़ से 19 वर्षों तक लटकाकर रखा था।

उन्होंने ऐसा क्यों किया था, शनिदेव जी को ऐसी सजा क्यों दी थी, चलिए जानते हैं.
पौराणिक प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार सूर्यदेव जी ने अपने सभी पुत्रों को उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें अलग-अलग लोक बाँट दिए लेकिन शनिदेव जी अपनी शक्ति के अहंकार में चूर इस बात से खुश नहीं थे। इसलिए, उन्होंने अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए बाकी लोकों पर भी अधिकार जमा लिया।शनिदेव जी की इस हरकत से सूर्यदेव जी बहुत दुःखी थे और वो मदद माँगने भगवान् शिवजी के पास पहुंचे।
भगवान् शिवजी ने सूर्यदेव जी की आराधना पर अपने गणों को शनिदेव जी से युद्ध करने के लिए भेजा, लेकिन शनिदेव जी ने सभी को परास्त कर दिया। इसके बाद भगवान शंकरजी स्वयं शनिदेव जी से युद्ध करने आये। शनिदेव जी ने भगवान शंकर पर मारक दृष्टि डाली, तो भगवन शंकरजी ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर शनिदेव जी के अहंकार को तोड़ दिया।
शनिदेव जी को सबक सिखाने के लिए भगवान् शिवजी ने उन्हें 19 वर्षों तक पीपल के पेड़ से उल्टा लटका दिया। इन्ही 19 वर्षों के दौरान शनिदेव जी भगवान शंकरजी की उपासना करते रहे। यही वजह है कि शनि महादशा 19 वर्षों की होती है।
पुत्र की यह दशा सूर्यदेव जी से देखी नहीं गयी। उन्होंने भगवान् शिवजी से अपने पुत्र की ग़लती की माफी माँगी और भगवान शिवजी से शनिदेव जी के लिए जीवनदान भी माँगा। इसके बाद भगवान शिवजी ने शनिदेव जी को मुक्त कर दिया और भगवान शिवजी ने शनिदेव जी को उनकी शक्तियों का प्रयोग न्यायसंगत तरीके से करने का आशीर्वाद दिया है। उसके बाद से शनिदेव जी उनके मार्गदर्शन के अधीन रहते हैं। भगवन शिवजी ने शनिदेव जी को अपना शिष्य बनाकर उन्हें दंडाधिकारी नियुक्त कर दिया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शनिदोष से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिवजी की पूजा की जाती है क्योंकि शनिदेव जी न केवल भगवान् शिव के प्रति बहुत आदर रखते हैं, हमेशा उनकी भक्ति में डूबे रहते हैं बल्कि उनसे डरते भी हैं।
ऐसा माना जाता है कि भगवान शिवजी की पूजा से शनिदेव जी का क्रोध शांत होता है और व्यक्ति को शनिदोष से राहत मिलती है।

जब श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र ने काशी को घेर लिया था


एक ऐसी पौराणिक कथा, जिसमें शिव की नगरी और कृष्ण के सुदर्शन का अद्भुत सामना हुआ
“जिस काशी को स्वयं महादेव अपनी प्रिय नगरी मानते हैं, उसी काशी पर एक दिन श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र अग्नि बनकर टूट पड़ा था… आखिर क्यों?”
कहते हैं, देवताओं की लीलाएँ मनुष्य की बुद्धि से परे होती हैं।
जहाँ एक ओर काशी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है, वहीं दूसरी ओर श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र की महिमा ऐसी है कि उसके सामने अधर्म की कोई शक्ति टिक नहीं सकती।
लेकिन क्या कभी ऐसा हुआ कि भगवान कृष्ण का सुदर्शन चक्र स्वयं काशी की ओर दौड़ा हो?
पौराणिक कथाओं में वर्णित एक अद्भुत प्रसंग इसी रहस्य को सामने लाता है।
कंस की मृत्यु और जरासंध के हृदय में धधकती प्रतिशोध की अग्नि
द्वापर युग में मथुरा पर अत्याचारी राजा कंस का शासन था।
जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध करके मथुरा की प्रजा को उसके अत्याचार से मुक्त किया, तब कंस के ससुर और मगध के शक्तिशाली राजा जरासंध के हृदय में प्रतिशोध की अग्नि भड़क उठी।
कंस की मृत्यु उसके लिए केवल एक राजा की मृत्यु नहीं थी।
वह इसे अपने परिवार के अपमान के रूप में देखता था।
जरासंध ने संकल्प लिया—
“जब तक कृष्ण जीवित हैं, मेरा प्रतिशोध पूरा नहीं होगा।”
इसके बाद उसने बार-बार मथुरा पर आक्रमण किया।
लेकिन हर बार श्रीकृष्ण की दिव्य रणनीति और पराक्रम के सामने उसकी विशाल सेना टिक नहीं पाती थी।
जरासंध के भीतर क्रोध बढ़ता गया।
और इसी प्रतिशोध की अग्नि में कई राजा भी उसके साथ आ खड़े हुए।
 काशीराज के वध ने जन्म दिया एक और प्रतिशोध को
कथानुसार, एक युद्ध में काशीराज भी श्रीकृष्ण के हाथों मारे गए।
उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र ने काशी का राजसिंहासन संभाला।
लेकिन पिता की मृत्यु का दुःख धीरे-धीरे उसके भीतर प्रतिशोध की ज्वाला बन गया।
उसने निश्चय कर लिया—
“मैं कृष्ण से अपने पिता की मृत्यु का बदला लेकर रहूँगा।”
लेकिन श्रीकृष्ण को युद्ध में पराजित करना कोई साधारण बात नहीं थी।
इसलिए काशीराज ने वह मार्ग चुना, जिस पर बड़े-बड़े योद्धा भी जाने से डरते थे।
उसने भगवान शिव की कठोर तपस्या आरंभ कर दी।
काशी की धरती पर गूँजने लगी तपस्या
दिन बीतते गए।
ऋतुएँ बदलती रहीं।
लेकिन काशीराज अपनी तपस्या से विचलित नहीं हुआ।
अंततः उसकी कठोर साधना से भगवान शिव प्रसन्न हुए।
महादेव उसके सामने प्रकट हुए और बोले—
“वर माँगो।”
काशीराज ने बिना किसी संकोच के कहा—
“प्रभु! मुझे ऐसी शक्ति चाहिए जिससे मैं श्रीकृष्ण का अंत कर सकूँ।”
महादेव ने उसे समझाने का प्रयास किया।
लेकिन प्रतिशोध में अंधा हो चुका मन कहाँ मानता है?
तब शिवजी ने एक भयंकर शक्ति को प्रकट किया—कृत्या।
वह अग्नि के समान भयंकर थी।
उसके प्रकट होते ही वातावरण भयावह हो उठा।
उसे निर्देश दिया गया कि वह जिस दिशा में भेजी जाए, वहाँ जाकर शत्रु का विनाश करे।
काशीराज को लगा कि अब श्रीकृष्ण का अंत निश्चित है।
 कृत्या पहुँची द्वारका!
काशीराज ने कृत्या को श्रीकृष्ण की ओर भेज दिया।
वह भयंकर शक्ति आकाश को चीरती हुई द्वारका की ओर बढ़ी।
उसके मार्ग में भय का वातावरण फैल गया।
लेकिन द्वारका पहुँचकर एक अद्भुत घटना हुई।
जिस भगवान को वह नष्ट करने आई थी, उनके सामने पहुँचते ही उसकी सारी शक्ति निष्फल होने लगी।
क्यों?
क्योंकि जिसके विरुद्ध वह भेजी गई थी, वह कोई साधारण मनुष्य नहीं था।
वह स्वयं श्रीकृष्ण थे।
श्रीकृष्ण ने परिस्थिति को देखा।
उनके मुख पर हल्की मुस्कान आई।
और फिर उन्होंने अपने दिव्य अस्त्र का स्मरण किया—
“सुदर्शन!”
क्षणभर में आकाश दिव्य प्रकाश से भर उठा।
भगवान का सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ।
वह केवल एक अस्त्र नहीं था।
वह धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश का प्रतीक था।
सुदर्शन चक्र बिजली की गति से कृत्या की ओर बढ़ा।
कृत्या भयभीत होकर वहाँ से भागी।
लेकिन अब उसके पीछे सुदर्शन था।
कृत्या भागी… और सुदर्शन उसके पीछे!
कृत्या जिस दिशा में भागती, सुदर्शन उसका पीछा करता।
अंततः वह वापस काशी की ओर लौट आई।
उसे लगा कि अपनी नगरी में पहुँचकर शायद वह बच जाएगी।
लेकिन सुदर्शन चक्र भी उसके पीछे-पीछे काशी पहुँच चुका था।
फिर जो हुआ, उसने काशी की धरती को अग्नि से भर दिया।
सुदर्शन चक्र ने कृत्या का विनाश कर दिया।
लेकिन उसका वेग और दिव्य अग्नि वहीं नहीं रुकी।
पौराणिक कथा के अनुसार, सुदर्शन चक्र ने काशी को भी अपनी अग्नि से घेर लिया।
राजमहल, सेना और नगर का वैभव—सब उस प्रचंड अग्नि की चपेट में आ गया।
काशी का राजा भी अपने कर्मों के परिणाम से बच नहीं सका।
लेकिन यह कथा केवल विनाश की नहीं है…
यहीं इस कथा का सबसे गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है।
काशी केवल एक नगर नहीं है।
हिंदू आध्यात्मिक परंपरा में काशी को ज्ञान, मोक्ष और भगवान शिव की कृपा की भूमि माना जाता है।
इसलिए इस कथा को केवल “एक नगर के जलने” के रूप में देखना इसके आध्यात्मिक भाव को छोटा कर देना होगा।
यह कथा हमें बताती है—
जब मन में प्रतिशोध की अग्नि जलती है, तो सबसे पहले वह स्वयं मनुष्य को जलाती है।
काशीराज श्रीकृष्ण से बदला लेना चाहता था।
लेकिन जिस शक्ति को उसने अपने शत्रु के विनाश के लिए बुलाया, वही शक्ति अंततः उसके अपने नगर के विनाश का कारण बन गई।
यही कर्म का रहस्य है।
हम जिस ऊर्जा को संसार में भेजते हैं, कई बार वही घूमकर हमारे जीवन के द्वार पर वापस आ खड़ी होती है।
वाराणसी नाम की एक प्रसिद्ध मान्यता
कालांतर में काशी पुनः विकसित हुई और आज यह संसारभर में वाराणसी के नाम से प्रसिद्ध है।
एक प्रसिद्ध व्युत्पत्ति के अनुसार, यह नगर वरुणा और असि नदियों के बीच स्थित होने के कारण “वाराणसी” कहलाया।
युग बदलते रहे।
राजा बदलते रहे।
साम्राज्य उठे और मिट गए।
लेकिन काशी की आध्यात्मिक चेतना आज भी जीवित है।
गंगा आज भी बह रही है।
मंदिरों में आज भी घंटियाँ बजती हैं।
और भक्त आज भी पुकारते हैं—
“हर हर महादेव!”
 कथा का सबसे गहरा संदेश
श्रीकृष्ण का सुदर्शन केवल शत्रुओं का संहार करने वाला अस्त्र नहीं है।
सुदर्शन का अर्थ ही है—“सुंदर दर्शन” या “शुद्ध दृष्टि”।
जब दृष्टि शुद्ध होती है, तो मनुष्य सत्य को देख पाता है।
और जब दृष्टि प्रतिशोध, अहंकार और द्वेष से ढक जाती है, तब मनुष्य अपनी ही शक्ति को अपने विनाश का कारण बना सकता है।
काशीराज के पास तपस्या थी।
शक्ति थी।
राज्य था।
लेकिन उसके भीतर प्रतिशोध था।
और यही प्रतिशोध उसके पतन का कारण बना।
इसलिए जीवन में सबसे बड़ी विजय किसी दूसरे को हराने में नहीं है।
सबसे बड़ी विजय है—
अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और प्रतिशोध को जीत लेना।
क्योंकि जिसने अपने मन को जीत लिया, उसने सबसे बड़ा युद्ध जीत लिया।
और जिसने अपने मन को हारने दिया, उसके हाथ में शक्ति होते हुए भी वह स्वयं अपने विनाश का मार्ग बना सकता है।
 अंतिम भाव
काशी महादेव की नगरी है,
कृष्ण धर्म के रक्षक हैं,
और सुदर्शन सत्य की तीक्ष्ण दृष्टि का प्रतीक।

अहंकार और साधना

संत कबीर गांव के बाहर झोपड़ी बनाकर अपने पुत्र कमाल के साथ रहते थे। संत कबीर जी का रोज का नियम था- नदी में स्नान करके गांव के सभी मंदिरों में जल चढाकर दोपहर बाद भजन में बैठते, शाम को देर से घर लौटते।
वह अपने नित्य नियम से गांव में निकले थे इधर पास के गांव के जमींदार का एक ही जवान लडका था जो रात को अचानक मर गया रात भर रोना-धोना चला।
आखिर में किसी ने सुझाया कि गांव के बाहर जो बाबा रहते हैं उनके पास ले चलो शायद वह कुछ कर दें। सब तैयार हो गए, लाश को लेकर पहुंचे कुटिया पर देखा बाबा तो हैं नहीं, अब क्या करें ?
तभी कमाल आ गए उनसे पूछा कि बाबा कब तक आएंगे ? कमाल ने बताया कि अब उनकी उम्र हो गई है सब मंदिरों के दर्शन करके लौटते-लौटते रात हो जाती है. आप काम बोलो क्या है ?
लोगों ने लड़के के मरने की बात बता दी कमाल ने सोचा कोई बीमारी होती तो ठीक था पर ये तो मर गया है अब क्या करें ! फिर भी सोचा लाओ कुछ करके देखते हैं शायद बात बन जाए।
कमाल ने कमंडल उठाया लाश की तीन परिक्रमा की फिर तीन बार गंगा जल का कमंडल से छींटी मारा और तीन बार राम नाम का उच्चारण किया लडका देखते ही देखते उठकर खड़ा हो गया लोगों की खुशी की सीमा न रही।
इधर कबीर जी को किसी ने बताया कि आपके कुटिया की ओर गांव के जमींदार और सभी लोग गए हैं कबीर जी झटकते कदमों से बढ़ने लगे उन्हें रास्ते में ही लोग नाचते कूदते मिले कबीर जी कुछ समझ नही पाए।
आकर कमाल से पूछा कया बात हुई ? तो कमाल तो कुछ ओर ही बताने लगा बोला- गुरु जी बहुत दिन से आप बोल रहे थे ना की तीर्थ यात्रा पर जाना है तो अब आप जाओ यहां तो मैं सब संभाल लूंगा।
कबीर जी ने पूछा क्या संभाल लेगा ? कमाल बोला- बस यही मरे को जिंदा करना, बीमार को ठीक करना ये तो सब अब मैं ही कर लूंगा अब आप तो यात्रा पर जाओ जब तक आप की इच्छा हो।
कबीर ने मन ही मन सोचा- चेले को सिद्धि तो प्राप्त हो गई है पर सिद्धि के साथ ही साथ इसे घमंड भी आ गया है। पहले तो इसका ही इलाज करना पडेगा बाद मे तीर्थ यात्रा होगी क्योंकि साधक में घमंड आया तो साधना समाप्त हो जाती है।
कबीर जी ने कहा ठीक है आने वाली पूर्णमासी को एक भजन का आयोजन करके फिर निकल जाउंगा यात्रा पर तब तक तुम आस-पास के दो चार संतो को मेरी चिट्ठी जाकर दे आओ भजन में आने का निमंत्रण भी देना।
कबीर जी ने चिट्ठी मे लिखा था- 
कमाल भयो कपूत, कबीर को कुल गयो डूब।
कमाल चिट्ठी लेकर गया एक संत के पास उनको चिट्ठी दी चिट्ठी पढ के वह समझ गए उन्होंने कमाल का मन टटोला और पूछा कि अचानक ये भजन के आयोजन का विचार कैसे हुआ।
कमाल ने अहं के साथ बताया- कुछ नहीं गुरू जी की लंबे समय से तीर्थ पर जाने की इच्छा थी अब मैं सब कर ही लेता हूं तो मैने उन्हें कहा कि अब आप जाओ यात्रा कर आओ तो वह जा रहे है ओर जाने से पहले भजन का आयोजन है।
संत दोहे का अर्थ समझ गए उन्होंने कमाल से पूछा- तुम क्या क्या कर लेते हो ? तो बोला वही मरे को जिंदा करना बीमार को ठीक करना जैसे काम।
संत जी ने कहा आज रूको और शाम को यहां भी थोडा चमत्कार दिखा दो उन्होंने गांव में खबर करा दी थोडी देर में दो तीन सौ लोगों की लाईन लग गई सब नाना प्रकार की बीमारी वाले संत जी ने कमाल से कहा- चलो इन सबकी बीमारी को ठीक कर दो।
कमाल तो देख के चौंक गया अरे, इतने सारे लोग हैं। इतने लोगों को कैसे ठीक करूं यह मेरे बस का नहीं है संत जी ने कहा- कोई बात नहीं अब ये आए हैं तो निराश लौटाना ठीक नहींक्षतुम बैठो।
संत जी ने लोटे में जल लिया और राम नाम का एक बार उच्चारण करके छींट दिया एक लाईन में खड़े सारे लोग ठीक हो गए फिर दूसरी लाइन पर छींटा मारा वे भी ठीक बस दो बार जल के छींटे मार कर दो बार राम बोला तो सभी ठीक हो के चले गए।
संत जी ने कहा- अच्छी बात है कमाल हम भजन में आएंगे, पास के गांव में एक सूरदास जी रहते हैं उनको भी जाकर बुला लाओ फिर सभी इक्ठ्ठे होकर चलते हैं भजन में।
कमाल चल दिया सूरदास जी को बुलाने सारे रास्ते सोचता रहा कि ये कैसे हुआ कि एक बार राम कहते ही इतने सारे बीमार लोग ठीक हो गए, मैंने तीन बार प्रदक्षिणा की, तीन बार गंगा जल छिड़क कर तीन बार राम नाम लिया तब बात बनी।
यही सोचते-सोचते सूरदास जी की कुटिया पर पहुंच गया जाके सब बात बताई कि क्यों आना हुआ कमाल सुना ही रहा था कि इतने में सूरदास बोले- बेटा जल्दी से दौड के जा टेकरी के पीछे नदी में कोई बहा जा रहा है जल्दी से उसे बचा ले।
कमाल दौड के गया टेकरी पर से देखा नदी में एक लडका बहा आ रहा था कमाल नदी में कूद गया और लडके को बाहर निकाल कर अपनी पीठ जी लादके कुटिया की तरफ चलने लगा।
चलते- चलते उसे विचार आया कि अरे सूरदास जी तो अंधे हैं फिर उन्हें नदी और उसमें बहता लडका कैसे दिख गया उसका दिमाग सुन्न हो गया था लडके को भूमि पर रखा तो देखा कि लडका मर चुका था।
सूरदास ने जल का छींटा मारा और बोला- “रा”। तब तक लडका उठ के चल दिया अब तो कमाल अचंभित की अरे इन्हें तो पूरा राम भी नहीं बोला खाली रा बोलते ही लडका जिंदा हो गया।
तब कमाल ने वह चिट्ठी खोल के खुद पढी की इसमें क्या लिखा है जब उसने पढा तो सब समझ मे आ गया।
वापस आ के कबीर जी से बोला गुरु जी संसार मे एक से एक सिद्ध हैं उनके आगे मैं कुछ नहीं हूं गुरु जी आप तो यहीं रहिए अभी मुझे जाकर भ्रमण करके बहुत कुछ सीखने समझने की जरूरत है।

कथा का तात्पर्य कि गुरू की कृपा से सिद्धियां मिलती हैं उनका आशीर्वाद होता है तो साक्षात ईश्वर आपके साथ खड़े होते हैं।गुरू, गुरू ही रहेंगे, वह शिष्य के मन के सारे भाव पढ़ लेते हैं और मार्गदर्शक बनकर उन्हें पतन से बचाते हैं।

Tuesday, August 4, 2026

स्त्री का सम्मान

महादेव के भक्त ऋषि भृंगी थे , वो स्त्रियों को तुच्छ समझते थे। 
वो शिवजी को गुरु तुल्य मानते थे, किन्तु माँ पार्वती को वो अनदेखा करते थे। एक तरह से वो माँ को भी आम स्त्रियों की तरह साधारण और तुच्छ ही समझते थे। महादेव जय भृंगी के इस स्वभाव से चिंतित और खिन्न थे। एक दिन शिव जी ने माता से कहा, आज ज्ञान सभा में आप भी चले। माँ शिव जी के इस प्रस्ताव को स्वीकार की और ज्ञान सभा में शिव जी के साथ विराजमान हो गई। सभी ऋषिगण और देवताओ ने माँ और परमपिता को नमन किया और उनकी प्रदक्षिणा की और अपना अपना स्थान ग्रहण किया.. 
किन्तु भृंगी माँ और शिव जी को साथ देख कर थोड़े चिंतित थे, उन्हें समझ नही आ रहा था कि वो शिव जी की प्रदक्षिणा कैसे करे। बहुत विचारने के बाद भृंगी ने महादेव जी से कहा कि वो पृथक खड़े हो जाये। शिव जी जानते थे भृंगी के मन की बात। वो माँ को देखे, माता उनके मन की बात पढ़ ली और वो शिव जी के आधे अंग से जुड़ गई और अर्धनारीश्वर रूप में विराजमान हो गई। अब तो भृंगी और परेशान, कुछ पल सोचने के बाद भृंगी ने एक राह निकाली। 
भवरें का रूप लेकर शिवजी के जटा की परिक्रमा की और अपने स्थान पर खड़े हो गए। माता को भृंगी के ओछी सोच पे क्रोध आ गया।
 उन्होंने भृंगी से कहा- भृंगी तुम्हे स्त्रियों से इतना ही परहेज है तो क्यूँ न तुम्हारे में से स्त्री शक्ति को पृथक कर दिया जाये और माँ ने भृंगी से स्त्रीत्व को अलग कर दिया। अब भृंगी न तो जीवितों में थे न मृत थे। उन्हें आपार पीड़ा हो रही थी..
वो माँ से क्षमा याचना करने लगे। तब शिव जी ने माँ से भृंगी को क्षमा करने को कहा। 
माँ ने उन्हें क्षमा किया और बोली - संसार में स्त्री शक्ति के बिना कुछ भी नही। बिना स्त्री के प्रकृति भी नही पुरुष भी नही। दोनों का होना अनिवार्य है और जो स्त्रियों को सम्मान नही देता वो जीने का अधिकारी नही। आज संसार में अनेकों ऐसे सोच वाले लोग हैं। उन्हें इस प्रसंग से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। वो स्त्रियों से उनका सम्मान न छीने। खुद जिए और स्त्रियों के लिए भी सुखद संसार की व्यवस्था बनाए रखने में योगदान दें।

Monday, August 3, 2026

बिहारी भैया जी

जब दुनिया ने साथ छोड़ा तब बिहारी जी ‘भैया’ बनकर साथ खड़े हो गए !!
नथिया बाई माता-पिता की लाड़ली,भाग्य की परीक्षा की धधकती अग्नि में तपने वाली एक साध्वी आत्मा। विवाह के कुछ ही समय बाद सुहाग छिन गया और घाव भरा भी नहीं था कि इकलौता भाई भी चला गया। जहाँ कोई भी स्त्री टूट जाती वहाँ नथिया बाई ने आँसुओं को हार नहीं, भक्ति का अभिषेक बना दिया। उनकी दुनिया सिमट गई संतों की सेवा, ठाकुर जी की भक्ति और राधे-राधे का जाप। लेकिन परीक्षा यहीं खत्म नहीं हुई चचेरे भाई ने संत सेवा पर रोक लगा दी। ये रोक उनके लिए सांस रुकने जैसी थी।
तब वो रोती हुई पहुँचीं बिहारी जी के चरणों में हे सांवरिया! अगर मेरी सेवा सच्ची है तो रास्ता तुम दिखाओ।,तुम्हारे बिना मेरा कोई नहीं! और सच में पुकार सुन ली गई।
मोह-माया की जंजीरें टूटीं, और नथिया बाई चल पड़ीं वृंदावन की ओर। ना धन, ना सहारा बस भरोसा मेरे बिहारी मेरे साथ हैं।जंगल और शहर की सीमा पर उन्होंने दीन-दुखियों और संतों की सेवा शुरू कर दी। वो सेवा नहीं करती थीं वो प्रेम लुटाती थीं।
फिर आया रक्षाबंधन भाई की कमी ने हृदय भिगो दिया। सीधे बाँके बिहारी के दरबार पहुँचीं और राखी बाँध दी जगत के स्वामी को! उस दिन से बिहारी जी सिर्फ आराध्य नहीं उनके “भैया” बन गए।
कहते हैं जब भक्त पूरी तरह प्रभु पर निर्भर हो जाता है तब उसकी चिंता खुद नारायण करते हैं। एक दिन संतों को खिलाने के लिए घर में एक दाना भी न बचा आँखें भर आईं आज संत भूखे रहेंगे तभी एक अनजान सेठ आया, गेहूं देकर बोला, इसे पिसवा देना।नथिया बाई ने चक्की घुमाई राधे-राधे जपते हुए और फिर जो हुआ, उसने इतिहास लिख दिया:
चक्की से आटे के साथ सोने के कण झड़ने लगे! ये चमत्कार नहीं बिहारी जी की मुहर थी। मेरे भक्त के भंडारे कभी खाली नहीं रहेंगे। नथिया बाई की भक्ति ऐसी थी कि वो प्रभु से बातें करती थीं, उन्हें दुलारती थीं।और सांवरिया भी कई बार साक्षात् दर्शन देते थे। आज भी वृंदावन के टटीया स्थान पर उनकी स्मृति जीवंत है। वहाँ की संत सेवा हमें याद दिलाती है सच्ची श्रद्धा पत्थर से भी सोना निकाल सकती है। भगवान मूर्ति में ही नहीं, सेवा करते हर हाथ में बसते हैं।
नथिया बाई की कथा एक संदेश है- जब संसार साथ छोड़ दे तो डरना मत क्योंकि उसी मोड़ पर बिहारी जी खुद भैया” बनकर हाथ थाम लेते हैं।

माता अनुसूया

क्या आपने कभी सुना है कि एक साधारण ऋषि-पत्नी ने स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश को शिशु बना दिया था? यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि सनातन परंपरा में वर्णित माता अनुसूया की अद्भुत कथा है। एक ऐसी कथा, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची भक्ति, निष्काम सेवा और अटूट पतिव्रत के सामने स्वयं त्रिदेव भी नतमस्तक हो जाते हैं।
एक समय स्वर्गलोक में एक चर्चा उठी। प्रश्न था कि तीनों लोकों में सबसे महान पतिव्रता नारी कौन है? देवताओं, ऋषियों और सिद्धों के बीच अनेक नाम लिए गए, लेकिन अंत में जब निर्णय देने का समय आया तो स्वयं ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव ने एक ही नाम लिया—माता अनुसूया। उन्होंने कहा कि संसार में यदि कोई स्त्री अपने पतिव्रत, तप, सेवा, करुणा और निष्काम प्रेम के कारण सबसे श्रेष्ठ है, तो वह महर्षि अत्रि की पत्नी माता अनुसूया हैं। यह सुनते ही स्वर्ग का वातावरण बदल गया। माता सरस्वती, माता लक्ष्मी और माता पार्वती के मन में आश्चर्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने सोचा कि आखिर ऐसी कौन-सी विशेषता है जो माता अनुसूया को सबसे महान बनाती है। धीरे-धीरे यह आश्चर्य एक जिज्ञासा में और जिज्ञासा एक परीक्षा की इच्छा में बदल गया।
देवियों ने त्रिदेवों से आग्रह किया कि यदि माता अनुसूया वास्तव में इतनी महान हैं, तो उनकी परीक्षा अवश्य ली जानी चाहिए। पहले तो त्रिदेव इस बात के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने कहा कि सच्चे भक्त की परीक्षा लेना उचित नहीं होता। लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि अंततः उन्होंने माता अनुसूया की भक्ति और पतिव्रत की परीक्षा लेने का निश्चय किया। तीनों ने अपने दिव्य स्वरूप को त्यागकर साधुओं का वेश धारण किया और पृथ्वी पर महर्षि अत्रि के आश्रम की ओर चल पड़े।
उस समय महर्षि अत्रि किसी कार्य से आश्रम से बाहर गए हुए थे। आश्रम में केवल माता अनुसूया थीं। उनका जीवन अत्यंत सरल था। हर प्राणी की सेवा करना, अतिथियों का सत्कार करना, तप और भगवान का स्मरण करना ही उनका दैनिक नियम था। जब तीनों साधु आश्रम पहुंचे तो माता अनुसूया ने उनका अत्यंत आदरपूर्वक स्वागत किया। उन्होंने उनके चरण धोए, आसन दिया और विनम्रता से कहा, "महात्माओं, कृपया भोजन ग्रहण कीजिए। अतिथि मेरे लिए देवतुल्य हैं।"
तीनों साधुओं ने एक-दूसरे की ओर देखा और बोले, "हम भोजन अवश्य करेंगे, लेकिन हमारी एक शर्त है। तुम्हें निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देनी होगी।" यह सुनते ही माता अनुसूया क्षणभर के लिए मौन हो गईं। उनके सामने एक भयंकर धर्मसंकट खड़ा हो गया। एक ओर अतिथि धर्म था, जिसे निभाना उनका कर्तव्य था। दूसरी ओर पतिव्रत धर्म था, जिसकी रक्षा उनके जीवन का सबसे बड़ा व्रत था। सामान्य बुद्धि से इस संकट का कोई समाधान संभव नहीं था।
लेकिन माता अनुसूया विचलित नहीं हुईं। उन्होंने आंखें बंद कीं, अपने पति महर्षि अत्रि का स्मरण किया और मन ही मन भगवान से प्रार्थना की—"यदि मेरा पतिव्रत निष्कलंक है, यदि मैंने कभी अपने धर्म से विचलित होकर कोई कार्य नहीं किया, तो सत्य स्वयं मेरी रक्षा करे।" जैसे ही उन्होंने अपने कमंडलु का पवित्र जल तीनों साधुओं पर छिड़का, उसी क्षण एक अद्भुत चमत्कार हुआ। देखते ही देखते तीनों साधु छह महीने के छोटे-छोटे शिशु बन गए। उनके तेजस्वी शरीर अब मासूम बालकों के रूप में बदल चुके थे।
माता अनुसूया के हृदय में मातृत्व उमड़ पड़ा। उन्होंने उन तीनों शिशुओं को अपनी गोद में उठा लिया। उन्हें प्रेमपूर्वक भोजन कराया, झूले में सुलाया और अपने ही पुत्रों की तरह उनका पालन करने लगीं। पृथ्वी पर माता अनुसूया ने अपना धर्म निभा दिया, लेकिन उसी समय स्वर्गलोक में चिंता फैल गई। ब्रह्मा, विष्णु और महेश अपने-अपने लोकों में दिखाई नहीं दे रहे थे। देवताओं में हड़कंप मच गया। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि सृष्टि के तीनों आधार अचानक कहां लुप्त हो गए।
इसी बीच देवर्षि नारद वहां पहुंचे। उन्होंने ध्यान लगाकर सारी घटना देखी और देवताओं के साथ तीनों देवियों को बताया कि त्रिदेव किसी युद्ध में नहीं हारे, बल्कि माता अनुसूया के निष्कलंक पतिव्रत और तप की शक्ति से शिशु बन गए हैं। यह सुनते ही माता लक्ष्मी, माता पार्वती और माता सरस्वती को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने अहंकारवश एक महान साध्वी की परीक्षा लेने का प्रयास किया था।
तीनों देवियां तुरंत पृथ्वी पर माता अनुसूया के आश्रम पहुंचीं। वहां उन्होंने तीनों दिव्य शिशुओं को माता अनुसूया की गोद में खेलते देखा। लेकिन वे यह पहचान ही नहीं सकीं कि उनमें ब्रह्मा कौन हैं, विष्णु कौन हैं और शिव कौन हैं। तीनों के चेहरे पर समान तेज था। यह देखकर उनका अहंकार पूरी तरह समाप्त हो गया। वे माता अनुसूया के चरणों में गिर पड़ीं और विनम्र स्वर में बोलीं, "माता, हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई। कृपया हमें क्षमा कर दीजिए और हमारे पतियों को उनका वास्तविक स्वरूप लौटा दीजिए।"
माता अनुसूया के हृदय में किसी के प्रति राग या द्वेष नहीं था। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "जहां सच्चा पश्चाताप हो, वहां क्षमा देने में कभी देर नहीं करनी चाहिए।" उन्होंने पुनः अपने तप का संकल्प किया और दिव्य प्रार्थना की। अगले ही क्षण वे तीनों शिशु अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गए। ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वयं माता अनुसूया के सामने हाथ जोड़कर खड़े थे। त्रिदेव बोले, "माता, आज आपने सिद्ध कर दिया कि सच्ची भक्ति, निष्काम सेवा और पतिव्रत की शक्ति के सामने स्वयं देवता भी नतमस्तक हो जाते हैं।"
त्रिदेव माता अनुसूया से अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, "माता, कोई वरदान मांगिए।" माता अनुसूया ने विनम्र स्वर में उत्तर दिया, "प्रभुओं, मुझे किसी धन, वैभव, राज्य या शक्ति की इच्छा नहीं है। आपके दर्शन ही मेरे लिए सबसे बड़ा वरदान हैं।" माता की निष्काम भावना देखकर त्रिदेव और भी अधिक प्रसन्न हो गए। उन्होंने कहा, "तुमने कुछ नहीं मांगा, इसलिए हम स्वयं तुम्हें सबसे महान वरदान देते हैं। हम अपने-अपने दिव्य अंश से तुम्हारे पुत्र रूप में अवतार लेंगे।"
भगवान विष्णु के अंश से भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ, जो योग, ज्ञान और करुणा के प्रतीक बने। भगवान शिव के अंश से महर्षि दुर्वासा प्रकट हुए, जिनका तप और सत्य के प्रति संकल्प अद्वितीय था। ब्रह्मा के अंश से चंद्रदेव का अवतार हुआ, जो शीतलता, संतुलन और सौम्यता के प्रतीक बने। उसी समय महर्षि अत्रि भी आश्रम लौट आए। उन्होंने स्वयं त्रिदेवों के दर्शन किए और समझ गए कि आज उनके आश्रम में कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि युगों तक स्मरण की जाने वाली दिव्य लीला घटित हुई है।
त्रिदेवों ने महर्षि अत्रि और माता अनुसूया को आशीर्वाद देते हुए कहा, "जब तक इस सृष्टि में धर्म, सत्य और भक्ति का प्रकाश रहेगा, तब तक तुम्हारा यश अमर रहेगा। लोग तुम्हारा स्मरण श्रद्धा, पतिव्रत और निष्काम सेवा के सर्वोच्च आदर्श के रूप में करेंगे।" उस दिन देवियों ने भी यह स्वीकार किया कि महानता सौंदर्य, वैभव या शक्ति से नहीं, बल्कि विनम्रता, सेवा, प्रेम और निष्कलंक चरित्र से प्राप्त होती है।