महामंत्र > हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे|हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे||

Saturday, May 9, 2026

आलसी-कछुवा

एक समय की बात है। एक बड़े तालाब के नजदीक एक कछुआ युवती निवास करती थी। उसके शरीर से बहुत बुरी गंध आती थी और उसका चेहरा भी बहुत बदसूरत था। वह बहुत मूर्ख भी थी। साथ ही वह उतनी ही आलसी और तमाम तरह की गंदी आदतों वाली थी। उसका नाम पाशांडी था।
वह जिस तालाब के नजदीक रहती थी उस तालाब का पानी बहुत साफ था। तारे और तमाम दूसरे ग्रह नक्षत्र इस निर्मल सरोवर के जल में अपनी परछाईं नित्य प्रति देखते रहते और उसकी सुंदरता पर मुग्ध रहते, जब सरोवर के जल में अनंत तारों का प्रकाश फैल जाता, टिमटिमाते तारे उसके निर्मल जल में अठखेलियाँ करते प्रतीत होते और वह सरोवर पृथ्वी पर आकाश का एक छोटा टुकड़ा सा प्रतीत होता। ऐसे समय में का पाशांडी को सरोवर में कूदकर नहाना, इधर से उधर तक अपने सिर को उठाए तैरना बहुत सुखकर प्रतीत होता। वह पानी में दूर तक तैरती और फिर वापस लौटती। तारों की परछाइयों के बीच आनंद से ओतप्रोत होकर उनसे विभिन्न प्रकार के खेल खेलती।
उस सरोवर में एक चमकीला तारा रोज अपनी परछाईं देखने आता और जल की निर्मलता में अपने रूप सौंदर्य को देखकर खुद अपने ऊपर मोहित सा रहता। उसका नाम निकुंज था। वह का पाशांडी को रोज जल में अठखेलियाँ करते हुए देखता। उसे आश्चर्य होता कि का पाशांडी उसकी परछाईं के साथ बहुत समय तक बड़े प्यार से खेलती रहती थी। वह आकाश में इतनी दूर था कि का पाशांडी की बदसूरती को नहीं देख सकता था और न ही उसे यह पता था कि वह कितनी आलसी और मूर्ख युवती है। उसे सिर्फ इतना ही पता था कि रात में वह बहुत खुलकर उसकी परछाईं के साथ बहुत प्यार से तमाम तरह के खेल खेलती है। यह देख कर उसे बहुत अच्छा लगता था। एक दिन उसने सोचा कि वह अगर उसकी परछाईं
पर इतनी मुग्ध है तो अगर वह वास्तव में उसे मिल जाए तो वह कितनी खुश होगी और उसे कितना अधिक प्रेम करेगी। यह सोच निकुंज मन-ही-मन का पाशांडी से प्रेम करने लगा। उसने निश्चय किया कि एक दिन वह उससे मिलने पृथ्वी पर अवश्य जाएगा और का पाशांडी से विवाह करेगा। जब उसके दोस्तों ने इस संबंध के बारे में सुना वे बुरी तरह परेशान हो गए। उन लोगों ने उसे समझाने की कोशिश की कि उसका निर्णय अत्यधिक खतरनाक है। किसी दूसरी भूमि पर जाना और वहाँ अपना घर बनाना तथा एक ऐसे व्यक्ति से संबंध स्थापित करना, जिसके बारे में वह कुछ नहीं जानता, किसी भी तरह उचित नहीं है। दूसरी भूमि के लोगों की आदतें और स्वभाव पूरी तरह अलग होते हैं, इसलिए उनके साथ सहज संबंध बनाना कतई आसान नहीं होता, परंतु निकुंज ने किसी की बात न मानी। सचमुच प्रेम में डूबे व्यक्ति को कुछ भी दिखाई नहीं देता, अतः एक दिन वह चमकीला तारा आकाश में अपने घर को छोड़ अपनी पूरी संपत्ति के साथ पृथ्वी पर का पाशांडी से मिलने उसके पास पहुँच गया। उसने अपनी पूरी संपत्ति का पाशांडी को अर्पित कर दी।
जब का पाशांडी को इसका अहसास हुआ कि अचानक वह इतनी अमीर हो गई है और दुनिया में सबसे अलौकिक व्यक्ति से उसका विवाह हुआ है तो उसका सिर गर्व से ऊँचा उठ गया। वह और भी अहंकार से भर उठी। उसकी अकर्मण्यता और आलस्य भी निरंतर बढ़ता गया, अब वह पहले से भी अधिक आलसी और सुस्त हो गई थी। उसका घर पूरी तरह गंदगी से भरा और अस्त-व्यस्त रहता तथा उसका शरीर भी कीचड़ से सना होता, फिर भी वह उन्हें साफ करने का कोई प्रयास न करती। उसे यह देखकर भी बिल्कुल शरम नहीं आती कि उसके पति को बहुत गंदे और टूटे-फूटे बरतनों में खाना मिलता है।
का पाशांडी के इस व्यवहार को देखकर निकुंज बहुत उदास और दुःखी हुआ, परंतु अत्यंत ध्यानपूर्वक वह अपनी पत्नी को समझाने का प्रयास करता रहा। उसे साफ सफाई से रहने और अपने व्यवहार में सुधार करने की प्रार्थना करता रहा, परंतु इन सबका का पाशांडी के ऊपर कोई असर नहीं पड़ा। वह दिन-ब-दिन और अधिक आलसी और आराम तलब होती गई। पैसे, धन-संपत्ति की अधिकता के कारण उसका अहंकार भी दिनों दिन और भी गहरा होता गया। ठीक ही कहा गया है कि किसी आलसी की आदत को सुधारना दुनिया में सबसे मुश्किल काम होता है।
अंत में परेशान होकर निकुंज ने उसे छोड़ देने की धमकी दी। उसके पड़ोसियों ने भी उसे समझाया कि वह अपनी आदतों में सुधार कर ले नहीं तो अगर उसके पति ने उसे छोड़ दिया तो उसकी स्थिति बहुत बुरी हो जाएगी, परंतु इतना होने के बावजूद भी का पाशांडी की आदतों में कोई बदलाव नहीं आया। अंत में पूरी तरह निराश हो जाने के बाद निकुंज अपनी सारी संपत्ति अपने साथ समेटकर वापस अपने घर आकाश में चला गया।
अब अचानक का पाशांडी को अपनी गलती का एहसास हुआ। पति के वापस चले जाने से वह दुःख और पीड़ा से भर उठी। उसे अपना जीवन तमाम तरह के अभाव से ग्रस्त और परेशानियों से भरा हुआ प्रतीत हुआ। वह आकाश की ओर जाते हुई अपने पति को गिड़गिड़ाकर पुकारने लगी कि बस एक बार वह वापस चला आए, अब वह अपनी आदतों में सुधार कर लेगी और जैसा वह कहेगा, वैसा ही व्यवहार करेगी, परंतु अब बहुत देर हो चुकी थी। उसका पति फिर वापस कभी नहीं आया और वह अकेले ही पीड़ा और शरम में डूबी अपना जीवन निर्वाह करती रही।
आज भी का पाशांडी इस उम्मीद में रहती है कि उसका पति वापस पृथ्वी पर लौटकर आएगा। वह आकाश की ओर अपनी गरदन उठाएँ, निरंतर उसी तरफ देखती रहती है। दुःख से भरी हुई, धीरे-धीरे चलती, वह एकटक आकाश की ओर देखती है और उसे लगता है कि उसका पति किसी भी क्षण वापस आ सकता है। इस घटना के बाद का पाशांडी का नाम उस पूरे क्षेत्र में अत्यंत घृणा के साथ लिया जाने लगा। लोग उसका मजाक उड़ाते और वह सब के लिए घृणा का पात्र बन गई। उसे मूर्खता और गंदगी का पर्याय माना जाने लगा। उसको लेकर तमाम तरह के मुहावरे और गीत बने और लोग आज भी आलसी और अकर्मण्य पत्नियों को चेतावनी देने के लिए उसका उदहारण देते हैं और उन मुहावरों का प्रयोग करते हैं, जो उसके अपमान में बने थे। समाज की परित्यक्त स्त्रियों को शिक्षा देने के लिए आज भी खासी समाज में का पाशांडी की कथा कही जाती है।

लंका का पुस्तकालय

लंका जलने के तीसरे दिन, जब राख अभी गर्म थी, विभीषण जी ने अशोक वाटिका के पीछे वाले गुप्त कक्ष का ताला खोला।
यह रावण का निजी पुस्तकालय था। सोने की दीवारें नहीं, ताड़पत्र थे। दस हज़ार से ज़्यादा। उन पर कोई राक्षसी मंत्र नहीं, सामवेद के स्वर, आयुर्वेद के सूत्र, नक्षत्र गणना, और वीणा के आलाप लिखे थे।
एक युवा राक्षस, मेघनाद का बेटा अक्षय नहीं, उसका शिष्य तरणि, ने पूछा, "महाराज विभीषण जी, सब कहते हैं दशानन अजेय थे क्योंकि ब्रह्माजी का वरदान था। क्या यही उनकी शक्ति का रहस्य था?"
विभीषण जी हँसे, पर हँसी में थकान थी। "वरदान कवच देता है, तलवार नहीं। भैया की शक्ति का रहस्य दस सिरों में नहीं था। वह दस सिरों में बँटा हुआ था।"
पहला सिर – सुनने वाला
रावण पैदा पुलस्त्य ऋषिदेव जी के कुल में हुआ, जन्म से ब्राह्मण था। दस साल की उम्र में उसने अपने पिता विश्रवा जी से पूछा, "पिताजी, राक्षस क्यों डरते हैं?" विश्रवा ने कहा, "क्योंकि वे सुनते नहीं।"
रावण ने तब पहला तप किया। वह हिमालय गया, कैलाश जी की छाया में बैठा, और शिव जी का तांडव नहीं, शिवजी का मौन सुना। सात साल तक उसने सिर्फ सुना। हवा, पानी, यक्षों की फुसफुसाहट, मरते हुए पशुओं की साँस।
जब वह लौटा, तो उसके पास पहला सिर था – श्रोता। वह किसी भी भाषा को एक बार में समझ लेता। देव, दानव, नाग, पशु। इसीलिए वह यम से युद्ध कर सका, क्योंकि यम के भैंसे की थकान की आवाज़ सुन ली थी।
लोगों ने कहा, "रावण को वरदान मिला।" सच यह था कि उसने सुनने की तपस्या की थी।
दूसरा सिर – गाने वाला
दूसरा रहस्य उसकी वीणा थी, रुद्र वीणा। रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए सिर काटे, यह कथा सब जानते हैं। पर वह सिर काटना बलि नहीं था, स्वर था।
हर बार जब वह अपना सिर चढ़ाता, तो नाड़ी से एक नया स्वर निकलता। नौ बार उसने किया। दसवें बार शिवजी ने हाथ पकड़ लिया। कहा, "बस कर। तूने मृत्यु को संगीत बना दिया।"
उस दिन से रावण के कंठ में वह शक्ति आई कि वह सामवेद को उल्टा गा सके। उल्टा सामवेद मृत्यु को रोकता नहीं, समय को धीमा करता है। इसीलिए लंका में घड़ी धीरे चलती थी। राक्षस सौ साल जवान रहते।
विभीषण जी ने एक ताड़पत्र उठाया। उस पर रागभैरव उल्टा लिखा था। "भैया इसे रोज़ भोर में गाते थे। कहते थे, शक्ति मारने में नहीं, ठहरने में है।
तीसरा सिर – गिनने वाला
रावण ज्योतिषी था, पर फलित नहीं, गणित। उसने लंका की नींव उस मुहूर्त में रखी जब शनि वक्री था। सबने कहा अपशकुन। उसने कहा, "वक्री ग्रह पीछे देखता है। जो पीछे देखे, वह गिरता नहीं।"
उसने नवग्रह को बंदी बनाया, यह भी आधा सच है। उसने उन्हें बंदी नहीं, बंधक बनाया। हर ग्रह से एक सूत्र लिया। मंगल से धातु विज्ञान, बुध से भाषा, शुक्र से संजीवनी का अधूरा सूत्र।
उसका दसवाँ सिर यही था – संग्रहकर्ता। वह जानता था कि ज्ञान बाँटने से घटता नहीं, पर रोकने से सड़ता है। उसने रोक लिया। लंका का पुस्तकालय दुनिया का सबसे बड़ा था, पर द्वार बंद था।

चौथा रहस्य – अहंकार नहीं, भय

तरणि ने पूछा, "फिर हारे क्यों?"
विभीषण जी ने राख पर हाथ फेरा। "क्योंकि उसने दस सिरों को एक साथ कभी नहीं सुना।"
रावण की असली शक्ति एकाग्रता थी। वह एक समय में एक ही सिर से सोचता। युद्ध में वह योद्धा, यज्ञ में ब्राह्मण, दरबार में राजा, वीणा पर कलाकार। पर जब सीता जी को लाया, तब पहली बार दसों सिर एक साथ बोले।
एक ने कहा, यह अधर्म है। दूसरे ने कहा, यह प्रतिशोध है। तीसरे ने कहा, यह प्रेम है। चौथे ने कहा, यह परीक्षा है। पाँचवें ने कहा, यह नियति है।
वह सुन नहीं पाया। उसने सुनना बंद कर दिया था। जिस दिन उसने श्रोता सिर को चुप कराया, उसी दिन शिवजी का दिया हुआ स्वर टूट गया।
लोग कहते हैं रामजी ने नाभि में बाण मारा। नाभि में अमृत था, यह भी कथा है। सच यह है कि नाभि वह जगह है जहाँ से आवाज़ निकलती है। रावण की नाभि में वह पहला स्वर बचा था जो उसने कैलाश पर सुना था। रामजी ने उसे नहीं मारा, उसे मुक्त किया।
बाण लगते ही रावण हँसा। विभीषण जी ने देखा था। अंतिम क्षण में दसों सिर एक साथ चुप हो गए, और पहली बार वह पूरा सुन पाया – अपने भीतर का मौन।उसने रामजी से कहा, "मुझे ब्राह्मण की तरह अग्नि देना।" वह वरदान नहीं माँग रहा था, वह याद दिला रहा था कि वह कौन था।

रहस्य का अंत
विभीषण जी ने ताड़पत्र समेटे और कहा, "भैया जी की शक्ति तप था, संगीत था, गणना थी। पर शक्ति का रहस्य यह नहीं कि तुम कितना इकट्ठा कर लो। रहस्य यह है कि तुम कितना छोड़ सको।"
"उसने देवताओं से अमरता माँगी, ब्रह्माजी ने कहा नहीं। उसने मनुष्य और वानर को छोड़ दिया, क्योंकि उसे लगा वे तुच्छ हैं। वही छूट उसे ले डूबी। शक्ति जब चुनती है कि किसे छोटा समझे, तभी वह अंधी हो जाती है।"
तरणि ने पूछा, "तो क्या रावण जी बुरे थे?
विभीषण जी ने उत्तर नहीं दिया। उसने वीणा उठाई, जो कोने में रखी थी। एक तार टूटा था। उसने उसे छेड़ा। बेसुरी आवाज़ निकली।
"बुरे नहीं, अधूरे थे। दस सिर होने का अर्थ दस बार सोचना नहीं, एक बार दसों को सुनना है। वह कभी नहीं कर पाये।बाहर लंका में नई सुबह हो रही थी। राख पर अंकुर फूट रहे थे। विभीषण जी ने पुस्तकालय का द्वार खोल दिया। पहली बार लंका के बच्चे अंदर आए, ताड़पत्र छुए, स्वर पढ़े।और तब, कहते हैं, हवा में कहीं दूर से रुद्र वीणा का उल्टा भैरव फिर बजा, पर इस बार धीमा नहीं, मुक्त। जैसे कोई बहुत पुराना श्रोता अंत में अपना ही गीत सुन रहा हो।

मैं हर जीव में उपस्थित हूँ

एक धनवान सेठ थे, जो श्री कृष्ण के परम भक्त थे। वे दिन-रात कान्हा का नाम जपते और प्रतिदिन स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर मंदिर में भोग लगाने जाते।
परंतु उनके साथ एक विचित्र बात होती—जैसे ही वे रास्ते में चलते, उन्हें नींद आ जाती और जब आँख खुलती तो सारे पकवान गायब मिलते। यह देखकर वे बहुत दुखी होते और कान्हा से शिकायत करते—
“प्रभु! मैं आपके लिए भोग बनाता हूँ, फिर भी आपको अर्पित क्यों नहीं कर पाता?”
तब कान्हा मुस्कुराकर कहते—
“वत्स, हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है। जो मेरे भाग्य में होगा, वही मेरे पास आएगा।”
सेठ को यह बात समझ नहीं आई। उन्होंने दृढ़ निश्चय किया—
“प्रभु! कल मैं आपको भोग लगाकर ही रहूँगा।”
अगले दिन वे सुबह-सुबह उठे, स्नान किया और अपनी पत्नी से अनेक प्रकार के स्वादिष्ट पकवान बनवाए। चार डिब्बों में भरकर वे मंदिर के लिए निकल पड़े और मन ही मन सोचते रहे—
“आज चाहे कुछ भी हो जाए, मैं सोऊँगा नहीं।”
रास्ते में उन्हें एक भूखा, दुबला-पतला छोटा बच्चा मिला, जो हाथ फैलाकर भोजन माँग रहा था। सेठ का हृदय पिघल गया और उन्होंने उसे एक लड्डू दे दिया।
जैसे ही बच्चे को लड्डू मिला, वहाँ कई और भूखे बच्चे आ गए। उनकी हालत देखकर सेठ से रहा नहीं गया, और उन्होंने सबको भोजन बाँटना शुरू कर दिया। देखते ही देखते सारे पकवान बच्चों में बाँट दिए गए।
तभी उन्हें याद आया—
“अरे! आज तो मैंने कान्हा को भोग लगाने का वचन दिया था…”
थोड़े उदास मन से वे मंदिर पहुँचे और श्रीकृष्ण के सामने बैठ गए। तभी कान्हा प्रकट हुए और प्रेम से बोले—
“जल्दी लाओ मेरा भोग, मुझे बहुत भूख लगी है!”
सेठ ने संकोच से सारी बात बता दी।
कान्हा मुस्कुराए और बोले—
“मैंने पहले ही कहा था—हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है। जिनके नाम थे, उन्होंने खा लिया। तुम व्यर्थ चिंता क्यों करते हो?”
फिर कान्हा सेठ को अपने साथ उन बच्चों के पास ले गए।
सेठ ने देखा—उन भूखे बच्चों के बीच स्वयं कृष्ण विभिन्न रूपों में भोजन करते हुए दिखाई दे रहे हैं। यह दृश्य देखकर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
कान्हा बोले—
“मैं हर जीव में उपस्थित हूँ। जब तुमने उन बच्चों को खिलाया, तब वास्तव में तुमने मुझे ही भोग लगाया। मैं अलग-अलग रूपों में, अलग-अलग स्थानों पर वही स्वीकार करता हूँ जो मेरे भाग्य में होता है।”
यह सुनकर सेठ भाव-विभोर होकर प्रभु के चरणों में गिर पड़े और बोले—
“प्रभु, आपकी लीला अपरंपार है।”
कान्हा हँसते हुए बोले—
“कल फिर भोग बनाना… और इस बार भी मुझे ही देना!”
सेठ और भगवान दोनों मुस्कुरा उठे।

Thursday, May 7, 2026

चिड़िया की परेशानी

घने जंगल में एक अनोखी चिड़िया रहती थी, जिसका नाम था कैसोवैरी। वह दिखने में तो चिड़िया थी, पर बाकी चिड़ियों की तरह उड़ नहीं सकती थी। उसके पंख छोटे और शरीर भारी था, इसलिए वह अधिकतर जमीन पर ही रहती थी। बचपन से ही दूसरी चिड़ियों के बच्चे उसे देखकर मज़ाक उड़ाते थे।
कोई कहता, “अरे, जब तू उड़ ही नहीं सकती तो चिड़िया किस काम की?”
कोई पेड़ की ऊँची डाल पर बैठकर चिल्लाता, “कभी हमारे पास भी आ जाया कर… हर समय जानवरों की तरह नीचे ही घूमती रहती है!”
इतना कहकर सब जोर-जोर से हँसने लगते। शुरू-शुरू में कैसोवैरी इन बातों को अनदेखा कर देती थी। वह सोचती थी कि शायद एक दिन सब उसे समझेंगे। लेकिन रोज़-रोज़ के तानों और मज़ाक ने धीरे-धीरे उसके दिल को दुखी कर दिया।
एक दिन वह बहुत उदास होकर एक पेड़ के नीचे बैठ गई। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने आसमान की ओर देखते हुए कहा,
“हे ईश्वर! आपने मुझे चिड़िया क्यों बनाया? और अगर बनाया तो मुझे उड़ने की शक्ति क्यों नहीं दी? देखिए, सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं। अब मैं इस जंगल में एक पल भी नहीं रहना चाहती। मैं इस जगह को हमेशा के लिए छोड़कर जा रही हूँ।”
यह कहकर कैसोवैरी धीरे-धीरे जंगल से बाहर जाने लगी। वह कुछ ही दूर पहुँची थी कि पीछे से एक भारी आवाज़ सुनाई दी—
“रुको कैसोवैरी! तुम कहाँ जा रही हो?”
कैसोवैरी ने आश्चर्य से पीछे मुड़कर देखा। सामने एक बड़ा-सा जामुन का पेड़ खड़ा था। वही उससे बात कर रहा था।
पेड़ ने प्यार से कहा,
“कृपया तुम यहाँ से मत जाओ। हमें तुम्हारी बहुत ज़रूरत है। पूरे जंगल में पेड़-पौधों के फलने-फूलने में तुम्हारा बहुत बड़ा योगदान है। तुम अपनी मजबूत चोंच से फलों को खाती हो और उनके बीज पूरे जंगल में बिखेर देती हो। उन्हीं बीजों से नए पेड़ उगते हैं और जंगल हरा-भरा बना रहता है।”
पेड़ ने आगे कहा,
“हो सकता है बाकी चिड़ियों के लिए तुम्हारा कोई महत्व न हो, लेकिन हमारे लिए तुम बहुत महत्वपूर्ण हो। तुम जैसी चिड़िया इस जंगल में और कोई नहीं है। तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता। इसलिए कृपया हमें छोड़कर मत जाओ।”
पेड़ की बातें सुनकर कैसोवैरी की आँखों में चमक आ गई। उसे पहली बार महसूस हुआ कि वह इस दुनिया में बेकार नहीं है। भगवान ने उसे भी एक खास काम के लिए बनाया है। सिर्फ उड़ नहीं पाने से वह किसी से कम नहीं हो जाती है 
अब उसका मन हल्का और खुश हो गया। उसने सोचा कि दूसरों की बातों से दुखी होना ठीक नहीं। हर किसी के अंदर कोई न कोई खास गुण होता है।
कैसोवैरी मुस्कुराई और खुशी-खुशी वापस जंगल की ओर लौट गई। अब वह पहले की तरह उदास नहीं थी। उसे अपने अस्तित्व और अपने महत्व का एहसास हो चुका था।
शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी दूसरों से अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए। हर इंसान अपने आप में अनोखा और खास होता है। भगवान ने हर किसी को किसी न किसी विशेष उद्देश्य के लिए बनाया है। इसलिए हमें अपने गुणों को पहचानना चाहिए और सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीना चाहिए।

Wednesday, May 6, 2026

भक्त माई पंजीरी जी

वृंदावन के पास एक गाँव में भोली-भाली माई ‘पंजीरी’ रहती थी।दूध बेच कर वह अपनी जीवन नैया चलाती थी। वह मदनमोहन जी की अनन्य भक्त थी। 
ठाकुर मदनमोहन लाल भी उससे बहुत प्रसन्न रहते थे। वे उसे स्वप्न में दर्शन देते और उससे कभी कुछ खाने को माँगते, कभी कुछ। पंजीरी उसी दिन ही उन्हें वह चीज बनाकर भेंट करती,
वह उनकी दूध की सेवा नित्य करती थी, सबसे पहले उनके लिए प्रसाद निकालती, रोज उनके दर्शन करने जाती और दूध दे आती।
लेकिन गरीब पंजीरी को चढ़ावे के बाद बचे दूध से इतने पैसे भी नहीं मिलते थे कि दो वक्त का खाना भी खा पाये, अतः कभी कभी मंदिर जाते समय यमुना जी से थोड़ा सा जल दूध में मिला लेती।
फिर लौटकर अपने प्रभुजी की अराधना में मस्त होकर बाकी समय अपनी कुटिया में बाल गोपाल जी के भजन कीर्तन करके बिताती।
कृष्ण कन्हैया जी तो अपने भक्तों की टोह में रहते ही हैं, नित नई लीला करते हैं।
एक दिन पंजीरी के सुंदर जीवन क्रम में भी रोड़ा आ गया। जल के साथ-साथ एक छोटी सी मछली भी दूध में आ गई और मदनमोहन जी के चढ़ावे में चली गई।
दूध डालते समय मंदिर के गोसाईं की दृष्टि पड़ गई। गोसाईं जी को बहुत गुस्सा आया, उन्होंने दूध वापस कर दिया,
पंजीरी को खूब डाँटा फटकारा और मंदिर में उसका प्रवेश निषेध कर दिया।
पंजीरी पर तो जैसे आसमान टूट पड़ा। रोती-बिलखती घर पहुँची-ठाकुरजी; मुझसे बड़ा अपराध हो गया, क्षमा करो, पानी तो रोज मिलाती हूँ, तुमसे कहाँ छिपा है,
ना मिलाओ तो गुजारा कैसे हो ? और उस बेचारी मछली का भी क्या दोष ? उस पर तो तुम्हारी कृपा हुई तो तुम्हारे पास तक पहुँची।
लेकिन प्रभुजी, तुमने तो आज तक कोई आपत्ति नहीं की, प्रेम से दूध पीते रहे, फिर ये गोसाईं कौन होता है मुझे रोकने वाला।
और मुझे ज़्यादा दुःख इसलिए है कि तुम्हारे मंदिर के गोसाईं ने मुझे इतनी खरी खोटी सुनाई और तुम कुछ नहीं बोले।
ठाकुर, यही मेरा अपराध है तो मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि तुम अगर रूठे रहोगे, मेरा चढ़ावा स्वीकार नहीं करोगे तो मैं भी अन्न-जल ग्रहण नहीं करुंगी,
यहीं प्राण त्याग दूंगी। भूखी प्यासी, रोते रोते शाम हो गई।
तभी पंजीरी के कानों में एक मधुर कंठ सुनाई दिया- माई ओ माई, उठी तो दरवाजे पर देखा कि एक अतिसुंदर किंतु थका-हारा सा एक किशोर कुटिया में झाँक रहा है।
कौन हो बेटा...?
मैया, बृजवासी ही हूँ, मदन मोहन के दर्शन करने आया हूँ। बड़ी भूख लगी है कुछ खाने का मिल जाए तो तुम्हारा बड़ा आभारी रहूँगा।
पंजीरी के शरीर में ममता की लहर दौड़ गई। कोई पूछने की बात है बेटा, घर तुम्हारा है।
ना जाने तुम कौन हो जिसने आते ही मुझ पर ऐसा जादू बिखेर दिया।
बड़ी दूर से आए हो क्या ? क्या खाओगे ? अभी जल्दी से बना दूँगी।
अरे मैया, इस समय क्या रसोई बनाओगी, थोड़ा सा दूध दे दो वही पी कर सो जाउँगा।
दूध की बात सुनते ही पंजीरी की आँखें डबडबा आयीं, फिर अपने आप को सँभालते हुए बोली-
बेटा, दूध तो है पर सवेरे का है, जरा ठहरो अभी गैया को सहला कर थोड़ा ताजा दूध दुह लेती हूँ।
अरे नहीं मैया, उसमें समय लगेगा। सवेरे का भूखा प्यासा हूँ, दूध का नाम लेकर तूने मुझे अधीर बना दिया है,
अरे वही सुबह का दे दो, तुम बाद में दुहती रहना।
डबडबायी आँखों से बोली... थोड़ा पानी मिला हुआ दूध है।
अरे मैया तुम मुझे भूखा मारोगी क्या ? जल्दी से दूध छान कर दे दो वर्ना मैं यहीं प्राण छोड़ दूंगा।
पंजीरी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये बालक कैसी बात कर रहा है, दौड़ी-दौड़ी गई और झटपट दूध दे दिया।
दूध पीकर बालक का चेहरा खिल उठा।
मैया, कितना स्वादिष्ट दूध है। तू तो यूँ ही ना जाने क्या-क्या बहाने बना रही थी,
अब तो मेरी आँखों में नींद भर आई है, अब मैं सो रहा हूँ, इतना कहकर वो वहीं सो गया।
पंजीरी को फ़ुर्सत हो गई तो दिन भर की थकान, दुःख और अवसाद ने उसे फिर घेर लिया।
जाड़े के दिन थे ,भूखे पेट उसकी आँखों में नींद कहाँ से आती। जाडा़ बढ़ने लगा तो अपनी ओढ़नी बालक को ओढ़ा दी।
दूसरे प्रहर जो आँख लगी कि ठाकुर श्री मदन मोहन लाल जी को सम्मुख खड़ा पाया।
ठाकुर जी बोले, मैया, मुझे भूखा मारेगी क्या ? गोसाईं की बात का बुरा मान कर रूठ गयी।
खुद पेट में अन्न का एक दाना तक न डाला और मुझे दूध पीने को कह रही है।
मैंने तो आज तेरे घर आकर दूध पी लिया अब तू भी अपना व्रत तोड़ कर कुछ खा पी ले और देख,
मैं रोज़ तेरे दूध की प्रतीक्षा में व्याकुल रहता हूँ, मुझे उसी से तृप्ति मिलती है। अपना नियम कभी मत तोड़ना।
गोसाईं भी अब तेरे को कुछ ना कहेंगे। दूध में पानी मिलाती हो, तो क्या हुआ ? उससे तो दूध जल्दी हज़म हो जाता है। अब उठो और भोजन करो।
पंजीरी हड़बड़ाकर उठी, देखा कि बालक तो कुटिया में कहीं नहीं था।
सचमुच लाला ही कुटिया में पधारे थे। पंजीरी का रोम-रोम हर्षोल्लास का सागर बन गया।
झटपट दो टिक्कड़ बनाए और मदन मोहन जी को भोग लगाकर आनंदपूर्वक खाने लगी। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी।
थोड़ी देर में सवेरा हो गया पंजीरी ने देखा कि ठाकुर जी उसकी ओढ़नी ले गये हैं और अपना पीतांबर कुटिया में ही छोड़ गए हैं।
इधर मंदिर के पट खुलते ही गोसाईं ने ठाकुर जी को देखा तो पाया की प्रभुजी एक फटी पुरानी सी ओढ़नी ओढ़े आनंद के सागर में डूबे हैं।
उसने सोचा कि प्रभुजी ने अवश्य फिर कोई लीला की है, लेकिन इसका रहस्य उसकी समझ से परे था।
लीला-उद्घाटन के लिए पंजीरी दूध और ठाकुर जी का पीताम्बर लेकर मंदिर के द्वार पर पहुँची और बोली -
गुसाईं जी, देखो तो लाला को, पीतांबर मेरे घर छोड़ आये और मेरी फटी ओढ़नी ले आये।
कल सवेरे आपने मुझे भगा दिया था, लेकिन भूखा प्यासा मेरा लाला दूध के लिये मेरी कुटिया पर आ गया।
गोसाईं जी पंजीरी के सामने बैठ गए।
भक्त और भगवान के बीच मैंने क्या कर डाला, भक्ति बंधन को ठेस पहुंचा कर मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला, माई, मुझे क्षमा कर दो।
पंजीरी बोली.. गुसाई जी, देखी तुमने लाला की चतुराई, अपना पीतांबर मेरी कुटिया मे जानबूझकर छोड़ दिया और मेरी फटी-चिथड़ी ओढ़नी उठा लाये।
भक्तों के सम्मान की रक्षा करना तो इनकी पुरानी आदत है।
ठाकुरजी धीरे-धीरे मुस्कुरा रहे थे, अरे मैया तू क्या जाने कि तेरे प्रेम से भरी ओढ़नी ओड़ने में जो सुख है वो पीतांबर में कहाँ।

Tuesday, May 5, 2026

बाँसुरी की जादुई पुकार

 जब हीरों का हार छोड़कर चोर ने माँगा कृष्ण के चरणों का एक साधारण मोरपंख।"
"यह कहानी भक्त और भगवान के अटूट भाव पर आधारित है।"

लखन नाम का एक शातिर चोर था, जिसके मन में न तो ईश्वर के लिए कोई स्थान था और न ही इंसानियत के लिए। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी चोरी और हेरा-फेरी में गुज़ार दी थी। एक शाम उसे खबर मिली कि पास के गाँव के पुराने राधा-कृष्ण मंदिर में ठाकुर जी को बहुत कीमती और प्राचीन गहने पहनाए गए हैं।
लखन ने मन ही मन तय कर लिया कि आज की यह चोरी उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और आख़िरी चोरी होगी, जिससे वह अपनी आगे की ज़िंदगी ऐशो-आराम से बिताएगा।
आधी रात को जब पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था, लखन मंदिर की दीवार फाँदकर भीतर घुस गया। मंदिर के गर्भगृह में घना अँधेरा था और बस एक छोटा सा दीया टिमटिमा रहा था। जैसे ही वह प्रतिमा के करीब पहुँचा, उसे अचानक हवाओं में एक बहुत ही मधुर बाँसुरी की धुन सुनाई देने लगी।
वह चौंक गया क्योंकि मंदिर में उसके सिवा और कोई नहीं था। उसने अपनी आँखें मलीं और देखा कि राधा-कृष्ण की प्रतिमा से एक हल्की और अलौकिक नीली रोशनी निकल रही है।
लखन ने अपने डर को दबाया और प्रतिमा के गले से हीरों का हार उतारने के लिए हाथ बढ़ाया। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र श्री कृष्ण की मंद-मंद मुस्कुराती मूरत पर पड़ी, उसके हाथ जैसे पत्थर के हो गए। उसे लगा कि वे पत्थर की आँखें उसे देख रही हैं और पूछ रही हैं— "लखन, क्या तू सच में यही लेने आया है?" 
उस मुस्कान में इतनी करुणा और ऐसा खिंचाव था कि लखन की हिम्मत जवाब दे गई। उसके हाथ से औज़ार गिर पड़े और वह वहीं घुटनों के बल बैठ गया।
उस अँधेरे मंदिर में लखन को अपने जीवन का एक-एक पाप किसी फिल्म की तरह याद आने लगा। उसे याद आया कि कैसे उसने गरीबों को सताया लोगों की मेहनत की कमाई लूटी। पहली बार उसे अपने कृत्यों पर शर्म महसूस हुई। वह फफक-फफक कर रोने लगा और प्रतिमा के चरणों में सिर रखकर माफी माँगने लगा।
वह कहने लगा— "प्रभु, मैं तो आपको लूटने आया था, पर आपने तो मेरी आत्मा ही बदल दी"। पूरी रात वह उसी संगीत और उस दिव्य रोशनी के घेरे में रोता रहा।
सुबह जब मंदिर के पुजारी जी ने पट खोले, तो उन्होंने देखा कि एक आदमी ठाकुर जी के चरणों में सिर रखकर सोया हुआ है। उसके पास चोरी के औज़ार पड़े थे, लेकिन उसके हाथ में कोई गहना नहीं, बल्कि एक मुरझाया हुआ मोरपंख था जो शायद रात में प्रतिमा से उसके ऊपर गिर गया था।
पुजारी ने जब उसे जगाया, तो लखन की आँखों में वो शातिरपन नहीं, बल्कि एक असीम शांति थी। वह अब चोर नहीं, बल्कि एक 'भगत' बन चुका था। उस दिन के बाद लखन ने मंदिर की सेवा में अपना जीवन लगा दिया।

सीख : परमात्मा की शरण में जाने के लिए पहले से पवित्र होना ज़रूरी नहीं है। उनकी एक नज़र ही सबसे बड़े अपराधी को भी पवित्र करने की शक्ति रखती है। ईश्वर को केवल भाव चाहिए, चाहे वह पश्चाताप के आँसुओं में ही क्यों न हो। 

Saturday, May 2, 2026

सुखी-दुखी संसार

एक नगर में एक शीशमहल था। महल की हरेक दीवार पर सैकड़ों शीशे जडे़ हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल में घुस गया। महल के भीतर उसे सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो नाराज और दुखी लग रहे थे। उन्हें देखकर वह उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डरकर वहां से भाग गया। कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती।कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीशमहल पहुंचा। वह खुशमिजाज और जिंदादिल था। महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए।उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना। वहां फिर से आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।
शिक्षा:-
संसार एक ऐसा शीशमहल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं।जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता।