महामंत्र > हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे|हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे||

Monday, August 3, 2026

बिहारी भैया जी

जब दुनिया ने साथ छोड़ा तब बिहारी जी ‘भैया’ बनकर साथ खड़े हो गए !!
नथिया बाई माता-पिता की लाड़ली,भाग्य की परीक्षा की धधकती अग्नि में तपने वाली एक साध्वी आत्मा। विवाह के कुछ ही समय बाद सुहाग छिन गया और घाव भरा भी नहीं था कि इकलौता भाई भी चला गया। जहाँ कोई भी स्त्री टूट जाती वहाँ नथिया बाई ने आँसुओं को हार नहीं, भक्ति का अभिषेक बना दिया। उनकी दुनिया सिमट गई संतों की सेवा, ठाकुर जी की भक्ति और राधे-राधे का जाप। लेकिन परीक्षा यहीं खत्म नहीं हुई चचेरे भाई ने संत सेवा पर रोक लगा दी। ये रोक उनके लिए सांस रुकने जैसी थी।
तब वो रोती हुई पहुँचीं बिहारी जी के चरणों में हे सांवरिया! अगर मेरी सेवा सच्ची है तो रास्ता तुम दिखाओ।,तुम्हारे बिना मेरा कोई नहीं! और सच में पुकार सुन ली गई।
मोह-माया की जंजीरें टूटीं, और नथिया बाई चल पड़ीं वृंदावन की ओर। ना धन, ना सहारा बस भरोसा मेरे बिहारी मेरे साथ हैं।जंगल और शहर की सीमा पर उन्होंने दीन-दुखियों और संतों की सेवा शुरू कर दी। वो सेवा नहीं करती थीं वो प्रेम लुटाती थीं।
फिर आया रक्षाबंधन भाई की कमी ने हृदय भिगो दिया। सीधे बाँके बिहारी के दरबार पहुँचीं और राखी बाँध दी जगत के स्वामी को! उस दिन से बिहारी जी सिर्फ आराध्य नहीं उनके “भैया” बन गए।
कहते हैं जब भक्त पूरी तरह प्रभु पर निर्भर हो जाता है तब उसकी चिंता खुद नारायण करते हैं। एक दिन संतों को खिलाने के लिए घर में एक दाना भी न बचा आँखें भर आईं आज संत भूखे रहेंगे तभी एक अनजान सेठ आया, गेहूं देकर बोला, इसे पिसवा देना।नथिया बाई ने चक्की घुमाई राधे-राधे जपते हुए और फिर जो हुआ, उसने इतिहास लिख दिया:
चक्की से आटे के साथ सोने के कण झड़ने लगे! ये चमत्कार नहीं बिहारी जी की मुहर थी। मेरे भक्त के भंडारे कभी खाली नहीं रहेंगे। नथिया बाई की भक्ति ऐसी थी कि वो प्रभु से बातें करती थीं, उन्हें दुलारती थीं।और सांवरिया भी कई बार साक्षात् दर्शन देते थे। आज भी वृंदावन के टटीया स्थान पर उनकी स्मृति जीवंत है। वहाँ की संत सेवा हमें याद दिलाती है सच्ची श्रद्धा पत्थर से भी सोना निकाल सकती है। भगवान मूर्ति में ही नहीं, सेवा करते हर हाथ में बसते हैं।
नथिया बाई की कथा एक संदेश है- जब संसार साथ छोड़ दे तो डरना मत क्योंकि उसी मोड़ पर बिहारी जी खुद भैया” बनकर हाथ थाम लेते हैं।

माता अनुसूया

क्या आपने कभी सुना है कि एक साधारण ऋषि-पत्नी ने स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश को शिशु बना दिया था? यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि सनातन परंपरा में वर्णित माता अनुसूया की अद्भुत कथा है। एक ऐसी कथा, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची भक्ति, निष्काम सेवा और अटूट पतिव्रत के सामने स्वयं त्रिदेव भी नतमस्तक हो जाते हैं।
एक समय स्वर्गलोक में एक चर्चा उठी। प्रश्न था कि तीनों लोकों में सबसे महान पतिव्रता नारी कौन है? देवताओं, ऋषियों और सिद्धों के बीच अनेक नाम लिए गए, लेकिन अंत में जब निर्णय देने का समय आया तो स्वयं ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव ने एक ही नाम लिया—माता अनुसूया। उन्होंने कहा कि संसार में यदि कोई स्त्री अपने पतिव्रत, तप, सेवा, करुणा और निष्काम प्रेम के कारण सबसे श्रेष्ठ है, तो वह महर्षि अत्रि की पत्नी माता अनुसूया हैं। यह सुनते ही स्वर्ग का वातावरण बदल गया। माता सरस्वती, माता लक्ष्मी और माता पार्वती के मन में आश्चर्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने सोचा कि आखिर ऐसी कौन-सी विशेषता है जो माता अनुसूया को सबसे महान बनाती है। धीरे-धीरे यह आश्चर्य एक जिज्ञासा में और जिज्ञासा एक परीक्षा की इच्छा में बदल गया।
देवियों ने त्रिदेवों से आग्रह किया कि यदि माता अनुसूया वास्तव में इतनी महान हैं, तो उनकी परीक्षा अवश्य ली जानी चाहिए। पहले तो त्रिदेव इस बात के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने कहा कि सच्चे भक्त की परीक्षा लेना उचित नहीं होता। लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि अंततः उन्होंने माता अनुसूया की भक्ति और पतिव्रत की परीक्षा लेने का निश्चय किया। तीनों ने अपने दिव्य स्वरूप को त्यागकर साधुओं का वेश धारण किया और पृथ्वी पर महर्षि अत्रि के आश्रम की ओर चल पड़े।
उस समय महर्षि अत्रि किसी कार्य से आश्रम से बाहर गए हुए थे। आश्रम में केवल माता अनुसूया थीं। उनका जीवन अत्यंत सरल था। हर प्राणी की सेवा करना, अतिथियों का सत्कार करना, तप और भगवान का स्मरण करना ही उनका दैनिक नियम था। जब तीनों साधु आश्रम पहुंचे तो माता अनुसूया ने उनका अत्यंत आदरपूर्वक स्वागत किया। उन्होंने उनके चरण धोए, आसन दिया और विनम्रता से कहा, "महात्माओं, कृपया भोजन ग्रहण कीजिए। अतिथि मेरे लिए देवतुल्य हैं।"
तीनों साधुओं ने एक-दूसरे की ओर देखा और बोले, "हम भोजन अवश्य करेंगे, लेकिन हमारी एक शर्त है। तुम्हें निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देनी होगी।" यह सुनते ही माता अनुसूया क्षणभर के लिए मौन हो गईं। उनके सामने एक भयंकर धर्मसंकट खड़ा हो गया। एक ओर अतिथि धर्म था, जिसे निभाना उनका कर्तव्य था। दूसरी ओर पतिव्रत धर्म था, जिसकी रक्षा उनके जीवन का सबसे बड़ा व्रत था। सामान्य बुद्धि से इस संकट का कोई समाधान संभव नहीं था।
लेकिन माता अनुसूया विचलित नहीं हुईं। उन्होंने आंखें बंद कीं, अपने पति महर्षि अत्रि का स्मरण किया और मन ही मन भगवान से प्रार्थना की—"यदि मेरा पतिव्रत निष्कलंक है, यदि मैंने कभी अपने धर्म से विचलित होकर कोई कार्य नहीं किया, तो सत्य स्वयं मेरी रक्षा करे।" जैसे ही उन्होंने अपने कमंडलु का पवित्र जल तीनों साधुओं पर छिड़का, उसी क्षण एक अद्भुत चमत्कार हुआ। देखते ही देखते तीनों साधु छह महीने के छोटे-छोटे शिशु बन गए। उनके तेजस्वी शरीर अब मासूम बालकों के रूप में बदल चुके थे।
माता अनुसूया के हृदय में मातृत्व उमड़ पड़ा। उन्होंने उन तीनों शिशुओं को अपनी गोद में उठा लिया। उन्हें प्रेमपूर्वक भोजन कराया, झूले में सुलाया और अपने ही पुत्रों की तरह उनका पालन करने लगीं। पृथ्वी पर माता अनुसूया ने अपना धर्म निभा दिया, लेकिन उसी समय स्वर्गलोक में चिंता फैल गई। ब्रह्मा, विष्णु और महेश अपने-अपने लोकों में दिखाई नहीं दे रहे थे। देवताओं में हड़कंप मच गया। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि सृष्टि के तीनों आधार अचानक कहां लुप्त हो गए।
इसी बीच देवर्षि नारद वहां पहुंचे। उन्होंने ध्यान लगाकर सारी घटना देखी और देवताओं के साथ तीनों देवियों को बताया कि त्रिदेव किसी युद्ध में नहीं हारे, बल्कि माता अनुसूया के निष्कलंक पतिव्रत और तप की शक्ति से शिशु बन गए हैं। यह सुनते ही माता लक्ष्मी, माता पार्वती और माता सरस्वती को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने अहंकारवश एक महान साध्वी की परीक्षा लेने का प्रयास किया था।
तीनों देवियां तुरंत पृथ्वी पर माता अनुसूया के आश्रम पहुंचीं। वहां उन्होंने तीनों दिव्य शिशुओं को माता अनुसूया की गोद में खेलते देखा। लेकिन वे यह पहचान ही नहीं सकीं कि उनमें ब्रह्मा कौन हैं, विष्णु कौन हैं और शिव कौन हैं। तीनों के चेहरे पर समान तेज था। यह देखकर उनका अहंकार पूरी तरह समाप्त हो गया। वे माता अनुसूया के चरणों में गिर पड़ीं और विनम्र स्वर में बोलीं, "माता, हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई। कृपया हमें क्षमा कर दीजिए और हमारे पतियों को उनका वास्तविक स्वरूप लौटा दीजिए।"
माता अनुसूया के हृदय में किसी के प्रति राग या द्वेष नहीं था। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "जहां सच्चा पश्चाताप हो, वहां क्षमा देने में कभी देर नहीं करनी चाहिए।" उन्होंने पुनः अपने तप का संकल्प किया और दिव्य प्रार्थना की। अगले ही क्षण वे तीनों शिशु अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गए। ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वयं माता अनुसूया के सामने हाथ जोड़कर खड़े थे। त्रिदेव बोले, "माता, आज आपने सिद्ध कर दिया कि सच्ची भक्ति, निष्काम सेवा और पतिव्रत की शक्ति के सामने स्वयं देवता भी नतमस्तक हो जाते हैं।"
त्रिदेव माता अनुसूया से अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, "माता, कोई वरदान मांगिए।" माता अनुसूया ने विनम्र स्वर में उत्तर दिया, "प्रभुओं, मुझे किसी धन, वैभव, राज्य या शक्ति की इच्छा नहीं है। आपके दर्शन ही मेरे लिए सबसे बड़ा वरदान हैं।" माता की निष्काम भावना देखकर त्रिदेव और भी अधिक प्रसन्न हो गए। उन्होंने कहा, "तुमने कुछ नहीं मांगा, इसलिए हम स्वयं तुम्हें सबसे महान वरदान देते हैं। हम अपने-अपने दिव्य अंश से तुम्हारे पुत्र रूप में अवतार लेंगे।"
भगवान विष्णु के अंश से भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ, जो योग, ज्ञान और करुणा के प्रतीक बने। भगवान शिव के अंश से महर्षि दुर्वासा प्रकट हुए, जिनका तप और सत्य के प्रति संकल्प अद्वितीय था। ब्रह्मा के अंश से चंद्रदेव का अवतार हुआ, जो शीतलता, संतुलन और सौम्यता के प्रतीक बने। उसी समय महर्षि अत्रि भी आश्रम लौट आए। उन्होंने स्वयं त्रिदेवों के दर्शन किए और समझ गए कि आज उनके आश्रम में कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि युगों तक स्मरण की जाने वाली दिव्य लीला घटित हुई है।
त्रिदेवों ने महर्षि अत्रि और माता अनुसूया को आशीर्वाद देते हुए कहा, "जब तक इस सृष्टि में धर्म, सत्य और भक्ति का प्रकाश रहेगा, तब तक तुम्हारा यश अमर रहेगा। लोग तुम्हारा स्मरण श्रद्धा, पतिव्रत और निष्काम सेवा के सर्वोच्च आदर्श के रूप में करेंगे।" उस दिन देवियों ने भी यह स्वीकार किया कि महानता सौंदर्य, वैभव या शक्ति से नहीं, बल्कि विनम्रता, सेवा, प्रेम और निष्कलंक चरित्र से प्राप्त होती है।

गजासुर

श्री गणेश को गजासुर का ही शीश क्यों लगा? जानिए यह अद्भुत पौराणिक कथा! 
गज (हाथी) और असुर के संयोग से जन्मे 'गजासुर' भगवान शिव के परम भक्त थे। महादेव की आराधना के बिना वे अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। उनकी इसी अनन्य भक्ति ने उन्हें वह अकल्पनीय सम्मान दिलाया, जिसे आज पूरी दुनिया पूजती है।
महादेव का अनोखा वरदान
गजासुर की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे मनचाहा वरदान मांगने को कहा। गजासुर ने कहा, "प्रभु! आप कैलाश छोड़कर मेरे उदर (पेट) में ही निवास करें।" भोले भंडारी तो ठहरे भक्तों के अधीन, वे तुरंत गजासुर के पेट में समा गए। जब माता पार्वती को शिवजी कहीं नहीं मिले, तो उन्होंने भगवान विष्णु से सहायता मांगी।
श्रीहरि की अद्भुत लीला
श्रीहरि ने शिवजी को मुक्त कराने के लिए एक लीला रची। वे एक चरवाहे का भेष धारण कर मनमोहक बांसुरी बजाने लगे और उनके साथ सजे-धजे नंदी ने गजासुर के सामने अद्भुत नृत्य किया। गजासुर इस कला से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने अपनी सुध-बुध खोकर चरवाहे (विष्णु जी) को मुँहमांगा वरदान देने का वचन दे दिया। श्रीहरि ने तुरंत शिवजी को उसके उदर से मुक्त करने का वरदान मांग लिया।
 गजासुर की अंतिम इच्छा
गजासुर अपने वचन से पीछे नहीं हटा। वह समझ गया कि ये स्वयं नारायण हैं। उसने शिवजी को मुक्त किया और एक भावुक मांग रखी— "प्रभु! मेरे शरीर से आपके जाने के बाद जीवन का कोई मोल नहीं रहा। मुझे ऐसा वरदान दें कि मेरे शरीर का कोई अंश हमेशा आपके साथ पूजित हो।"
तब श्रीहरि ने उसे आशीर्वाद दिया कि समय आने पर उसे अकल्पनीय सम्मान मिलेगा।
प्रथम आराध्य बनने का सौभाग्य
कालान्तर में, जब भगवान गणेश का शीश धड़ से अलग हुआ, तब भगवान विष्णु इसी शिवभक्त गजासुर का शीश काटकर लाए थे और उसे गणपति के धड़ से जोड़ दिया था। इस तरह अपनी निस्वार्थ भक्ति के कारण गजासुर, शिवजी के प्रिय पुत्र के रूप में संसार में प्रथम आराध्य हो गए! 

Sunday, August 2, 2026

दयालु और बड़ा दिल

एक बार भगवान श्री हरि विष्णु जी शेषनाग पर बैठे बोर हो गये और उन्होने धरती पर घूमने का विचार मन मे किया, वेसे भी कई साल बीत गये थे धरती पर आये, अतः वह अपनी यात्रा की तैयारी मे लग गये।
   स्वामी को तैयार होता देख कर लक्ष्मी मां ने पुछा आज सुबह सुबह कहा जाने कि तैयारी हो रही है?
    विष्णु जी ने कहा हे लक्ष्मी मै धरती लोक पर घुमने जा रहा हूं, तो कुछ सोच कर लक्ष्मी मां ने कहा ! हे देव क्या मै भी आप के साथ चल सकती हूं?
    भगवान विष्णु ने दो पल सोचा फ़िर कहा एक शर्त पर, तुम मेरे साथ चल सकती हो तुम धरती पर पहुँच कर उत्तर दिशा की ओर बिलकुल मत देखना। इस के साथ ही माता लक्ष्मी ने हां कह के अपनी बात मनवाली। 
ओर सुबह सुबह माँ लक्ष्मी ओर भगवान विष्णु धरती पर पहुँच गये।
अभी सुर्य देवता निकल रहे थे, रात बरसात हो कर हटी थी, चारो ओर हरियाली ही हरियाली थी, उस समय चारो ओर बहुत शान्ति थी ओर धरती बहुत ही सुन्दर दिख रही थी, माँ लक्ष्मी मन्त्र मुग्ध हो कर धरती को देख रही थी, भूल गई कि पति को क्या वचन दे कर आई है? चारो ओर देखती हुयी कब उत्तर दिशा की ओर देखने लगी पता ही नही चला।
उत्तर दिशा में माँ लक्ष्मी को एक बहुत ही सुन्दर बगीचा नजर आया, वँहा से भीनी भीनी सुगन्ध आ रही थी, बहुत ही सुन्दर सुन्दर फूल खिले थे, यह एक फूलों का बगीचा था, माँ लक्ष्मी बिना सोचे समझे उस बगीचे मे गई ओर एक सुंदर सा फूल तोड लाई, किन्तु यह क्या जब माँ लक्ष्मी भगवान विष्णु के पास वापिस आई तो भगवान विष्णु की आंखो मै आंसु थे।
भगवान विष्णु ने माँ लक्ष्मी को कहा कि कभी भी किसी से बिना पुछे उसका कुछ भी नही लेना चाहिये, साथ ही अपना वचन भी याद दिलाया।
माँ लक्ष्मी को अपनी भूल का पता चला तो उन्होने भगवान विष्णु से इस भूल की क्षमा मागी, तब भगवान विष्णु ने कहा कि तुमने जो भूल की है उस का दंड तो तुम्हे अवश्य मिलेगा?
    जिस माली के बगीचे से तुमने बिना पुछे फ़ुल तोडा है, यह एक प्रकार की चोरी है, इसलिये अब तुम तीन साल तक माली के घर नौकरानी बन कर रहॊ, उस के बाद मै तुम्हे बैकुण्ठ मे वापीस बुलाऊंगा, माँ लक्ष्मी ने चुपचाप सर झुका कर हाँ कर दी (आज कल की लक्ष्मी थोडे थी?)
माँ लक्ष्मी एक दीन हीन निर्धन औरत का रुप धारण करके, बगीचे के स्वामी के घर गई, घर क्या एक झोपड़ी थी, स्वामी का नाम माधव था, माधब की पत्नी, दो बेटे ओर तीन बेटियाँ थी , सभी उस बगीचे मै काम करके किसी तरह से गुजारा करते थे,
  माँ लक्ष्मी जब एक साधारण और दीन हीन औरत बन कर माधव के झोपड़ी पर गई तो माधव ने पूछा बहिन तुम कोन हो? इस समय तुम्हे क्या चाहिये? तब मां लक्ष्मी ने कहा, मै एक असहाय औरत हू मेरी देख भाल करने वाला कोई नही, मैने कई दिनो से भोजन भी नही किया मुझे कोई भी काम दे दॊ, साथ में तुम्हारे घर का काम भी कर दिया करुगीं , बस मुझे अपने घर में एक कोने में आसरा देदो।
माधव बहुत ही दयालु था, उसे दया आ गई, लेकिन उस ने कहा, बहिन मै तो बहुत ही गरीब हुँ, मेरी कमाई से मेरे घर का खर्च मुस्किल से चलता है, लेकिन अगर मेरी तीन की जगह चार बेटियाँ होती तो भी मेने गुजारा करना था, अगर तुम मेरी बेटी बन कर जेसा रुखा सुखा हम खाते है उस मै खुश रह सकती हो तो बेटी अन्दर आ जाओ।
माधाव ने माँ लक्ष्मी को अपने झोपडे में शरण दे दी, और माँ लक्ष्मी तीन साल तक उस माधव के घर पर नोकरानी बन कर रही।
जिस दिन माँ लक्ष्मी माधव के घर आई थी उस से दुसरे दिन ही माधाव को फूलो से इतनी आमदनी हुयी की शाम को एक गाय खरीद ली, फ़िर धीरे धीरे माधव ने काफ़ी जमीन खरीद ली, और सब ने अच्छे अच्छे कपड़े भी बनवा लिये, और फ़िर एक बड़ा पक्का घर भी बनवा लिया, बेटियों और पत्नी ने गहने भी बनवा लिये, और अब मकान भी बहुत बड़ा बनवा लिया था।
माधव सदैव सोचता था कि मुझे यह सब इस महिला के आने के बाद मिला है, इस बेटी के रुप मे मेरी किस्मत आ गई है और अब 2-3 साल बीत गये थे, लेकिन मां लक्ष्मी अब भी घर मै और बगीचे में काम करती थी, एक दिन माधव जब अपने बगीचे से काम खत्म करके घर आया तो उस ने अपने घर के सामने द्वार पर एक देवी स्वरुप गहनों से लदी एक औरत को देखा, ध्यान से देख कर पहचान गया।
 अरे यह तो मेरी मुहँ बोली चौथी बेटी यानि वही औरत है, पहचान गया कि यह तो माँ लक्ष्मी है।
अब तक माधव का पूरा परिवार बाहर आ गया था, सब हैरान हो कर माँ लक्ष्मी को देख रहे थे, माधव बोला है मां हमे क्षमा कर दो, हम ने आप से अंजाने मे ही घर और बगीचे मे काम करवाया है, माँ यह कैसा अपराध हो गया है, माँ हम सब को क्षण कर दो।
अब माँ लक्ष्मी मुस्कुराई और बोली, हे माधव तुम बहुत ही अच्छे और दयालु व्यक्त्ति हो, तुम ने मुझे अपनी बेटी की तरह से रखा, अपने परिवार के सदस्य की तरह से, इस के बदले मै तुम्हे वरदान देती हूं कि तुम्हारे पास कभी भी खुशियो की और धन की कमी नही रहेगी, तुम्हे सारे सुख मिलेगे जिस के तुम हकदार हो।
यह सब बोल कर माँ अपने स्वामी के द्वारा भेजे रथ मे बैठ कर बैकुण्ठ चली गई।

इस कहानी मे माँ लक्ष्मी का संदेश है कि जो लोग दयालु और बड़े दिल के होते है मै वही निवास करती हूं, अतः हमे सभी की मदद करनी चाहिये, और गरीब से गरीब को भी तुच्छ नही समझना चाहिये।

शिक्षा - एक छोटी सी भूल पर भगवान ने माँ लक्ष्मी को दंड दिया हम तो बहुत ही तुच्छ है, फ़िर भी भगवान हमे अपनी कृपा मे रखता है, हमे भी हर जीव के प्रति दयालुता दिखानी और बरतनी चाहिये और यह दुःख सुख हमारे ही कर्मो का फ़ल है।

Saturday, August 1, 2026

नारी-चाला

एक था राजा । राजा की हजामत बनाने जो नाई आता था, उसकी | पत्नी नैण अपूर्व सुंदरी थी। एक बार वजीर ने नाइन को देखा तो वह देखता ही रह गया। नाई की अनुपस्थिति में उसने राजा से कहा, "हे प्रभु! स्त्रियाँ तो बहुत देखी हैं, लेकिन 'नैण' पर तो आँख टिकाए नहीं टिकती। उसे तो आपकी सेज पर होना चाहिए।" राजा तो स्वभाव से ही सामंत - वृत्ति का था । श्रवण मात्र से ही वह नारी के रूप- वैभव पर मुग्ध हो गया तथा नैण को प्राप्त करने के लिए उसकी लार टपकने लगी। वजीर ने उसे परामर्श दिया, "महाराज! नाई को कहीं बाहर भिजवा सकें तो उसकी अनुपस्थिति में नैण को फुसलाया जा सकता है।"
राजा ने नाई को बुलाकर कहा, "मुझे 'स्त्री-चाला' की जरूरत है। जहाँ कहीं से ही संभव हो, जाकर तुरंत ले आओ। तुम्हारी क्षमता तथा वफादारी पर मुझे पूरा भरोसा है।"
नाई बेचारा सीधा-सादा। वह सोच में पड़ गया। उसे तो 'स्त्री चाला' नाम की बला का भी नहीं पता था। वह उदास सा घर पहुँचा। बिना खाए-पिए खाट पर लेट गया। उसकी पत्नी ने पूछा, “इतने घबराए हुए क्यों हो?"
नाई ने रोनी सी सूरत बनाकर कहा, "राजा ने मुझे स्त्री चाला लाने का आदेश दिया है। पर मैं उसके बारे में कुछ भी नहीं जानता, व्यर्थ की मुसीबत गले पड़ गई।"
नैण ने विश्वस्त स्वर में कहा, “तुम तो व्यर्थ में स्त्री-चाला की चिंता कर रहे हो । जाओ, राजा से कहो- मैं स्त्री चाला तो ले आऊँगा, लेकिन पहले मुझे चार करोड़ रुपए दे दो।"
नाई राजा के पास गया और चार करोड़ रुपए ले आया ।
नाइन ने रुपए लिये तथा सँभालकर रख दिए। उसने अपने पति को छिपा दिया। दिन छिपने के बाद नैण सज-सँवरकर गाँव में घूमने लगी। रास्ते में उसे चौकीदार मिला। वह बड़ी आत्मीयता से बोला, "प्रिये, तुम कहाँ जा रही हो?"
नैण बोली, "मेरा पति राजा के लिए 'स्त्री चाला' लेने बाहर गया है। घर में मैं अकेली हूँ और ऊपर से अँधियारी रात, सो मैं परिचितों के घर जा रही हूँ ।"
चौकीदार ने कहा, " घर अपना ही अच्छा होता है। रात को मैं ही तुम्हारे घर आ जाऊँगा । पहरेदार को छोड़, क्यों तुम अन्यत्र जाती हो। " नैण ने 'अच्छा' कहा और आगे चल दी।
फिर उसे गाँव का नंबरदार मिला। नैण की महक से उसका भी शरीर पिघलने लगा। उसने कहा, "तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं । अँधेरा घना होते ही मैं तुम्हारे घर आ जाऊँगा।"
चौकीदार, नंबरदार के बाद नैण को वजीर, राजा तथा राजऋषि मिले, उन्होंने भी रात होते ही उसके घर पहुँचने की बात कही। नैण 'हाँ-हाँ' करती मन-ही-मन मुसकराती अपने घर लौट आई।
घर पहुँचते ही उसने चूल्हा जलाया तथा उसमें दो लकड़ियाँ लगा दीं और पतीला चढ़ा दिया।
सबसे पहले गुनगुनाता हुआ चौकीदार आया। वह अभी नैण को छूने की कल्पना ही कर रहा था कि नंबरदार ने आवाज लगा दी। चौकीदार ने डरकर कहा, "ओ नैणी, मुझे बचाओ।" नैण ने उसे उल्टी घघरी पहनाकर दाल पीसने बिठा दिया।
नंबरदार के बाद वजीर आया तो नंबरदार ने कहा, "ओ नैणी, मुझे बचा! मेरी तो इज्जत खतरे में है ।" नैण ने उसका दिउट बनाया तथा उसके ऊपर लैंप रख दिया। इसी प्रकार अभी वजीर अंदर आया ही था कि राजा आ गया। वजीर के अनुनय-विनय करने पर नैण ने उसका मुँह मिट्टी से लीप दिया तथा उसे अलमारी में बिठा दिया। अभी राजा नैण से प्रेम भरी बातें करने ही लगा था कि बाहर से राजऋषि की आवाज आ गई। राजा गिड़गिड़ाया, "नैणी, मेरी साख खतरे में है, नारी की माया अपरंपार है। तू ही मुझे बचा सकती है।"
नैण बोली, "महाराज, चिंता मत करो, मैं तो आपकी बाँदी हूँ। आपको अपना देवता बनाकर अलमारी में बिठाती हूँ। फिर कोई नहीं पहचान पाएगा।" उसने राजा के मुँह पर भी मिट्टी पोत दी तथा उसे अलमारी में बिठा दिया।
अंत में राजऋषि का आगमन हुआ। उसने अलमारी में बैठे लोगों को देख लिया और पूछा, "ये कौन लोग हैं, कन्या ?"
"महाराज! ये सभी मेरे देवता लोग हैं।" नैण बोली ।
उसके इतना कहते ही सबको एक-दूसरे की उपस्थिति का एहसास हो गया तथा लज्जित होकर वे आगे-पीछे भाग निकले। राजऋषि भी खिसियानी बिल्ली सा उनके पीछे भाग लिया।
सबके भाग जाने पर नैणी अपने पति के पास आई। बड़े प्यार से उसे दुलारते हुए नैणी ने भोजन परोसा और कहा, "देखा, तुम्हारे ये हितैषी किस प्रकार मेरी देह नोचने के लिए लार टपका रहे थे। लेकिन 'स्त्री चाले' के सामने इनकी क्या बिसात? यदि अब राजा तुमसे पूछे कि 'स्त्री चाला' कहाँ है, तो कहना मेरी पत्नी ने तुम्हारे मुँह पर मिट्टी तो लीप दी, 'स्त्री चाला' और क्या होता है ?"
नैण की चतुराई पर नाई गद्गद हो उठा।

तुलसी दया ना छोड़िए जब तक घट में प्राण

हम बचपन से पढ़ते और सुनते आ रहे हैं ‍‍कि "दया धर्म का मूल है" सभी धर्मग्रंथों में दया पर ही अधिक जोर क्यों दिया गया है ? अगर हम दया नहीं कर सकते हैं तो हमारा यह मानव जीवन निरर्थक है, यह तो उसी प्रकार की बात हुई कि जन्म लिया, खाये-पिये, बड़े हुये, विवाह-शादी हुयीं, वंशवृद्धि कर परिवार को आगे बढ़ाया और कालांतर में जीवन यात्रा पूरी कर पहुंच गये अगली योनियों में।
ऐसा जीवन तो पशु-पक्षी भी जीते हैं, तो फिर हम इंसानों व पशु-पक्षियों में क्या अंतर रह जाता है ? छोटे बच्चे, भूखे बीमार, बिलखते बच्चे, बुजुर्ग असहाय वृद्ध-वृद्धा यह फेहरिस्त काफी लंबी है।
हे मनुष्य आत्माओं, तुम इन पर दया करो, तुम्हें भगवान् मिलेंगे, आपको ईश्वर की प्राप्ति के लिए दयालु बनना होगा। मन में दयाभाव व इंसानों के प्रति करुणा, विनम्रता व सहनशील रखना यह वाक्य हम सभी ने कई बार पढ़ा होगा।
सड़क से गुजरते हुये या काम पर जाते समय कोई बीमार या बुजुर्ग व्यक्ति इस तरह की लिफ्ट मांगते हैं और लोग हैं कि इनको नजरअंदाज कर निकल जाते हैं, यह बात विडंबना की ही कही जायेगी, अरे भाई, किसी बीमार या जरूरतमन्द व्यक्ति को अगर हम जाते हुये अपने वाहन पर बिठाकर उसके मुकाम या उसके नजदीकी ठिकाने तक ही छोड़ दें तो हमको उसकी जो दुआयें मिलेंगी, उसी दुआओं से हमारा मानव जीवन सार्थक हो जायेगा।
हमें अपार खुशी तो मिलेगी ही इस बात की कि आज मैंने अपनी जिंदगी में एक अच्‍छा काम किया, देखियेगा कि हमको ईश्वर-प्राप्ति की गर चाह है तो हमको अपने आचरण को थोड़ा-सा ही सही, लेकिन सुधारना जरूर होगा, ठीक है हमारे पास समय नहीं है तो आज के मोबाइल, ई-मेल व इंटरनेट के जमाने में भी हम दया को अर्पित कर सकते हैं, वो भी घर बैठे ही, वो कैसे ? 
ठीक है यदि हमारे पास अनाथालय, वृद्धाश्रम, महिला श्राविका आश्रम, महिला उद्धार गृह, कुष्ठ उद्धार गृह आदि जगहों पर जाने का समय नहीं है तो हम इन आश्रमों के फोन, मोबाइल या सोशल नेटवर्किंग पर संपर्क कर अपनी दान राशि भेंट कर सकते हैं। इन आश्रमों के कर्मचारी हमारे घर आकर दान राशि ले जायेंगे तथा हम पुण्य के भागी बन जायेंगे।
अगर हम किसी की एक छोटी-सी भी मदद करते हैं तो वह व्यक्ति कृतज्ञ भाव से हमारी ओर देखता है, तब हमको जो आत्मसंतोष मिलता है, उसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता है। कभी हम भूखे बच्चों को रोटी खिलाकर, फटेहाल व ठंड में ठिठुरते लोगों को वस्त्र पहनाकर, किसी सताई हुई नारी को यह दिलासा देते हुये कि बहन चिंता मत करो, हम आपके साथ है।
उसके सिर पर अगर हम हाथ रखेंगे तो भावुकतावश हमारी आँखों से भी इस बात को लेकर अश्रुधारा बह निकलेगी कि आज मैंने ज़िन्दगी में अच्‍छा काम किया है, जब ईश्वर के सामने हम अपने कर्मों का हिसाब-किताब देने हेतु खड़े होंगे तो बिलकुल निश्चिंत होंगे, क्योंकि हमारे मन में यह भाव लगा रहेगा कि मैंने अपनी जिंदगी में‍ किसी आत्मा को कभी कोई कष्ट नहीं पहुंचाया।
एक इंसान होने के नाते हर व्यक्ति को चाहिये कि वह कभी भी किसी को बुरा नहीं बोले और न ही कभी बुरा कर्म ही करें। अगर हम किसी को बुरा बोलते हैं तो उसके वायब्रेशन सारे वायुमंडल में फैल जाते हैं, यह अपने, सामने वाले के साथ ही वातावरण को भी प्रदूषित करते हैं। अत: सदैव मीठा बोलें, यही बात कर्म पर भी लागू होती है, हमारे कर्म जितने अच्छे होंगे, हम ईश्वर के उतने ही करीब होंगे।
ठीक है हमारे पास पैसे नहीं है, तो हम यह काम तो कर ही सकते हैं कि रास्ते में एक पत्थर पड़ा है, जो आते-जाते लोगों को लहूलुहान कर रहा है, कई लोग ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं, कई को गंभीर चोट लग भी सकती है या लगती भी है, तो हमें चाहिये कि वो पत्थर उस जगह से हटा कर एक तरफ रख दें। हमारे इस जरा-से कष्ट से कई लोगों को सुविधा हो जायेगी। अनजाने व खामोशी से किया गया यह कर्म हमको भी आत्मसंतुष्टि देगा व लोगों की दुआयें भी मिलेंगी।
कई चौराहों व रास्तों पर देखा गया है कि बच्चे, बुजुर्ग व महिलायें रास्ता पार करने हेतु ट्रैफिक रुकने का इंतजार कर रहे होते हैं किंतु ट्रैफिक है कि रुकने का ही नाम नहीं लेता। हम ऐसी स्थि‍ति में उनकी मदद के लिहाज से उनका हाथ पकड़कर रास्ता पार करा सकते हैं, यह भी बिना खर्च किये मुफ्त की एक अच्‍छी मानव-सेवा है।
मानव की सेवा माधव की सेवा के बराबर मानी गई है। हम चाहें चारों धाम की यात्रा करें लेकिन एक इंसान की सेवा अगर जरूरत के समय नहीं करते हैं तो चारों धाम की यात्रा का कोई फल मिलने वाला नहीं। खराब वचन और खराब कर्म करने के बाद भगवान् को जल, अर्घ्य व एक निस्वार्थ असहायों की सेवा करके हम अपने द्वारा किये गये पाप से बरी नहीं हो सकते।
क्योंकि कर्मों का फल तो हर व्यक्ति को भुगतना ही पड़ता है। इससे भगवान भी नहीं बच सके तो इंसान की क्या बिसात? अगर समाज से श्रेष्ठ कर्म यानी दया-भाव का खात्मा हो जाये तो यह बस्ती इंसानों की बस्ती न कहलाकर पशु-पक्षियों से भी गई-बीती बस्ती कहलायेगी। इंसान द्वारा इंसान से प्रेम किया जाना मनुष्यता की पहली पहचान है। इस प्रकार हम भी अधिक नहीं तो थोड़ी सी दया-भावना मन में रखकर पी‍ड़ित मानवता की सेवा कर इस उक्ति को सार्थक कर सकते हैं कि दया धर्म का मूल है।
सज्जनों, मानव सेवा माधव सेवा का जज्बा अपने आप में इतना कूट-कूट कर भर दो। अपने समाज में असहाय बच्चे, असहाय बीमार बुजुर्ग, या समाज की सताई हुई दुखियारी माँ-बहन, सबके प्रति मानव सेवा माधव सेवा' की भावना से कार्य करें। निश्चित रूप से हमको आत्मिय सुख की प्राप्ति होगी, बीमार, अपाहिज, विकलांग, भूखे, नेत्रहीन व कुष्ठ रोगी के प्रति जो करुणा व दया के भाव के साथ हम जीते हैं तो विश्वास करें कि हम भगवान् के निकट जा रहे हैं।
कई सज्जन लोगों में यह भावना कूट-कूट कर भरी हुई है,ऐसे संस्कारी लोगों ने कई असहायों को अपनाया है तथा उनकी सेवा कार्य जारी है,इस प्रकार हम दया-भाव रखकर पी‍ड़‍ित मानवता की सेवा कर सकते हैं तथा ईश्वर के काफी करीब पहुंच सकते हैं..!!

Saturday, May 9, 2026

आलसी-कछुवा

एक समय की बात है। एक बड़े तालाब के नजदीक एक कछुआ युवती निवास करती थी। उसके शरीर से बहुत बुरी गंध आती थी और उसका चेहरा भी बहुत बदसूरत था। वह बहुत मूर्ख भी थी। साथ ही वह उतनी ही आलसी और तमाम तरह की गंदी आदतों वाली थी। उसका नाम पाशांडी था।
वह जिस तालाब के नजदीक रहती थी उस तालाब का पानी बहुत साफ था। तारे और तमाम दूसरे ग्रह नक्षत्र इस निर्मल सरोवर के जल में अपनी परछाईं नित्य प्रति देखते रहते और उसकी सुंदरता पर मुग्ध रहते, जब सरोवर के जल में अनंत तारों का प्रकाश फैल जाता, टिमटिमाते तारे उसके निर्मल जल में अठखेलियाँ करते प्रतीत होते और वह सरोवर पृथ्वी पर आकाश का एक छोटा टुकड़ा सा प्रतीत होता। ऐसे समय में का पाशांडी को सरोवर में कूदकर नहाना, इधर से उधर तक अपने सिर को उठाए तैरना बहुत सुखकर प्रतीत होता। वह पानी में दूर तक तैरती और फिर वापस लौटती। तारों की परछाइयों के बीच आनंद से ओतप्रोत होकर उनसे विभिन्न प्रकार के खेल खेलती।
उस सरोवर में एक चमकीला तारा रोज अपनी परछाईं देखने आता और जल की निर्मलता में अपने रूप सौंदर्य को देखकर खुद अपने ऊपर मोहित सा रहता। उसका नाम निकुंज था। वह का पाशांडी को रोज जल में अठखेलियाँ करते हुए देखता। उसे आश्चर्य होता कि का पाशांडी उसकी परछाईं के साथ बहुत समय तक बड़े प्यार से खेलती रहती थी। वह आकाश में इतनी दूर था कि का पाशांडी की बदसूरती को नहीं देख सकता था और न ही उसे यह पता था कि वह कितनी आलसी और मूर्ख युवती है। उसे सिर्फ इतना ही पता था कि रात में वह बहुत खुलकर उसकी परछाईं के साथ बहुत प्यार से तमाम तरह के खेल खेलती है। यह देख कर उसे बहुत अच्छा लगता था। एक दिन उसने सोचा कि वह अगर उसकी परछाईं
पर इतनी मुग्ध है तो अगर वह वास्तव में उसे मिल जाए तो वह कितनी खुश होगी और उसे कितना अधिक प्रेम करेगी। यह सोच निकुंज मन-ही-मन का पाशांडी से प्रेम करने लगा। उसने निश्चय किया कि एक दिन वह उससे मिलने पृथ्वी पर अवश्य जाएगा और का पाशांडी से विवाह करेगा। जब उसके दोस्तों ने इस संबंध के बारे में सुना वे बुरी तरह परेशान हो गए। उन लोगों ने उसे समझाने की कोशिश की कि उसका निर्णय अत्यधिक खतरनाक है। किसी दूसरी भूमि पर जाना और वहाँ अपना घर बनाना तथा एक ऐसे व्यक्ति से संबंध स्थापित करना, जिसके बारे में वह कुछ नहीं जानता, किसी भी तरह उचित नहीं है। दूसरी भूमि के लोगों की आदतें और स्वभाव पूरी तरह अलग होते हैं, इसलिए उनके साथ सहज संबंध बनाना कतई आसान नहीं होता, परंतु निकुंज ने किसी की बात न मानी। सचमुच प्रेम में डूबे व्यक्ति को कुछ भी दिखाई नहीं देता, अतः एक दिन वह चमकीला तारा आकाश में अपने घर को छोड़ अपनी पूरी संपत्ति के साथ पृथ्वी पर का पाशांडी से मिलने उसके पास पहुँच गया। उसने अपनी पूरी संपत्ति का पाशांडी को अर्पित कर दी।
जब का पाशांडी को इसका अहसास हुआ कि अचानक वह इतनी अमीर हो गई है और दुनिया में सबसे अलौकिक व्यक्ति से उसका विवाह हुआ है तो उसका सिर गर्व से ऊँचा उठ गया। वह और भी अहंकार से भर उठी। उसकी अकर्मण्यता और आलस्य भी निरंतर बढ़ता गया, अब वह पहले से भी अधिक आलसी और सुस्त हो गई थी। उसका घर पूरी तरह गंदगी से भरा और अस्त-व्यस्त रहता तथा उसका शरीर भी कीचड़ से सना होता, फिर भी वह उन्हें साफ करने का कोई प्रयास न करती। उसे यह देखकर भी बिल्कुल शरम नहीं आती कि उसके पति को बहुत गंदे और टूटे-फूटे बरतनों में खाना मिलता है।
का पाशांडी के इस व्यवहार को देखकर निकुंज बहुत उदास और दुःखी हुआ, परंतु अत्यंत ध्यानपूर्वक वह अपनी पत्नी को समझाने का प्रयास करता रहा। उसे साफ सफाई से रहने और अपने व्यवहार में सुधार करने की प्रार्थना करता रहा, परंतु इन सबका का पाशांडी के ऊपर कोई असर नहीं पड़ा। वह दिन-ब-दिन और अधिक आलसी और आराम तलब होती गई। पैसे, धन-संपत्ति की अधिकता के कारण उसका अहंकार भी दिनों दिन और भी गहरा होता गया। ठीक ही कहा गया है कि किसी आलसी की आदत को सुधारना दुनिया में सबसे मुश्किल काम होता है।
अंत में परेशान होकर निकुंज ने उसे छोड़ देने की धमकी दी। उसके पड़ोसियों ने भी उसे समझाया कि वह अपनी आदतों में सुधार कर ले नहीं तो अगर उसके पति ने उसे छोड़ दिया तो उसकी स्थिति बहुत बुरी हो जाएगी, परंतु इतना होने के बावजूद भी का पाशांडी की आदतों में कोई बदलाव नहीं आया। अंत में पूरी तरह निराश हो जाने के बाद निकुंज अपनी सारी संपत्ति अपने साथ समेटकर वापस अपने घर आकाश में चला गया।
अब अचानक का पाशांडी को अपनी गलती का एहसास हुआ। पति के वापस चले जाने से वह दुःख और पीड़ा से भर उठी। उसे अपना जीवन तमाम तरह के अभाव से ग्रस्त और परेशानियों से भरा हुआ प्रतीत हुआ। वह आकाश की ओर जाते हुई अपने पति को गिड़गिड़ाकर पुकारने लगी कि बस एक बार वह वापस चला आए, अब वह अपनी आदतों में सुधार कर लेगी और जैसा वह कहेगा, वैसा ही व्यवहार करेगी, परंतु अब बहुत देर हो चुकी थी। उसका पति फिर वापस कभी नहीं आया और वह अकेले ही पीड़ा और शरम में डूबी अपना जीवन निर्वाह करती रही।
आज भी का पाशांडी इस उम्मीद में रहती है कि उसका पति वापस पृथ्वी पर लौटकर आएगा। वह आकाश की ओर अपनी गरदन उठाएँ, निरंतर उसी तरफ देखती रहती है। दुःख से भरी हुई, धीरे-धीरे चलती, वह एकटक आकाश की ओर देखती है और उसे लगता है कि उसका पति किसी भी क्षण वापस आ सकता है। इस घटना के बाद का पाशांडी का नाम उस पूरे क्षेत्र में अत्यंत घृणा के साथ लिया जाने लगा। लोग उसका मजाक उड़ाते और वह सब के लिए घृणा का पात्र बन गई। उसे मूर्खता और गंदगी का पर्याय माना जाने लगा। उसको लेकर तमाम तरह के मुहावरे और गीत बने और लोग आज भी आलसी और अकर्मण्य पत्नियों को चेतावनी देने के लिए उसका उदहारण देते हैं और उन मुहावरों का प्रयोग करते हैं, जो उसके अपमान में बने थे। समाज की परित्यक्त स्त्रियों को शिक्षा देने के लिए आज भी खासी समाज में का पाशांडी की कथा कही जाती है।