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Friday, April 17, 2026

शांति

भगवान विष्णु सभी जीवों को कुछ न कुछ वस्तुएं भेट कर रहे थे। सभी जीव भेट स्वीकार करते और खुशी खुशी अपने निवास स्थान के लिए प्रस्थान करते। जब सब चले गए तो उनकी चरण सेविका श्री लक्ष्मी जी ने भगवान से कहा, "हे नाथ मैंने देखा कि आपने सभी को कुछ न कुछ दिया,अपने पास कुछ नहीं रखा लेकिन एक वस्तु आपने अपने पैरों के नीचे छिपा लिया है। वो वस्तु क्या है?"
श्री हरि मंद मंद मुस्कुराते रहे,उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया।
लक्ष्मी जी ने फिर कहा,"प्रभु हमसे न छुपाएं, मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है आपने कोई एक चीज़ अपने पैरों के नीचे छिपा रखा है,निवेदन है कृपया इस रहस्य से पर्दा उठाइए।"
श्री हरि बोले, "देवी मेरे पैरों के नीचे "शांति" है।शांति मैंने किसी को नहीं दिया,सुख सुविधा तो सभी के पास हो सकता हैं मगर शांति तो किसी दुर्लभ मनुष्य के पास ही होगा।ये मैं सब को नहीं दे सकता।जो मेरी प्राप्ति के लिए तत्पर्य होगा, जिसकी सारी चेष्टाएं मुझ तक पहुंचने की होगी, उसी को ये मिलेगी"
श्री हरि से आज्ञा लेकर शांति कहने लगी," हे जगत माता,श्री हरि ने मुझे अपने पैरों के नीचे नहीं छिपाया बल्कि मैं स्वयं उनके पैरों के नीचे छिप गई।

जय गजानन्द जी

उस समय की बात है जब भगवान विष्णु जी की शादी लक्ष्मी जी से तय हुई थी । शादी की खूब तैयारियां की गई। चारो और हर्षो उल्लास का वातावरण था। सारे देवी -देवता को बारात में चलने के लिए निमंत्रण दिया गया।
सारे देवी -देवता आये तो सब भगवान विष्णु से कहने लगे की गणेश जी को नहीं ले जायेंगे। वे बहुत मोटे हैं वो तो बहुत सारा खाते है।
दूंद दूछल्या , सूंड सून्डयाला , ऊखल से पाँव , छाजले से कान , मोटा मस्तक वाले है। इनको साथ ले जाकर क्या करेंगे , यही रखवाली के लिए छोड़ जाते हैं और विनायक जी को छोड़कर वे सब बारात में चले गए है।
इधर नारद जी ने गणेश जी को भड़का दिया ओर कहा की आज तो महाराज ने आपका बहुत बड़ा अपमान किया है। आप से बारात बुरी लगती इसीलिए आपको साथ नहीं ले गए और छोड़ कर चले गए । गणेश जी को क्रोध आ गया और उन्होंने चूहों की आज्ञा दी की सारी जमीन खोखली कर दे। धरती खोखली हो गयी इससे भगवान के रथ के पहिये धंस गए।
बहुत कोशिश करके सब परेशान हो गए किसी भी तरह से पहिये नहीं निकले तो हांथी को बुलाया। हाथी आया सारा दृश्य देखा और पहिये को हाथ लगा कर बोला ” जय गजानन्द जी ” और इतने में तुरन्त रथ निकल गया। सब देखते रह गए। सबको बड़ा आश्चर्य हुआ उन्होंने पूछा कि तुमने गजानन्द जी को क्यों याद किया। हाथी बोला ” गणेश जी को सुमरे बिना कोई काम सिद्ध नहीं होता ” जो भी सच्चे मन से गजानन्द जी को याद करता है उसके सब काम बड़ी आसानी से सिद्ध हो जाते है।
सब सोचने लगे हम तो गणेश जी को ही छोड़ आये। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और एक जने को भेज कर गणेश जी को बुलवाया व गणेश जी से माफ़ी माँगी और पहले गणेश जी का रिद्धि -सिद्धि से विवाह करवाया फिर भगवान विष्णु का लक्ष्मी जी के साथ हुआ। सभी बहुत ही खुश थे तभी से कोई भी शुभ काम शुरू करने से पहले विनायक जी का स्मरण किया जाता है।
जैसे भगवान का काम सिद्ध किया वैसे सबका सिद्ध करना।
बोलो विनायक जी की जय !

प्रभु जी का बहीखाता

एक बार की बात है, वीणा बजाते हुए नारद मुनि भगवान श्रीराम के द्वार पर पहुँचे। नारायण नारायण !! नारदजी ने देखा कि द्वार पर हनुमान जी पहरा दे रहे है।
हनुमान जी ने पूछा: नारद मुनि! कहाँ जा रहे हो?
नारदजी बोले: मैं प्रभु से मिलने आया हूँ। नारदजी ने हनुमानजी से पूछा प्रभु इस समय क्या कर रहे है?
हनुमानजी बोले: पता नहीं पर कुछ बही खाते का काम कर रहे है, प्रभु बही खाते में कुछ लिख रहे है।
नारदजी: अच्छा? क्या लिखा पढ़ी कर रहे है?
हनुमानजी बोले: मुझे पता नहीं मुनिवर आप खुद ही देख आना।
नारद मुनि गए प्रभु के पास और देखा कि प्रभु कुछ लिख रहे है।
नारद जी बोले: प्रभु आप बही खाते का काम कर रहे है? ये काम तो किसी मुनीम को दे दीजिए।
प्रभु बोले: नहीं नारद, मेरा काम मुझे ही करना पड़ता है। ये काम मैं किसी और को नही सौंप सकता।
नारद जी: अच्छा प्रभु ऐसा क्या काम है? ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिख रहे हो?
प्रभु बोले: तुम क्या करोगे देखकर, जाने दो।
नारद जी बोले: नही प्रभु बताईये ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिखते हैं?
प्रभु बोले: नारद इस बही खाते में उन भक्तों के नाम है जो मुझे हर पल भजते हैं। मैं उनकी नित्य हाजिरी लगाता हूँ ।
नारद जी: अच्छा प्रभु जरा बताईये तो मेरा नाम कहाँ पर है? नारदमुनि ने बही खाते को खोल कर देखा तो उनका नाम सबसे ऊपर था। नारद जी को गर्व हो गया कि देखो मुझे मेरे प्रभु सबसे ज्यादा भक्त मानते है। पर नारद जी ने देखा कि हनुमान जी का नाम उस बही खाते में कहीं नही है? नारद जी सोचने लगे कि हनुमान जी तो प्रभु श्रीराम जी के खास भक्त है फिर उनका नाम, इस बही खाते में क्यों नही है? क्या प्रभु उनको भूल गए है?
नारद मुनि आये हनुमान जी के पास बोले: हनुमान! प्रभु के बही खाते में उन सब भक्तों के नाम हैं जो नित्य प्रभु को भजते हैं पर आप का नाम उस में कहीं नहीं है?
हनुमानजी ने कहा: मुनिवर! होगा, आप ने शायद ठीक से नहीं देखा होगा?
नारदजी बोले: नहीं नहीं मैंने ध्यान से देखा पर आप का नाम कहीं नही था।
हनुमानजी ने कहा: अच्छा कोई बात नहीं। शायद प्रभु ने मुझे इस लायक नही समझा होगा जो मेरा नाम उस बही खाते में लिखा जाये। पर नारद जी प्रभु एक अन्य दैनंदिनी भी रखते है उसमें भी वे नित्य कुछ लिखते हैं।
नारदजी बोले: अच्छा?
हनुमानजी ने कहा: हाँ!
नारदमुनि फिर गये प्रभु श्रीराम के पास और बोले प्रभु! सुना है कि आप अपनी अलग से दैनंदिनी भी रखते है! उसमें आप क्या लिखते हैं?
प्रभु श्रीराम बोले: हाँ! पर वो तुम्हारे काम की नहीं है।
नारदजी: प्रभु! बताईये, मैं देखना चाहता हूँ कि आप उसमें क्या लिखते हैं ?
प्रभु मुस्कुराये और बोले: मुनिवर मैं इन में उन भक्तों के नाम लिखता हूँ जिन को मैं नित्य भजता हूँ।
नारदजी ने डायरी खोल कर देखा तो उसमें सबसे ऊपर हनुमान जी का नाम था। ये देख कर नारदजी का अभिमान टूट गया।
कहने का तात्पर्य यह है कि जो भगवान को सिर्फ जीव्हा से भजते है उनको प्रभु अपना भक्त मानते हैं, और जो ह्रदय से भजते है उन भक्तों के वे स्वयं भक्त हो जाते हैं। ऐसे भक्तों को प्रभु अपनी हृदय रूपी विशेष सूची में रखते हैं।
श्री धाम वृन्दावन

सच्चा-गायक

एक गाँव में गौरांग नामक एक गरीब लड़का रहता था। वह बहुत अच्छा गाता एवं डफली बजाता था। अपनी डफली लेकर वह रोज नदी किनारे चौराहे पर गीत गाता एवं डफली बजाता। लोग आते-जाते, पर ठहरकर न कोई उसका गाना सुनता, न प्रशंसा करता। वह बहुत दुःखी हो जाता। जब वह घर लौटता, बहुत उदास रहता। उसकी माँ उसे उदास देखती, तो उसे उस पर बहुत दया आती। उसे ढाढ़स बँधाती। प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरकर कहती, "बेटा निराश मत होना। अपना काम करते रहो। ईश्वर एक दिन जरूर तुम्हें सफलता देगा।"
गौरांग झुंझलाकर कहता, “माँ! मैं इतना अच्छा गाता-बजाता हूँ, फिर भी लोग मेरे गीत की कद्र नहीं करते ! आखिर मुझमें क्या कमी है माँ ?"
माँ कहती, "बेटा! यह सब भाग्य का खेल है। किसी मनुष्य का भाग्य पत्ते के पीछे होता है तो किसी का पत्थर के नीचे। पत्ता तो हवा के झोंके से उड़ जाता है, पर पत्थर को उड़ाने के लिए तो तूफान की जरूरत पड़ती है। तुम विश्वासपूर्वक अपना काम करते रहो। ईश्वर तुम्हारा भला करेगा।"
माँ के वचन गौरांग में उत्साह ला देता और वह दोगुने जोश के साथ गीत गाता एवं डफली बजाता। गौरांग की माँ अपने बेटे को बहुत प्यार करती थी। उसके प्रति उसके हृदय में ममता का अथाह सागर हिलोरें मारता रहता था। वह एक जमींदार के बगीचे की देखभाल करती थी। बदले में उसे अनाज, सब्जी, आम आदि मिल जाते थे। उन्हीं चीजों से उनका संसार चलता था।
एक दिन गौरांग जंगल में घूम रहा था, तभी उसकी दृष्टी एक घायल शिशु हिरणी पर पड़ी। वह दौड़कर हिरणी के निकट गया। देखा, उसकी एक टाँग टूटी हुई है और उसके शरीर में कुछ घाव भी हैं। उसे देखकर उसे दया आ गई। उसे उठाकर वह घर ले आया और अपनी माँ से कहा, "लगता है, किसी जंगली जानवर ने इसे घायल किया है। इस हालत में यह जंगल में मर जाती, इसीलिए मैं इसे उठाकर ले आया।"
माँ ने कहा, “बहुत अच्छा किया बेटा।" गौरांग उस शिशु हिरणी की मन लगाकर सेवा करता। सुबह उठकर वह उसके घावों को फिटकरी के जल से धोता, फिर वैद्यजी की जड़ी-बूटी लगाता, पाँव में पट्टी बाँधता, उसका खूब खयाल रखता। वह उस हिरणी से काफी घुल-मिल गया था। उसकी सेवा से हिरणी ठीक होने लगी। उसके घाव तो भर गए, पर पाँव ठीक नहीं हुए। वह लँगड़ाकर चलती थी।
हिरणी से गौरांग को इतना अधिक लगाव हो गया कि वह दीन-दुनिया से बेखबर हो गया। अपनी माँ को भी गौण समझने लगा। इससे उसकी माँ को बहुत चिंता हुई। एक दिन जब गौरांग घर में नहीं था तो उसकी माँ हिरणी को जंगल में एक सुरक्षित स्थान में छोड़ आई। घर आने पर गौरांग ने अपनी माँ से जब हिरणी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह इसके बारे में कुछ भी नहीं जानती है। गौरांग द्वारा बार-बार पूछने पर भी उसने अनभिज्ञता प्रकट की।
गौरांग अत्यंत दु:खी हो गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने डबडबाई आँखों से अपनी माँ से कहा, "पता नहीं उस बेचारी के साथ क्या हुआ होगा? अभी तो उसकी टाँग भी ठीक नहीं हुई थी। वह तो ठीक से भाग भी नहीं सकेगी। जंगली जानवरों से वह अपनी रक्षा कैसे कर पाएगी?"
उसकी माँ अपने बेटे के दुःख को देख दुःखी हुई, पर उसे सच्चाई बता नहीं पाई। उधर गौरांग खाट पर बैठा केवल आँसू बहाता रहा। उसने खाना भी नहीं खाया। रोते-रोते रात बीत गईं। सुबह पीड़ा से व्यथित हो उसने अपनी डफली उठाई, चौराहे पर गया और अत्यंत तल्लीन होकर गाना गाते हुए डफली बजाने लगा। डफली बजाने में वह इतना तन्मय हो गया कि उसे समय का ध्यान ही न रहा। जब उसने गाना समाप्त किया, तो देखा कि आस-पास भारी भीड़ इकट्ठी हो गई है और उसके सामने सिक्कों का ढेर लगा हुआ है और लोग 'वाह ! वाह !' करते हुए तालियाँ बजा रहे हैं। उसे लगा कि वह सपना देख रहा है! वह अवाक् चारों ओर देखता रहा। धीरे-धीरे भीड़ छंट गई, तब उसकी मदहोशी टूटी। सामने पड़े सिक्कों को समेटकर वह अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक घर पहुँचा। खुशी से झूमते हुए उसने अपनी माँ से कहा, "माँ! माँ ! देखो आज मुझे कितने पैसे मिले! आज तो सब लोग मेरे गाने पर तालियाँ बजा रहे हैं। कुछ तो रो भी रहे थे।"
माँ ने उसे अपने हृदय से लगा लिया। फिर बोली, “बेटा जब भी मैं तुम्हारा गाना सुनती थी, तो मुझे है। आज से तुम एक सच्चे गायक हो।"
गौरांग अपनी माँ से लिपटकर रोने लगा।

काजल की नेग

आज लाला कन्हैया के आँखन मे काजल लगाने को दिन है ! 
नन्द बाबा की बहन सुनन्दा देवी जो कन्हैया की बुआ लगती है चटकती मटकती आयी और यशोदा जी से बोली की..
सुनन्दा जी -- भाभी जी लाला को काजल लगावे का हक हमारो है।
श्री यशोदा जी -- हाँ बीबी जी लगाओ आप ही लगाओ।
सुनन्दा जी -- ऐसे नही लगाऊँगी मेरो को भी नेग चाहिये।
यशोदा जी -- हाँ बीबी जी आपको भी नेग मिलेगो।
सुनंदा जी -- देखो भाभी जब लाला के नाल छेदन के समय नाल काटने वारी दासी नेग के लिये मचल गई की.... 
व्रजरानी बहुत दिन बाद लाला हुआ हुआ है नेग सोच समझकर देना तो आपने अपने गले का नौलखा हार उतार कर उसे पहना दी ...
वाते कमती मुझे मत करियो नही तो ननद भाभी दोनन की झगड़ा बन जायेगी और हमेशा के लिये ननद भौजाई की शिकायत बनी रहेगी।
यशोदा जी -- नही नही बीबी जी वाते बढ़ चढ़के मिलेगो।
फिर सुनन्दा बुआ ने लाला श्यामसुन्दर को काजल लगाई और सोच रही है की देखे भाभी क्या देती है... 
ज्योंही सुनन्दा बुआ ने हाथ बढ़ाये की लाओ मेरा नेग दो तो श्री यशोदा जी ने कन्हैया को उठाकर उनकी गोदी मे दे दी ...
और सुनन्दा जी के मुखमंडल पर दृष्टि डाली की बीबी जी कछु कसर रह गयी हो तो दउँ कछु और ?
आँखन मे आँसू आ गये। सुनन्दा बुआ के बोली भाभी याते कीमती और क्या हो सकता है। तूने तो अपना सर्वस्व दे दिवो।
अब लाला मुझे नेग मे मिल्यो तो लाला तो हमारो हय गयो।
लेकिन भाभी मेरी छाती मे दूध नाय। लाला को दूध पिलावे को कोई धाय रखनो पड़ेगो और देख तेरी छाती मे दूध फालतू पड़ो रहेगो। 
क्या फायदो धाय रखने को। लेव मै तोहि को अपने लाला के लिये धाय के रुप मे नियुक्त करती हूँ। मेरो लाला को खूब ध्यान रखियो और उन्होने लाला कन्हैया को यशोदा जी के गोद मे दे दिया। 
इस तरह से खूब आनन्द हो रहा है ब्रज मे।
भगवान श्रीकृष्ण साक्षात् लीलावतार हैं। उनकी लीलाएं अनन्त हैं। उन्होंने अपनी दिव्य लीलाओं के माध्यम से विभिन्न प्रयोजनों हेतु अनेक प्राणियों का उद्धार किया।
गोपियां श्रीकृष्ण प्रेम की पराकाष्ठा हैं। गोपियों के मन, वाणी और शरीर श्रीकृष्ण में ही तल्लीन रहते। गोपियों का हृदय प्रेममय है, श्रीकृष्णमय है, अमृतमय है।

ईश्वर का धन्यवाद

एक राजा थे सूर्यसेन। वह बहुत बड़े दानी थे। उनका प्रतिदिन का नियम था सवेरे जल्दी उठते नदी में स्नान करके पूजा-पाठ करते तथा उसके बाद निर्धनों को दान दिया करते तब जाकर वह अन्न-जल ग्रहण किया करते थे। 
उनकी दयालुता की भावना देखकर उनके आस-पड़ोस के शत्रु राजा भी मन ही मन बहुत प्रभावित थे।
राजा सूर्यसेन के राज्य में प्रतिदिन सैंकड़ों की संख्या में भिक्षुक आते थे, उन भिक्षुकों में दो व्यक्ति जिनका नाम रोहन व सोहन था कई वर्षों से लगातार राजमहल में आते थे। 
अब तो राजा उनको नाम से भी पहचानने लगे थे वे दोनों बहुत ईमानदार थे अर्थात जितना एक दिन के लिये पर्याप्त होता उतना ही दान लिया करते थे।
कई बार राजा ने उनको अधिक दान देने का प्रयास भी किया किन्तु वे दोनों सिर्फ उतना ही दान स्वीकारते जिससे उनको दो वक्त का भोजन मिल जाये। 
दोनों में एक विशेष बात यह थी कि दान लेने के बाद रोहन तो राजा का धन्यवाद करता किन्तु सोहन कहता था हे ईश्वर! आपका धन्यवाद (ईश्वर का धन्यवाद) करता।
राजा को लगता कि दान तो इसे मैं देता हूं, लेकिन सोहन ने कभी मुझे धन्यवाद नहीं करता बल्कि हर बार यही कहता है कि ईश्वर का धन्यवाद। 
यहां पर राजा का अहंकार जाग जाता था, वह चाहता था कि सोहन भी रोहन की भाँति उनको धन्यवाद दे।
एक बार जब राजा दान दे रहे थे तो सदैव की भांति रोहन ने कहा – महाराज आपका बहुत-बहुत धन्यवाद तो सोहन ने दान लेने के बाद कहा ईश्वर का बहुत-बहुत धन्यवाद। 
उस दिन राजा ने सभी भिक्षुओं को तो जाने दिया किन्तु उन दोनों को राजमहल में रुकने को कहा। और सोहन से पूछा तुम्हे दान तो में देता हूँ किन्तु तुमने मेरा धन्यवाद कभी नही किया, सोहन ने कहा राजन ये आप समझते हैं कि आप दे रहे हैं देने वाला तो ईश्वर है आप तो निमित्त है, आप अपनी इच्छा से किसी को कुछ नही दे सकते, सोहन की बात सुनकर राजा ने मन ही मन निश्चय किया कल में इसके साथी रोहन को धनवान बना दूंगा तब इसे पता लगेगा कि कोंन है देने वाला..
अगले दिन राजा ने दोनो को अपने बाग में घूमने का अवसर दिया, पहले रोहन को अपने बाग में भेजा। रोहन बड़ा प्रश्नन था कि राजा ने मुझे अपने बाग में जाने का अवसर दिया वह बाग की सुंदरता में इतना खो गया कि आस पास का ध्यान ही ना रहा। 
वहां पर राजा ने धन से भरी एक पोटली रखी थी जिसकी ओर उसका ध्यान ही ना गया। अब वह वापस आ गया राजा ने पूछा कि क्या तुम्हें वहां कुछ मिला ? 
रोहन बोला नहीं महाराज, मुझे तो कुछ भी नहीं मिला लेकिन बाग बहुत ही अच्छा था।
अब सोहन की बारी थी। वह मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ बाग में घूम रहा था कि उन्होंने उसे यह अवसर दिया कि आज राजा के बाग में घूमने का मौका मिला। 
वह बड़ा सतर्क होकर वहां चल रहा था तभी उसकी दृष्टि उस पोटली पर पड़ी जिस पर रोहन की दृष्टि नहीं पड़ी थी। 
वह वापस आया और राजा को वह धन से भरी पोटली राजा को दे दी।
अगले दिन राजा ने रोहन को एक बड़ा सा कटहल दिया और सोहन को मात्र कुछ रूपये दे दिये सोहन ने सदैव की भांति ईश्वर को धन्यवाद दिया। 
अब रोहन बेमन से उस कटहल को लेकर चल दिया और सोचने लगा कि राजा ने आज आखिर यह क्या दिया है, और उसने बाजार में जाकर वह कटहल सब्जी वाले को बेच दिया।
सोहन ने उन रूपयों का कटहल उसी सब्जी वाले से खरीदा और संयोग से ये वही था जिसे रोहन ने बेचा था। 
घर जाकर जब उसने वह काटा तो उसकी आंखे खुली की खुली रह गईं उस कटहल में से सोने की कुछ अशर्फियां निकलीं
अगले दिन भिक्षा के लिए अकेला रोहन ही राजमहल पहुंचा तो राजा ने उससे सोहन के बारे में पूछा।
रोहन ने राजा से बताया कि वह अब नहीं आयेगा उसे कहीं से सोने की अशर्फियां मिल गयी हैं अब वह एक धनवान व्यक्ति बन चुका है। 
राजा ने अपना माथा पकड़ लिया। राजा ने सोचा कि मैंने कितना प्यास किया कि रोहन दान के लिये हमेशा मुझे ही धन्यवाद देता है उसको धनवान किया जाये किन्तु सोहन ठीक कहता था देने वाला ईश्वर ही है हम तो केवल निमित्त है...
सोहन ठीक ही हर बात के लिए ईश्वर का धन्यवाद करता था।
राजा का घमण्ड टूट चुका था अब राजा ने कहा हे ईश्वर! मुझे सही मार्ग दिखाने के लिए आपका धन्यवाद।

भगवान शिव और विष्णु

भगवान  विष्णु ने एक बार अत्यंत मनमोहक 'किशोर रूप' धारण किया।
  कारण: शिव जी के मन में अपने आराध्य (विष्णु जी) के उस सुंदर रूप को हर दिशा से निहारने की तीव्र इच्छा जगी।
  परिणाम: चूँकि ब्रह्मा जी के चार मुख थे और इंद्र की हजार आँखें थीं, वे उस रूप का अधिक आनंद ले रहे थे। शिव जी की इसी अनन्य भक्ति ने उन्हें एक मुख से 'पंचमुखी' बना दिया।

एक समय की बात है, वैकुंठ के स्वामी भगवान श्री हरि विष्णु ने एक अत्यंत दिव्य और चित्त को हर लेने वाला 'किशोर रूप' धारण किया। उनके इस रूप की आभा इतनी अलौकिक थी कि समस्त देवलोक उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़ा।
ब्रह्मा जी अपने चार मुखों से उन्हें देख रहे थे, शेषनाग अपने अनेक फणों से उस छवि को निहार रहे थे और देवराज इंद्र अपनी सहस्त्र (हजार) आंखों से उस दिव्यता का पान कर रहे थे। वहाँ महादेव भी उपस्थित थे। जब उन्होंने विष्णु जी के उस अनुपम सौंदर्य को देखा, तो उनके मन में एक अनूठा भाव जागा।
उन्होंने सोचा, "मेरे पास तो केवल दो नेत्र और एक ही मुख है। मैं अपने प्रभु के इस मनोहर रूप को पूरी तरह कैसे देख पाऊं? काश! मेरे भी कई मुख होते ताकि मैं हर दिशा से इस सुंदरता को एक साथ निहार सकता।"
जैसे ही महादेव के मन में अपने आराध्य के प्रति यह शुद्ध प्रेम और इच्छा उत्पन्न हुई, तत्काल उनके एक मुख से पांच दिव्य मुख प्रकट हो गए और प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र सुशोभित हो उठे। इस प्रकार महादेव 'पंचानन' कहलाए।

शिवपुराण के अनुसार, ये पांच मुख केवल दिशाओं के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये ब्रह्मांड के पांच प्रमुख कार्यों और तत्वों के स्वामी हैं:
 * सद्योजात (पश्चिम मुख): यह श्वेत वर्ण का है। यह मन की शुद्धता और 'सृष्टि' का प्रतीक है।
 * वामदेव (उत्तर मुख): यह कृष्ण वर्ण का है। यह अहंकार का शुद्धिकरण और 'स्थिति' का प्रतीक है।
 * अघोर (दक्षिण मुख): यह नील/काला वर्ण है। यह बुद्धि और 'संहार' का प्रतीक है, जो बुराई का अंत करता है।
 * तत्पुरुष (पूर्व मुख): यह पीत (पीला) वर्ण है। यह आत्मा और 'तिरोभाव' का प्रतीक है। इसी मुख से गायत्री मंत्र का प्राकट्य माना जाता है।
 * ईशान (ऊर्ध्व मुख): यह स्फटिक के समान चमकता हुआ मुख है। यह आकाश तत्व और 'अनुग्रह' का प्रतीक है।

भगवान शिव का पंचानन स्वरूप हमें सिखाता है कि भक्ति में ही शक्ति है। जब भक्त के मन में ईश्वर को देखने की सच्ची तड़प होती है, तो स्वयं महादेव उसे अनंत दृष्टियाँ प्रदान करते हैं। जो मनुष्य शिव के इन पांच रूपों का ध्यान करता है, उसके पांचों तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) संतुलित हो जाते हैं और उसे परम शांति प्राप्त होती है।