महामंत्र > हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे|हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे||

Sunday, August 2, 2026

दयालु और बड़ा दिल

एक बार भगवान श्री हरि विष्णु जी शेषनाग पर बैठे बोर हो गये और उन्होने धरती पर घूमने का विचार मन मे किया, वेसे भी कई साल बीत गये थे धरती पर आये, अतः वह अपनी यात्रा की तैयारी मे लग गये।
   स्वामी को तैयार होता देख कर लक्ष्मी मां ने पुछा आज सुबह सुबह कहा जाने कि तैयारी हो रही है?
    विष्णु जी ने कहा हे लक्ष्मी मै धरती लोक पर घुमने जा रहा हूं, तो कुछ सोच कर लक्ष्मी मां ने कहा ! हे देव क्या मै भी आप के साथ चल सकती हूं?
    भगवान विष्णु ने दो पल सोचा फ़िर कहा एक शर्त पर, तुम मेरे साथ चल सकती हो तुम धरती पर पहुँच कर उत्तर दिशा की ओर बिलकुल मत देखना। इस के साथ ही माता लक्ष्मी ने हां कह के अपनी बात मनवाली। 
ओर सुबह सुबह माँ लक्ष्मी ओर भगवान विष्णु धरती पर पहुँच गये।
अभी सुर्य देवता निकल रहे थे, रात बरसात हो कर हटी थी, चारो ओर हरियाली ही हरियाली थी, उस समय चारो ओर बहुत शान्ति थी ओर धरती बहुत ही सुन्दर दिख रही थी, माँ लक्ष्मी मन्त्र मुग्ध हो कर धरती को देख रही थी, भूल गई कि पति को क्या वचन दे कर आई है? चारो ओर देखती हुयी कब उत्तर दिशा की ओर देखने लगी पता ही नही चला।
उत्तर दिशा में माँ लक्ष्मी को एक बहुत ही सुन्दर बगीचा नजर आया, वँहा से भीनी भीनी सुगन्ध आ रही थी, बहुत ही सुन्दर सुन्दर फूल खिले थे, यह एक फूलों का बगीचा था, माँ लक्ष्मी बिना सोचे समझे उस बगीचे मे गई ओर एक सुंदर सा फूल तोड लाई, किन्तु यह क्या जब माँ लक्ष्मी भगवान विष्णु के पास वापिस आई तो भगवान विष्णु की आंखो मै आंसु थे।
भगवान विष्णु ने माँ लक्ष्मी को कहा कि कभी भी किसी से बिना पुछे उसका कुछ भी नही लेना चाहिये, साथ ही अपना वचन भी याद दिलाया।
माँ लक्ष्मी को अपनी भूल का पता चला तो उन्होने भगवान विष्णु से इस भूल की क्षमा मागी, तब भगवान विष्णु ने कहा कि तुमने जो भूल की है उस का दंड तो तुम्हे अवश्य मिलेगा?
    जिस माली के बगीचे से तुमने बिना पुछे फ़ुल तोडा है, यह एक प्रकार की चोरी है, इसलिये अब तुम तीन साल तक माली के घर नौकरानी बन कर रहॊ, उस के बाद मै तुम्हे बैकुण्ठ मे वापीस बुलाऊंगा, माँ लक्ष्मी ने चुपचाप सर झुका कर हाँ कर दी (आज कल की लक्ष्मी थोडे थी?)
माँ लक्ष्मी एक दीन हीन निर्धन औरत का रुप धारण करके, बगीचे के स्वामी के घर गई, घर क्या एक झोपड़ी थी, स्वामी का नाम माधव था, माधब की पत्नी, दो बेटे ओर तीन बेटियाँ थी , सभी उस बगीचे मै काम करके किसी तरह से गुजारा करते थे,
  माँ लक्ष्मी जब एक साधारण और दीन हीन औरत बन कर माधव के झोपड़ी पर गई तो माधव ने पूछा बहिन तुम कोन हो? इस समय तुम्हे क्या चाहिये? तब मां लक्ष्मी ने कहा, मै एक असहाय औरत हू मेरी देख भाल करने वाला कोई नही, मैने कई दिनो से भोजन भी नही किया मुझे कोई भी काम दे दॊ, साथ में तुम्हारे घर का काम भी कर दिया करुगीं , बस मुझे अपने घर में एक कोने में आसरा देदो।
माधव बहुत ही दयालु था, उसे दया आ गई, लेकिन उस ने कहा, बहिन मै तो बहुत ही गरीब हुँ, मेरी कमाई से मेरे घर का खर्च मुस्किल से चलता है, लेकिन अगर मेरी तीन की जगह चार बेटियाँ होती तो भी मेने गुजारा करना था, अगर तुम मेरी बेटी बन कर जेसा रुखा सुखा हम खाते है उस मै खुश रह सकती हो तो बेटी अन्दर आ जाओ।
माधाव ने माँ लक्ष्मी को अपने झोपडे में शरण दे दी, और माँ लक्ष्मी तीन साल तक उस माधव के घर पर नोकरानी बन कर रही।
जिस दिन माँ लक्ष्मी माधव के घर आई थी उस से दुसरे दिन ही माधाव को फूलो से इतनी आमदनी हुयी की शाम को एक गाय खरीद ली, फ़िर धीरे धीरे माधव ने काफ़ी जमीन खरीद ली, और सब ने अच्छे अच्छे कपड़े भी बनवा लिये, और फ़िर एक बड़ा पक्का घर भी बनवा लिया, बेटियों और पत्नी ने गहने भी बनवा लिये, और अब मकान भी बहुत बड़ा बनवा लिया था।
माधव सदैव सोचता था कि मुझे यह सब इस महिला के आने के बाद मिला है, इस बेटी के रुप मे मेरी किस्मत आ गई है और अब 2-3 साल बीत गये थे, लेकिन मां लक्ष्मी अब भी घर मै और बगीचे में काम करती थी, एक दिन माधव जब अपने बगीचे से काम खत्म करके घर आया तो उस ने अपने घर के सामने द्वार पर एक देवी स्वरुप गहनों से लदी एक औरत को देखा, ध्यान से देख कर पहचान गया।
 अरे यह तो मेरी मुहँ बोली चौथी बेटी यानि वही औरत है, पहचान गया कि यह तो माँ लक्ष्मी है।
अब तक माधव का पूरा परिवार बाहर आ गया था, सब हैरान हो कर माँ लक्ष्मी को देख रहे थे, माधव बोला है मां हमे क्षमा कर दो, हम ने आप से अंजाने मे ही घर और बगीचे मे काम करवाया है, माँ यह कैसा अपराध हो गया है, माँ हम सब को क्षण कर दो।
अब माँ लक्ष्मी मुस्कुराई और बोली, हे माधव तुम बहुत ही अच्छे और दयालु व्यक्त्ति हो, तुम ने मुझे अपनी बेटी की तरह से रखा, अपने परिवार के सदस्य की तरह से, इस के बदले मै तुम्हे वरदान देती हूं कि तुम्हारे पास कभी भी खुशियो की और धन की कमी नही रहेगी, तुम्हे सारे सुख मिलेगे जिस के तुम हकदार हो।
यह सब बोल कर माँ अपने स्वामी के द्वारा भेजे रथ मे बैठ कर बैकुण्ठ चली गई।

इस कहानी मे माँ लक्ष्मी का संदेश है कि जो लोग दयालु और बड़े दिल के होते है मै वही निवास करती हूं, अतः हमे सभी की मदद करनी चाहिये, और गरीब से गरीब को भी तुच्छ नही समझना चाहिये।

शिक्षा - एक छोटी सी भूल पर भगवान ने माँ लक्ष्मी को दंड दिया हम तो बहुत ही तुच्छ है, फ़िर भी भगवान हमे अपनी कृपा मे रखता है, हमे भी हर जीव के प्रति दयालुता दिखानी और बरतनी चाहिये और यह दुःख सुख हमारे ही कर्मो का फ़ल है।

Saturday, August 1, 2026

नारी-चाला

एक था राजा । राजा की हजामत बनाने जो नाई आता था, उसकी | पत्नी नैण अपूर्व सुंदरी थी। एक बार वजीर ने नाइन को देखा तो वह देखता ही रह गया। नाई की अनुपस्थिति में उसने राजा से कहा, "हे प्रभु! स्त्रियाँ तो बहुत देखी हैं, लेकिन 'नैण' पर तो आँख टिकाए नहीं टिकती। उसे तो आपकी सेज पर होना चाहिए।" राजा तो स्वभाव से ही सामंत - वृत्ति का था । श्रवण मात्र से ही वह नारी के रूप- वैभव पर मुग्ध हो गया तथा नैण को प्राप्त करने के लिए उसकी लार टपकने लगी। वजीर ने उसे परामर्श दिया, "महाराज! नाई को कहीं बाहर भिजवा सकें तो उसकी अनुपस्थिति में नैण को फुसलाया जा सकता है।"
राजा ने नाई को बुलाकर कहा, "मुझे 'स्त्री-चाला' की जरूरत है। जहाँ कहीं से ही संभव हो, जाकर तुरंत ले आओ। तुम्हारी क्षमता तथा वफादारी पर मुझे पूरा भरोसा है।"
नाई बेचारा सीधा-सादा। वह सोच में पड़ गया। उसे तो 'स्त्री चाला' नाम की बला का भी नहीं पता था। वह उदास सा घर पहुँचा। बिना खाए-पिए खाट पर लेट गया। उसकी पत्नी ने पूछा, “इतने घबराए हुए क्यों हो?"
नाई ने रोनी सी सूरत बनाकर कहा, "राजा ने मुझे स्त्री चाला लाने का आदेश दिया है। पर मैं उसके बारे में कुछ भी नहीं जानता, व्यर्थ की मुसीबत गले पड़ गई।"
नैण ने विश्वस्त स्वर में कहा, “तुम तो व्यर्थ में स्त्री-चाला की चिंता कर रहे हो । जाओ, राजा से कहो- मैं स्त्री चाला तो ले आऊँगा, लेकिन पहले मुझे चार करोड़ रुपए दे दो।"
नाई राजा के पास गया और चार करोड़ रुपए ले आया ।
नाइन ने रुपए लिये तथा सँभालकर रख दिए। उसने अपने पति को छिपा दिया। दिन छिपने के बाद नैण सज-सँवरकर गाँव में घूमने लगी। रास्ते में उसे चौकीदार मिला। वह बड़ी आत्मीयता से बोला, "प्रिये, तुम कहाँ जा रही हो?"
नैण बोली, "मेरा पति राजा के लिए 'स्त्री चाला' लेने बाहर गया है। घर में मैं अकेली हूँ और ऊपर से अँधियारी रात, सो मैं परिचितों के घर जा रही हूँ ।"
चौकीदार ने कहा, " घर अपना ही अच्छा होता है। रात को मैं ही तुम्हारे घर आ जाऊँगा । पहरेदार को छोड़, क्यों तुम अन्यत्र जाती हो। " नैण ने 'अच्छा' कहा और आगे चल दी।
फिर उसे गाँव का नंबरदार मिला। नैण की महक से उसका भी शरीर पिघलने लगा। उसने कहा, "तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं । अँधेरा घना होते ही मैं तुम्हारे घर आ जाऊँगा।"
चौकीदार, नंबरदार के बाद नैण को वजीर, राजा तथा राजऋषि मिले, उन्होंने भी रात होते ही उसके घर पहुँचने की बात कही। नैण 'हाँ-हाँ' करती मन-ही-मन मुसकराती अपने घर लौट आई।
घर पहुँचते ही उसने चूल्हा जलाया तथा उसमें दो लकड़ियाँ लगा दीं और पतीला चढ़ा दिया।
सबसे पहले गुनगुनाता हुआ चौकीदार आया। वह अभी नैण को छूने की कल्पना ही कर रहा था कि नंबरदार ने आवाज लगा दी। चौकीदार ने डरकर कहा, "ओ नैणी, मुझे बचाओ।" नैण ने उसे उल्टी घघरी पहनाकर दाल पीसने बिठा दिया।
नंबरदार के बाद वजीर आया तो नंबरदार ने कहा, "ओ नैणी, मुझे बचा! मेरी तो इज्जत खतरे में है ।" नैण ने उसका दिउट बनाया तथा उसके ऊपर लैंप रख दिया। इसी प्रकार अभी वजीर अंदर आया ही था कि राजा आ गया। वजीर के अनुनय-विनय करने पर नैण ने उसका मुँह मिट्टी से लीप दिया तथा उसे अलमारी में बिठा दिया। अभी राजा नैण से प्रेम भरी बातें करने ही लगा था कि बाहर से राजऋषि की आवाज आ गई। राजा गिड़गिड़ाया, "नैणी, मेरी साख खतरे में है, नारी की माया अपरंपार है। तू ही मुझे बचा सकती है।"
नैण बोली, "महाराज, चिंता मत करो, मैं तो आपकी बाँदी हूँ। आपको अपना देवता बनाकर अलमारी में बिठाती हूँ। फिर कोई नहीं पहचान पाएगा।" उसने राजा के मुँह पर भी मिट्टी पोत दी तथा उसे अलमारी में बिठा दिया।
अंत में राजऋषि का आगमन हुआ। उसने अलमारी में बैठे लोगों को देख लिया और पूछा, "ये कौन लोग हैं, कन्या ?"
"महाराज! ये सभी मेरे देवता लोग हैं।" नैण बोली ।
उसके इतना कहते ही सबको एक-दूसरे की उपस्थिति का एहसास हो गया तथा लज्जित होकर वे आगे-पीछे भाग निकले। राजऋषि भी खिसियानी बिल्ली सा उनके पीछे भाग लिया।
सबके भाग जाने पर नैणी अपने पति के पास आई। बड़े प्यार से उसे दुलारते हुए नैणी ने भोजन परोसा और कहा, "देखा, तुम्हारे ये हितैषी किस प्रकार मेरी देह नोचने के लिए लार टपका रहे थे। लेकिन 'स्त्री चाले' के सामने इनकी क्या बिसात? यदि अब राजा तुमसे पूछे कि 'स्त्री चाला' कहाँ है, तो कहना मेरी पत्नी ने तुम्हारे मुँह पर मिट्टी तो लीप दी, 'स्त्री चाला' और क्या होता है ?"
नैण की चतुराई पर नाई गद्गद हो उठा।

तुलसी दया ना छोड़िए जब तक घट में प्राण

हम बचपन से पढ़ते और सुनते आ रहे हैं ‍‍कि "दया धर्म का मूल है" सभी धर्मग्रंथों में दया पर ही अधिक जोर क्यों दिया गया है ? अगर हम दया नहीं कर सकते हैं तो हमारा यह मानव जीवन निरर्थक है, यह तो उसी प्रकार की बात हुई कि जन्म लिया, खाये-पिये, बड़े हुये, विवाह-शादी हुयीं, वंशवृद्धि कर परिवार को आगे बढ़ाया और कालांतर में जीवन यात्रा पूरी कर पहुंच गये अगली योनियों में।
ऐसा जीवन तो पशु-पक्षी भी जीते हैं, तो फिर हम इंसानों व पशु-पक्षियों में क्या अंतर रह जाता है ? छोटे बच्चे, भूखे बीमार, बिलखते बच्चे, बुजुर्ग असहाय वृद्ध-वृद्धा यह फेहरिस्त काफी लंबी है।
हे मनुष्य आत्माओं, तुम इन पर दया करो, तुम्हें भगवान् मिलेंगे, आपको ईश्वर की प्राप्ति के लिए दयालु बनना होगा। मन में दयाभाव व इंसानों के प्रति करुणा, विनम्रता व सहनशील रखना यह वाक्य हम सभी ने कई बार पढ़ा होगा।
सड़क से गुजरते हुये या काम पर जाते समय कोई बीमार या बुजुर्ग व्यक्ति इस तरह की लिफ्ट मांगते हैं और लोग हैं कि इनको नजरअंदाज कर निकल जाते हैं, यह बात विडंबना की ही कही जायेगी, अरे भाई, किसी बीमार या जरूरतमन्द व्यक्ति को अगर हम जाते हुये अपने वाहन पर बिठाकर उसके मुकाम या उसके नजदीकी ठिकाने तक ही छोड़ दें तो हमको उसकी जो दुआयें मिलेंगी, उसी दुआओं से हमारा मानव जीवन सार्थक हो जायेगा।
हमें अपार खुशी तो मिलेगी ही इस बात की कि आज मैंने अपनी जिंदगी में एक अच्‍छा काम किया, देखियेगा कि हमको ईश्वर-प्राप्ति की गर चाह है तो हमको अपने आचरण को थोड़ा-सा ही सही, लेकिन सुधारना जरूर होगा, ठीक है हमारे पास समय नहीं है तो आज के मोबाइल, ई-मेल व इंटरनेट के जमाने में भी हम दया को अर्पित कर सकते हैं, वो भी घर बैठे ही, वो कैसे ? 
ठीक है यदि हमारे पास अनाथालय, वृद्धाश्रम, महिला श्राविका आश्रम, महिला उद्धार गृह, कुष्ठ उद्धार गृह आदि जगहों पर जाने का समय नहीं है तो हम इन आश्रमों के फोन, मोबाइल या सोशल नेटवर्किंग पर संपर्क कर अपनी दान राशि भेंट कर सकते हैं। इन आश्रमों के कर्मचारी हमारे घर आकर दान राशि ले जायेंगे तथा हम पुण्य के भागी बन जायेंगे।
अगर हम किसी की एक छोटी-सी भी मदद करते हैं तो वह व्यक्ति कृतज्ञ भाव से हमारी ओर देखता है, तब हमको जो आत्मसंतोष मिलता है, उसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता है। कभी हम भूखे बच्चों को रोटी खिलाकर, फटेहाल व ठंड में ठिठुरते लोगों को वस्त्र पहनाकर, किसी सताई हुई नारी को यह दिलासा देते हुये कि बहन चिंता मत करो, हम आपके साथ है।
उसके सिर पर अगर हम हाथ रखेंगे तो भावुकतावश हमारी आँखों से भी इस बात को लेकर अश्रुधारा बह निकलेगी कि आज मैंने ज़िन्दगी में अच्‍छा काम किया है, जब ईश्वर के सामने हम अपने कर्मों का हिसाब-किताब देने हेतु खड़े होंगे तो बिलकुल निश्चिंत होंगे, क्योंकि हमारे मन में यह भाव लगा रहेगा कि मैंने अपनी जिंदगी में‍ किसी आत्मा को कभी कोई कष्ट नहीं पहुंचाया।
एक इंसान होने के नाते हर व्यक्ति को चाहिये कि वह कभी भी किसी को बुरा नहीं बोले और न ही कभी बुरा कर्म ही करें। अगर हम किसी को बुरा बोलते हैं तो उसके वायब्रेशन सारे वायुमंडल में फैल जाते हैं, यह अपने, सामने वाले के साथ ही वातावरण को भी प्रदूषित करते हैं। अत: सदैव मीठा बोलें, यही बात कर्म पर भी लागू होती है, हमारे कर्म जितने अच्छे होंगे, हम ईश्वर के उतने ही करीब होंगे।
ठीक है हमारे पास पैसे नहीं है, तो हम यह काम तो कर ही सकते हैं कि रास्ते में एक पत्थर पड़ा है, जो आते-जाते लोगों को लहूलुहान कर रहा है, कई लोग ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं, कई को गंभीर चोट लग भी सकती है या लगती भी है, तो हमें चाहिये कि वो पत्थर उस जगह से हटा कर एक तरफ रख दें। हमारे इस जरा-से कष्ट से कई लोगों को सुविधा हो जायेगी। अनजाने व खामोशी से किया गया यह कर्म हमको भी आत्मसंतुष्टि देगा व लोगों की दुआयें भी मिलेंगी।
कई चौराहों व रास्तों पर देखा गया है कि बच्चे, बुजुर्ग व महिलायें रास्ता पार करने हेतु ट्रैफिक रुकने का इंतजार कर रहे होते हैं किंतु ट्रैफिक है कि रुकने का ही नाम नहीं लेता। हम ऐसी स्थि‍ति में उनकी मदद के लिहाज से उनका हाथ पकड़कर रास्ता पार करा सकते हैं, यह भी बिना खर्च किये मुफ्त की एक अच्‍छी मानव-सेवा है।
मानव की सेवा माधव की सेवा के बराबर मानी गई है। हम चाहें चारों धाम की यात्रा करें लेकिन एक इंसान की सेवा अगर जरूरत के समय नहीं करते हैं तो चारों धाम की यात्रा का कोई फल मिलने वाला नहीं। खराब वचन और खराब कर्म करने के बाद भगवान् को जल, अर्घ्य व एक निस्वार्थ असहायों की सेवा करके हम अपने द्वारा किये गये पाप से बरी नहीं हो सकते।
क्योंकि कर्मों का फल तो हर व्यक्ति को भुगतना ही पड़ता है। इससे भगवान भी नहीं बच सके तो इंसान की क्या बिसात? अगर समाज से श्रेष्ठ कर्म यानी दया-भाव का खात्मा हो जाये तो यह बस्ती इंसानों की बस्ती न कहलाकर पशु-पक्षियों से भी गई-बीती बस्ती कहलायेगी। इंसान द्वारा इंसान से प्रेम किया जाना मनुष्यता की पहली पहचान है। इस प्रकार हम भी अधिक नहीं तो थोड़ी सी दया-भावना मन में रखकर पी‍ड़ित मानवता की सेवा कर इस उक्ति को सार्थक कर सकते हैं कि दया धर्म का मूल है।
सज्जनों, मानव सेवा माधव सेवा का जज्बा अपने आप में इतना कूट-कूट कर भर दो। अपने समाज में असहाय बच्चे, असहाय बीमार बुजुर्ग, या समाज की सताई हुई दुखियारी माँ-बहन, सबके प्रति मानव सेवा माधव सेवा' की भावना से कार्य करें। निश्चित रूप से हमको आत्मिय सुख की प्राप्ति होगी, बीमार, अपाहिज, विकलांग, भूखे, नेत्रहीन व कुष्ठ रोगी के प्रति जो करुणा व दया के भाव के साथ हम जीते हैं तो विश्वास करें कि हम भगवान् के निकट जा रहे हैं।
कई सज्जन लोगों में यह भावना कूट-कूट कर भरी हुई है,ऐसे संस्कारी लोगों ने कई असहायों को अपनाया है तथा उनकी सेवा कार्य जारी है,इस प्रकार हम दया-भाव रखकर पी‍ड़‍ित मानवता की सेवा कर सकते हैं तथा ईश्वर के काफी करीब पहुंच सकते हैं..!!

Saturday, May 9, 2026

आलसी-कछुवा

एक समय की बात है। एक बड़े तालाब के नजदीक एक कछुआ युवती निवास करती थी। उसके शरीर से बहुत बुरी गंध आती थी और उसका चेहरा भी बहुत बदसूरत था। वह बहुत मूर्ख भी थी। साथ ही वह उतनी ही आलसी और तमाम तरह की गंदी आदतों वाली थी। उसका नाम पाशांडी था।
वह जिस तालाब के नजदीक रहती थी उस तालाब का पानी बहुत साफ था। तारे और तमाम दूसरे ग्रह नक्षत्र इस निर्मल सरोवर के जल में अपनी परछाईं नित्य प्रति देखते रहते और उसकी सुंदरता पर मुग्ध रहते, जब सरोवर के जल में अनंत तारों का प्रकाश फैल जाता, टिमटिमाते तारे उसके निर्मल जल में अठखेलियाँ करते प्रतीत होते और वह सरोवर पृथ्वी पर आकाश का एक छोटा टुकड़ा सा प्रतीत होता। ऐसे समय में का पाशांडी को सरोवर में कूदकर नहाना, इधर से उधर तक अपने सिर को उठाए तैरना बहुत सुखकर प्रतीत होता। वह पानी में दूर तक तैरती और फिर वापस लौटती। तारों की परछाइयों के बीच आनंद से ओतप्रोत होकर उनसे विभिन्न प्रकार के खेल खेलती।
उस सरोवर में एक चमकीला तारा रोज अपनी परछाईं देखने आता और जल की निर्मलता में अपने रूप सौंदर्य को देखकर खुद अपने ऊपर मोहित सा रहता। उसका नाम निकुंज था। वह का पाशांडी को रोज जल में अठखेलियाँ करते हुए देखता। उसे आश्चर्य होता कि का पाशांडी उसकी परछाईं के साथ बहुत समय तक बड़े प्यार से खेलती रहती थी। वह आकाश में इतनी दूर था कि का पाशांडी की बदसूरती को नहीं देख सकता था और न ही उसे यह पता था कि वह कितनी आलसी और मूर्ख युवती है। उसे सिर्फ इतना ही पता था कि रात में वह बहुत खुलकर उसकी परछाईं के साथ बहुत प्यार से तमाम तरह के खेल खेलती है। यह देख कर उसे बहुत अच्छा लगता था। एक दिन उसने सोचा कि वह अगर उसकी परछाईं
पर इतनी मुग्ध है तो अगर वह वास्तव में उसे मिल जाए तो वह कितनी खुश होगी और उसे कितना अधिक प्रेम करेगी। यह सोच निकुंज मन-ही-मन का पाशांडी से प्रेम करने लगा। उसने निश्चय किया कि एक दिन वह उससे मिलने पृथ्वी पर अवश्य जाएगा और का पाशांडी से विवाह करेगा। जब उसके दोस्तों ने इस संबंध के बारे में सुना वे बुरी तरह परेशान हो गए। उन लोगों ने उसे समझाने की कोशिश की कि उसका निर्णय अत्यधिक खतरनाक है। किसी दूसरी भूमि पर जाना और वहाँ अपना घर बनाना तथा एक ऐसे व्यक्ति से संबंध स्थापित करना, जिसके बारे में वह कुछ नहीं जानता, किसी भी तरह उचित नहीं है। दूसरी भूमि के लोगों की आदतें और स्वभाव पूरी तरह अलग होते हैं, इसलिए उनके साथ सहज संबंध बनाना कतई आसान नहीं होता, परंतु निकुंज ने किसी की बात न मानी। सचमुच प्रेम में डूबे व्यक्ति को कुछ भी दिखाई नहीं देता, अतः एक दिन वह चमकीला तारा आकाश में अपने घर को छोड़ अपनी पूरी संपत्ति के साथ पृथ्वी पर का पाशांडी से मिलने उसके पास पहुँच गया। उसने अपनी पूरी संपत्ति का पाशांडी को अर्पित कर दी।
जब का पाशांडी को इसका अहसास हुआ कि अचानक वह इतनी अमीर हो गई है और दुनिया में सबसे अलौकिक व्यक्ति से उसका विवाह हुआ है तो उसका सिर गर्व से ऊँचा उठ गया। वह और भी अहंकार से भर उठी। उसकी अकर्मण्यता और आलस्य भी निरंतर बढ़ता गया, अब वह पहले से भी अधिक आलसी और सुस्त हो गई थी। उसका घर पूरी तरह गंदगी से भरा और अस्त-व्यस्त रहता तथा उसका शरीर भी कीचड़ से सना होता, फिर भी वह उन्हें साफ करने का कोई प्रयास न करती। उसे यह देखकर भी बिल्कुल शरम नहीं आती कि उसके पति को बहुत गंदे और टूटे-फूटे बरतनों में खाना मिलता है।
का पाशांडी के इस व्यवहार को देखकर निकुंज बहुत उदास और दुःखी हुआ, परंतु अत्यंत ध्यानपूर्वक वह अपनी पत्नी को समझाने का प्रयास करता रहा। उसे साफ सफाई से रहने और अपने व्यवहार में सुधार करने की प्रार्थना करता रहा, परंतु इन सबका का पाशांडी के ऊपर कोई असर नहीं पड़ा। वह दिन-ब-दिन और अधिक आलसी और आराम तलब होती गई। पैसे, धन-संपत्ति की अधिकता के कारण उसका अहंकार भी दिनों दिन और भी गहरा होता गया। ठीक ही कहा गया है कि किसी आलसी की आदत को सुधारना दुनिया में सबसे मुश्किल काम होता है।
अंत में परेशान होकर निकुंज ने उसे छोड़ देने की धमकी दी। उसके पड़ोसियों ने भी उसे समझाया कि वह अपनी आदतों में सुधार कर ले नहीं तो अगर उसके पति ने उसे छोड़ दिया तो उसकी स्थिति बहुत बुरी हो जाएगी, परंतु इतना होने के बावजूद भी का पाशांडी की आदतों में कोई बदलाव नहीं आया। अंत में पूरी तरह निराश हो जाने के बाद निकुंज अपनी सारी संपत्ति अपने साथ समेटकर वापस अपने घर आकाश में चला गया।
अब अचानक का पाशांडी को अपनी गलती का एहसास हुआ। पति के वापस चले जाने से वह दुःख और पीड़ा से भर उठी। उसे अपना जीवन तमाम तरह के अभाव से ग्रस्त और परेशानियों से भरा हुआ प्रतीत हुआ। वह आकाश की ओर जाते हुई अपने पति को गिड़गिड़ाकर पुकारने लगी कि बस एक बार वह वापस चला आए, अब वह अपनी आदतों में सुधार कर लेगी और जैसा वह कहेगा, वैसा ही व्यवहार करेगी, परंतु अब बहुत देर हो चुकी थी। उसका पति फिर वापस कभी नहीं आया और वह अकेले ही पीड़ा और शरम में डूबी अपना जीवन निर्वाह करती रही।
आज भी का पाशांडी इस उम्मीद में रहती है कि उसका पति वापस पृथ्वी पर लौटकर आएगा। वह आकाश की ओर अपनी गरदन उठाएँ, निरंतर उसी तरफ देखती रहती है। दुःख से भरी हुई, धीरे-धीरे चलती, वह एकटक आकाश की ओर देखती है और उसे लगता है कि उसका पति किसी भी क्षण वापस आ सकता है। इस घटना के बाद का पाशांडी का नाम उस पूरे क्षेत्र में अत्यंत घृणा के साथ लिया जाने लगा। लोग उसका मजाक उड़ाते और वह सब के लिए घृणा का पात्र बन गई। उसे मूर्खता और गंदगी का पर्याय माना जाने लगा। उसको लेकर तमाम तरह के मुहावरे और गीत बने और लोग आज भी आलसी और अकर्मण्य पत्नियों को चेतावनी देने के लिए उसका उदहारण देते हैं और उन मुहावरों का प्रयोग करते हैं, जो उसके अपमान में बने थे। समाज की परित्यक्त स्त्रियों को शिक्षा देने के लिए आज भी खासी समाज में का पाशांडी की कथा कही जाती है।

लंका का पुस्तकालय

लंका जलने के तीसरे दिन, जब राख अभी गर्म थी, विभीषण जी ने अशोक वाटिका के पीछे वाले गुप्त कक्ष का ताला खोला।
यह रावण का निजी पुस्तकालय था। सोने की दीवारें नहीं, ताड़पत्र थे। दस हज़ार से ज़्यादा। उन पर कोई राक्षसी मंत्र नहीं, सामवेद के स्वर, आयुर्वेद के सूत्र, नक्षत्र गणना, और वीणा के आलाप लिखे थे।
एक युवा राक्षस, मेघनाद का बेटा अक्षय नहीं, उसका शिष्य तरणि, ने पूछा, "महाराज विभीषण जी, सब कहते हैं दशानन अजेय थे क्योंकि ब्रह्माजी का वरदान था। क्या यही उनकी शक्ति का रहस्य था?"
विभीषण जी हँसे, पर हँसी में थकान थी। "वरदान कवच देता है, तलवार नहीं। भैया की शक्ति का रहस्य दस सिरों में नहीं था। वह दस सिरों में बँटा हुआ था।"
पहला सिर – सुनने वाला
रावण पैदा पुलस्त्य ऋषिदेव जी के कुल में हुआ, जन्म से ब्राह्मण था। दस साल की उम्र में उसने अपने पिता विश्रवा जी से पूछा, "पिताजी, राक्षस क्यों डरते हैं?" विश्रवा ने कहा, "क्योंकि वे सुनते नहीं।"
रावण ने तब पहला तप किया। वह हिमालय गया, कैलाश जी की छाया में बैठा, और शिव जी का तांडव नहीं, शिवजी का मौन सुना। सात साल तक उसने सिर्फ सुना। हवा, पानी, यक्षों की फुसफुसाहट, मरते हुए पशुओं की साँस।
जब वह लौटा, तो उसके पास पहला सिर था – श्रोता। वह किसी भी भाषा को एक बार में समझ लेता। देव, दानव, नाग, पशु। इसीलिए वह यम से युद्ध कर सका, क्योंकि यम के भैंसे की थकान की आवाज़ सुन ली थी।
लोगों ने कहा, "रावण को वरदान मिला।" सच यह था कि उसने सुनने की तपस्या की थी।
दूसरा सिर – गाने वाला
दूसरा रहस्य उसकी वीणा थी, रुद्र वीणा। रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए सिर काटे, यह कथा सब जानते हैं। पर वह सिर काटना बलि नहीं था, स्वर था।
हर बार जब वह अपना सिर चढ़ाता, तो नाड़ी से एक नया स्वर निकलता। नौ बार उसने किया। दसवें बार शिवजी ने हाथ पकड़ लिया। कहा, "बस कर। तूने मृत्यु को संगीत बना दिया।"
उस दिन से रावण के कंठ में वह शक्ति आई कि वह सामवेद को उल्टा गा सके। उल्टा सामवेद मृत्यु को रोकता नहीं, समय को धीमा करता है। इसीलिए लंका में घड़ी धीरे चलती थी। राक्षस सौ साल जवान रहते।
विभीषण जी ने एक ताड़पत्र उठाया। उस पर रागभैरव उल्टा लिखा था। "भैया इसे रोज़ भोर में गाते थे। कहते थे, शक्ति मारने में नहीं, ठहरने में है।
तीसरा सिर – गिनने वाला
रावण ज्योतिषी था, पर फलित नहीं, गणित। उसने लंका की नींव उस मुहूर्त में रखी जब शनि वक्री था। सबने कहा अपशकुन। उसने कहा, "वक्री ग्रह पीछे देखता है। जो पीछे देखे, वह गिरता नहीं।"
उसने नवग्रह को बंदी बनाया, यह भी आधा सच है। उसने उन्हें बंदी नहीं, बंधक बनाया। हर ग्रह से एक सूत्र लिया। मंगल से धातु विज्ञान, बुध से भाषा, शुक्र से संजीवनी का अधूरा सूत्र।
उसका दसवाँ सिर यही था – संग्रहकर्ता। वह जानता था कि ज्ञान बाँटने से घटता नहीं, पर रोकने से सड़ता है। उसने रोक लिया। लंका का पुस्तकालय दुनिया का सबसे बड़ा था, पर द्वार बंद था।

चौथा रहस्य – अहंकार नहीं, भय

तरणि ने पूछा, "फिर हारे क्यों?"
विभीषण जी ने राख पर हाथ फेरा। "क्योंकि उसने दस सिरों को एक साथ कभी नहीं सुना।"
रावण की असली शक्ति एकाग्रता थी। वह एक समय में एक ही सिर से सोचता। युद्ध में वह योद्धा, यज्ञ में ब्राह्मण, दरबार में राजा, वीणा पर कलाकार। पर जब सीता जी को लाया, तब पहली बार दसों सिर एक साथ बोले।
एक ने कहा, यह अधर्म है। दूसरे ने कहा, यह प्रतिशोध है। तीसरे ने कहा, यह प्रेम है। चौथे ने कहा, यह परीक्षा है। पाँचवें ने कहा, यह नियति है।
वह सुन नहीं पाया। उसने सुनना बंद कर दिया था। जिस दिन उसने श्रोता सिर को चुप कराया, उसी दिन शिवजी का दिया हुआ स्वर टूट गया।
लोग कहते हैं रामजी ने नाभि में बाण मारा। नाभि में अमृत था, यह भी कथा है। सच यह है कि नाभि वह जगह है जहाँ से आवाज़ निकलती है। रावण की नाभि में वह पहला स्वर बचा था जो उसने कैलाश पर सुना था। रामजी ने उसे नहीं मारा, उसे मुक्त किया।
बाण लगते ही रावण हँसा। विभीषण जी ने देखा था। अंतिम क्षण में दसों सिर एक साथ चुप हो गए, और पहली बार वह पूरा सुन पाया – अपने भीतर का मौन।उसने रामजी से कहा, "मुझे ब्राह्मण की तरह अग्नि देना।" वह वरदान नहीं माँग रहा था, वह याद दिला रहा था कि वह कौन था।

रहस्य का अंत
विभीषण जी ने ताड़पत्र समेटे और कहा, "भैया जी की शक्ति तप था, संगीत था, गणना थी। पर शक्ति का रहस्य यह नहीं कि तुम कितना इकट्ठा कर लो। रहस्य यह है कि तुम कितना छोड़ सको।"
"उसने देवताओं से अमरता माँगी, ब्रह्माजी ने कहा नहीं। उसने मनुष्य और वानर को छोड़ दिया, क्योंकि उसे लगा वे तुच्छ हैं। वही छूट उसे ले डूबी। शक्ति जब चुनती है कि किसे छोटा समझे, तभी वह अंधी हो जाती है।"
तरणि ने पूछा, "तो क्या रावण जी बुरे थे?
विभीषण जी ने उत्तर नहीं दिया। उसने वीणा उठाई, जो कोने में रखी थी। एक तार टूटा था। उसने उसे छेड़ा। बेसुरी आवाज़ निकली।
"बुरे नहीं, अधूरे थे। दस सिर होने का अर्थ दस बार सोचना नहीं, एक बार दसों को सुनना है। वह कभी नहीं कर पाये।बाहर लंका में नई सुबह हो रही थी। राख पर अंकुर फूट रहे थे। विभीषण जी ने पुस्तकालय का द्वार खोल दिया। पहली बार लंका के बच्चे अंदर आए, ताड़पत्र छुए, स्वर पढ़े।और तब, कहते हैं, हवा में कहीं दूर से रुद्र वीणा का उल्टा भैरव फिर बजा, पर इस बार धीमा नहीं, मुक्त। जैसे कोई बहुत पुराना श्रोता अंत में अपना ही गीत सुन रहा हो।

मैं हर जीव में उपस्थित हूँ

एक धनवान सेठ थे, जो श्री कृष्ण के परम भक्त थे। वे दिन-रात कान्हा का नाम जपते और प्रतिदिन स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर मंदिर में भोग लगाने जाते।
परंतु उनके साथ एक विचित्र बात होती—जैसे ही वे रास्ते में चलते, उन्हें नींद आ जाती और जब आँख खुलती तो सारे पकवान गायब मिलते। यह देखकर वे बहुत दुखी होते और कान्हा से शिकायत करते—
“प्रभु! मैं आपके लिए भोग बनाता हूँ, फिर भी आपको अर्पित क्यों नहीं कर पाता?”
तब कान्हा मुस्कुराकर कहते—
“वत्स, हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है। जो मेरे भाग्य में होगा, वही मेरे पास आएगा।”
सेठ को यह बात समझ नहीं आई। उन्होंने दृढ़ निश्चय किया—
“प्रभु! कल मैं आपको भोग लगाकर ही रहूँगा।”
अगले दिन वे सुबह-सुबह उठे, स्नान किया और अपनी पत्नी से अनेक प्रकार के स्वादिष्ट पकवान बनवाए। चार डिब्बों में भरकर वे मंदिर के लिए निकल पड़े और मन ही मन सोचते रहे—
“आज चाहे कुछ भी हो जाए, मैं सोऊँगा नहीं।”
रास्ते में उन्हें एक भूखा, दुबला-पतला छोटा बच्चा मिला, जो हाथ फैलाकर भोजन माँग रहा था। सेठ का हृदय पिघल गया और उन्होंने उसे एक लड्डू दे दिया।
जैसे ही बच्चे को लड्डू मिला, वहाँ कई और भूखे बच्चे आ गए। उनकी हालत देखकर सेठ से रहा नहीं गया, और उन्होंने सबको भोजन बाँटना शुरू कर दिया। देखते ही देखते सारे पकवान बच्चों में बाँट दिए गए।
तभी उन्हें याद आया—
“अरे! आज तो मैंने कान्हा को भोग लगाने का वचन दिया था…”
थोड़े उदास मन से वे मंदिर पहुँचे और श्रीकृष्ण के सामने बैठ गए। तभी कान्हा प्रकट हुए और प्रेम से बोले—
“जल्दी लाओ मेरा भोग, मुझे बहुत भूख लगी है!”
सेठ ने संकोच से सारी बात बता दी।
कान्हा मुस्कुराए और बोले—
“मैंने पहले ही कहा था—हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है। जिनके नाम थे, उन्होंने खा लिया। तुम व्यर्थ चिंता क्यों करते हो?”
फिर कान्हा सेठ को अपने साथ उन बच्चों के पास ले गए।
सेठ ने देखा—उन भूखे बच्चों के बीच स्वयं कृष्ण विभिन्न रूपों में भोजन करते हुए दिखाई दे रहे हैं। यह दृश्य देखकर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
कान्हा बोले—
“मैं हर जीव में उपस्थित हूँ। जब तुमने उन बच्चों को खिलाया, तब वास्तव में तुमने मुझे ही भोग लगाया। मैं अलग-अलग रूपों में, अलग-अलग स्थानों पर वही स्वीकार करता हूँ जो मेरे भाग्य में होता है।”
यह सुनकर सेठ भाव-विभोर होकर प्रभु के चरणों में गिर पड़े और बोले—
“प्रभु, आपकी लीला अपरंपार है।”
कान्हा हँसते हुए बोले—
“कल फिर भोग बनाना… और इस बार भी मुझे ही देना!”
सेठ और भगवान दोनों मुस्कुरा उठे।

Thursday, May 7, 2026

चिड़िया की परेशानी

घने जंगल में एक अनोखी चिड़िया रहती थी, जिसका नाम था कैसोवैरी। वह दिखने में तो चिड़िया थी, पर बाकी चिड़ियों की तरह उड़ नहीं सकती थी। उसके पंख छोटे और शरीर भारी था, इसलिए वह अधिकतर जमीन पर ही रहती थी। बचपन से ही दूसरी चिड़ियों के बच्चे उसे देखकर मज़ाक उड़ाते थे।
कोई कहता, “अरे, जब तू उड़ ही नहीं सकती तो चिड़िया किस काम की?”
कोई पेड़ की ऊँची डाल पर बैठकर चिल्लाता, “कभी हमारे पास भी आ जाया कर… हर समय जानवरों की तरह नीचे ही घूमती रहती है!”
इतना कहकर सब जोर-जोर से हँसने लगते। शुरू-शुरू में कैसोवैरी इन बातों को अनदेखा कर देती थी। वह सोचती थी कि शायद एक दिन सब उसे समझेंगे। लेकिन रोज़-रोज़ के तानों और मज़ाक ने धीरे-धीरे उसके दिल को दुखी कर दिया।
एक दिन वह बहुत उदास होकर एक पेड़ के नीचे बैठ गई। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने आसमान की ओर देखते हुए कहा,
“हे ईश्वर! आपने मुझे चिड़िया क्यों बनाया? और अगर बनाया तो मुझे उड़ने की शक्ति क्यों नहीं दी? देखिए, सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं। अब मैं इस जंगल में एक पल भी नहीं रहना चाहती। मैं इस जगह को हमेशा के लिए छोड़कर जा रही हूँ।”
यह कहकर कैसोवैरी धीरे-धीरे जंगल से बाहर जाने लगी। वह कुछ ही दूर पहुँची थी कि पीछे से एक भारी आवाज़ सुनाई दी—
“रुको कैसोवैरी! तुम कहाँ जा रही हो?”
कैसोवैरी ने आश्चर्य से पीछे मुड़कर देखा। सामने एक बड़ा-सा जामुन का पेड़ खड़ा था। वही उससे बात कर रहा था।
पेड़ ने प्यार से कहा,
“कृपया तुम यहाँ से मत जाओ। हमें तुम्हारी बहुत ज़रूरत है। पूरे जंगल में पेड़-पौधों के फलने-फूलने में तुम्हारा बहुत बड़ा योगदान है। तुम अपनी मजबूत चोंच से फलों को खाती हो और उनके बीज पूरे जंगल में बिखेर देती हो। उन्हीं बीजों से नए पेड़ उगते हैं और जंगल हरा-भरा बना रहता है।”
पेड़ ने आगे कहा,
“हो सकता है बाकी चिड़ियों के लिए तुम्हारा कोई महत्व न हो, लेकिन हमारे लिए तुम बहुत महत्वपूर्ण हो। तुम जैसी चिड़िया इस जंगल में और कोई नहीं है। तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता। इसलिए कृपया हमें छोड़कर मत जाओ।”
पेड़ की बातें सुनकर कैसोवैरी की आँखों में चमक आ गई। उसे पहली बार महसूस हुआ कि वह इस दुनिया में बेकार नहीं है। भगवान ने उसे भी एक खास काम के लिए बनाया है। सिर्फ उड़ नहीं पाने से वह किसी से कम नहीं हो जाती है 
अब उसका मन हल्का और खुश हो गया। उसने सोचा कि दूसरों की बातों से दुखी होना ठीक नहीं। हर किसी के अंदर कोई न कोई खास गुण होता है।
कैसोवैरी मुस्कुराई और खुशी-खुशी वापस जंगल की ओर लौट गई। अब वह पहले की तरह उदास नहीं थी। उसे अपने अस्तित्व और अपने महत्व का एहसास हो चुका था।
शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी दूसरों से अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए। हर इंसान अपने आप में अनोखा और खास होता है। भगवान ने हर किसी को किसी न किसी विशेष उद्देश्य के लिए बनाया है। इसलिए हमें अपने गुणों को पहचानना चाहिए और सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीना चाहिए।