एक समय स्वर्गलोक में एक चर्चा उठी। प्रश्न था कि तीनों लोकों में सबसे महान पतिव्रता नारी कौन है? देवताओं, ऋषियों और सिद्धों के बीच अनेक नाम लिए गए, लेकिन अंत में जब निर्णय देने का समय आया तो स्वयं ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव ने एक ही नाम लिया—माता अनुसूया। उन्होंने कहा कि संसार में यदि कोई स्त्री अपने पतिव्रत, तप, सेवा, करुणा और निष्काम प्रेम के कारण सबसे श्रेष्ठ है, तो वह महर्षि अत्रि की पत्नी माता अनुसूया हैं। यह सुनते ही स्वर्ग का वातावरण बदल गया। माता सरस्वती, माता लक्ष्मी और माता पार्वती के मन में आश्चर्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने सोचा कि आखिर ऐसी कौन-सी विशेषता है जो माता अनुसूया को सबसे महान बनाती है। धीरे-धीरे यह आश्चर्य एक जिज्ञासा में और जिज्ञासा एक परीक्षा की इच्छा में बदल गया।
देवियों ने त्रिदेवों से आग्रह किया कि यदि माता अनुसूया वास्तव में इतनी महान हैं, तो उनकी परीक्षा अवश्य ली जानी चाहिए। पहले तो त्रिदेव इस बात के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने कहा कि सच्चे भक्त की परीक्षा लेना उचित नहीं होता। लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि अंततः उन्होंने माता अनुसूया की भक्ति और पतिव्रत की परीक्षा लेने का निश्चय किया। तीनों ने अपने दिव्य स्वरूप को त्यागकर साधुओं का वेश धारण किया और पृथ्वी पर महर्षि अत्रि के आश्रम की ओर चल पड़े।
उस समय महर्षि अत्रि किसी कार्य से आश्रम से बाहर गए हुए थे। आश्रम में केवल माता अनुसूया थीं। उनका जीवन अत्यंत सरल था। हर प्राणी की सेवा करना, अतिथियों का सत्कार करना, तप और भगवान का स्मरण करना ही उनका दैनिक नियम था। जब तीनों साधु आश्रम पहुंचे तो माता अनुसूया ने उनका अत्यंत आदरपूर्वक स्वागत किया। उन्होंने उनके चरण धोए, आसन दिया और विनम्रता से कहा, "महात्माओं, कृपया भोजन ग्रहण कीजिए। अतिथि मेरे लिए देवतुल्य हैं।"
तीनों साधुओं ने एक-दूसरे की ओर देखा और बोले, "हम भोजन अवश्य करेंगे, लेकिन हमारी एक शर्त है। तुम्हें निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देनी होगी।" यह सुनते ही माता अनुसूया क्षणभर के लिए मौन हो गईं। उनके सामने एक भयंकर धर्मसंकट खड़ा हो गया। एक ओर अतिथि धर्म था, जिसे निभाना उनका कर्तव्य था। दूसरी ओर पतिव्रत धर्म था, जिसकी रक्षा उनके जीवन का सबसे बड़ा व्रत था। सामान्य बुद्धि से इस संकट का कोई समाधान संभव नहीं था।
लेकिन माता अनुसूया विचलित नहीं हुईं। उन्होंने आंखें बंद कीं, अपने पति महर्षि अत्रि का स्मरण किया और मन ही मन भगवान से प्रार्थना की—"यदि मेरा पतिव्रत निष्कलंक है, यदि मैंने कभी अपने धर्म से विचलित होकर कोई कार्य नहीं किया, तो सत्य स्वयं मेरी रक्षा करे।" जैसे ही उन्होंने अपने कमंडलु का पवित्र जल तीनों साधुओं पर छिड़का, उसी क्षण एक अद्भुत चमत्कार हुआ। देखते ही देखते तीनों साधु छह महीने के छोटे-छोटे शिशु बन गए। उनके तेजस्वी शरीर अब मासूम बालकों के रूप में बदल चुके थे।
माता अनुसूया के हृदय में मातृत्व उमड़ पड़ा। उन्होंने उन तीनों शिशुओं को अपनी गोद में उठा लिया। उन्हें प्रेमपूर्वक भोजन कराया, झूले में सुलाया और अपने ही पुत्रों की तरह उनका पालन करने लगीं। पृथ्वी पर माता अनुसूया ने अपना धर्म निभा दिया, लेकिन उसी समय स्वर्गलोक में चिंता फैल गई। ब्रह्मा, विष्णु और महेश अपने-अपने लोकों में दिखाई नहीं दे रहे थे। देवताओं में हड़कंप मच गया। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि सृष्टि के तीनों आधार अचानक कहां लुप्त हो गए।
इसी बीच देवर्षि नारद वहां पहुंचे। उन्होंने ध्यान लगाकर सारी घटना देखी और देवताओं के साथ तीनों देवियों को बताया कि त्रिदेव किसी युद्ध में नहीं हारे, बल्कि माता अनुसूया के निष्कलंक पतिव्रत और तप की शक्ति से शिशु बन गए हैं। यह सुनते ही माता लक्ष्मी, माता पार्वती और माता सरस्वती को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने अहंकारवश एक महान साध्वी की परीक्षा लेने का प्रयास किया था।
तीनों देवियां तुरंत पृथ्वी पर माता अनुसूया के आश्रम पहुंचीं। वहां उन्होंने तीनों दिव्य शिशुओं को माता अनुसूया की गोद में खेलते देखा। लेकिन वे यह पहचान ही नहीं सकीं कि उनमें ब्रह्मा कौन हैं, विष्णु कौन हैं और शिव कौन हैं। तीनों के चेहरे पर समान तेज था। यह देखकर उनका अहंकार पूरी तरह समाप्त हो गया। वे माता अनुसूया के चरणों में गिर पड़ीं और विनम्र स्वर में बोलीं, "माता, हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई। कृपया हमें क्षमा कर दीजिए और हमारे पतियों को उनका वास्तविक स्वरूप लौटा दीजिए।"
माता अनुसूया के हृदय में किसी के प्रति राग या द्वेष नहीं था। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "जहां सच्चा पश्चाताप हो, वहां क्षमा देने में कभी देर नहीं करनी चाहिए।" उन्होंने पुनः अपने तप का संकल्प किया और दिव्य प्रार्थना की। अगले ही क्षण वे तीनों शिशु अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गए। ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वयं माता अनुसूया के सामने हाथ जोड़कर खड़े थे। त्रिदेव बोले, "माता, आज आपने सिद्ध कर दिया कि सच्ची भक्ति, निष्काम सेवा और पतिव्रत की शक्ति के सामने स्वयं देवता भी नतमस्तक हो जाते हैं।"
त्रिदेव माता अनुसूया से अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, "माता, कोई वरदान मांगिए।" माता अनुसूया ने विनम्र स्वर में उत्तर दिया, "प्रभुओं, मुझे किसी धन, वैभव, राज्य या शक्ति की इच्छा नहीं है। आपके दर्शन ही मेरे लिए सबसे बड़ा वरदान हैं।" माता की निष्काम भावना देखकर त्रिदेव और भी अधिक प्रसन्न हो गए। उन्होंने कहा, "तुमने कुछ नहीं मांगा, इसलिए हम स्वयं तुम्हें सबसे महान वरदान देते हैं। हम अपने-अपने दिव्य अंश से तुम्हारे पुत्र रूप में अवतार लेंगे।"
भगवान विष्णु के अंश से भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ, जो योग, ज्ञान और करुणा के प्रतीक बने। भगवान शिव के अंश से महर्षि दुर्वासा प्रकट हुए, जिनका तप और सत्य के प्रति संकल्प अद्वितीय था। ब्रह्मा के अंश से चंद्रदेव का अवतार हुआ, जो शीतलता, संतुलन और सौम्यता के प्रतीक बने। उसी समय महर्षि अत्रि भी आश्रम लौट आए। उन्होंने स्वयं त्रिदेवों के दर्शन किए और समझ गए कि आज उनके आश्रम में कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि युगों तक स्मरण की जाने वाली दिव्य लीला घटित हुई है।
त्रिदेवों ने महर्षि अत्रि और माता अनुसूया को आशीर्वाद देते हुए कहा, "जब तक इस सृष्टि में धर्म, सत्य और भक्ति का प्रकाश रहेगा, तब तक तुम्हारा यश अमर रहेगा। लोग तुम्हारा स्मरण श्रद्धा, पतिव्रत और निष्काम सेवा के सर्वोच्च आदर्श के रूप में करेंगे।" उस दिन देवियों ने भी यह स्वीकार किया कि महानता सौंदर्य, वैभव या शक्ति से नहीं, बल्कि विनम्रता, सेवा, प्रेम और निष्कलंक चरित्र से प्राप्त होती है।