नथिया बाई माता-पिता की लाड़ली,भाग्य की परीक्षा की धधकती अग्नि में तपने वाली एक साध्वी आत्मा। विवाह के कुछ ही समय बाद सुहाग छिन गया और घाव भरा भी नहीं था कि इकलौता भाई भी चला गया। जहाँ कोई भी स्त्री टूट जाती वहाँ नथिया बाई ने आँसुओं को हार नहीं, भक्ति का अभिषेक बना दिया। उनकी दुनिया सिमट गई संतों की सेवा, ठाकुर जी की भक्ति और राधे-राधे का जाप। लेकिन परीक्षा यहीं खत्म नहीं हुई चचेरे भाई ने संत सेवा पर रोक लगा दी। ये रोक उनके लिए सांस रुकने जैसी थी।
तब वो रोती हुई पहुँचीं बिहारी जी के चरणों में हे सांवरिया! अगर मेरी सेवा सच्ची है तो रास्ता तुम दिखाओ।,तुम्हारे बिना मेरा कोई नहीं! और सच में पुकार सुन ली गई।
मोह-माया की जंजीरें टूटीं, और नथिया बाई चल पड़ीं वृंदावन की ओर। ना धन, ना सहारा बस भरोसा मेरे बिहारी मेरे साथ हैं।जंगल और शहर की सीमा पर उन्होंने दीन-दुखियों और संतों की सेवा शुरू कर दी। वो सेवा नहीं करती थीं वो प्रेम लुटाती थीं।
फिर आया रक्षाबंधन भाई की कमी ने हृदय भिगो दिया। सीधे बाँके बिहारी के दरबार पहुँचीं और राखी बाँध दी जगत के स्वामी को! उस दिन से बिहारी जी सिर्फ आराध्य नहीं उनके “भैया” बन गए।
कहते हैं जब भक्त पूरी तरह प्रभु पर निर्भर हो जाता है तब उसकी चिंता खुद नारायण करते हैं। एक दिन संतों को खिलाने के लिए घर में एक दाना भी न बचा आँखें भर आईं आज संत भूखे रहेंगे तभी एक अनजान सेठ आया, गेहूं देकर बोला, इसे पिसवा देना।नथिया बाई ने चक्की घुमाई राधे-राधे जपते हुए और फिर जो हुआ, उसने इतिहास लिख दिया:
चक्की से आटे के साथ सोने के कण झड़ने लगे! ये चमत्कार नहीं बिहारी जी की मुहर थी। मेरे भक्त के भंडारे कभी खाली नहीं रहेंगे। नथिया बाई की भक्ति ऐसी थी कि वो प्रभु से बातें करती थीं, उन्हें दुलारती थीं।और सांवरिया भी कई बार साक्षात् दर्शन देते थे। आज भी वृंदावन के टटीया स्थान पर उनकी स्मृति जीवंत है। वहाँ की संत सेवा हमें याद दिलाती है सच्ची श्रद्धा पत्थर से भी सोना निकाल सकती है। भगवान मूर्ति में ही नहीं, सेवा करते हर हाथ में बसते हैं।
नथिया बाई की कथा एक संदेश है- जब संसार साथ छोड़ दे तो डरना मत क्योंकि उसी मोड़ पर बिहारी जी खुद भैया” बनकर हाथ थाम लेते हैं।