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Monday, August 3, 2026

गजासुर

श्री गणेश को गजासुर का ही शीश क्यों लगा? जानिए यह अद्भुत पौराणिक कथा! 
गज (हाथी) और असुर के संयोग से जन्मे 'गजासुर' भगवान शिव के परम भक्त थे। महादेव की आराधना के बिना वे अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। उनकी इसी अनन्य भक्ति ने उन्हें वह अकल्पनीय सम्मान दिलाया, जिसे आज पूरी दुनिया पूजती है।
महादेव का अनोखा वरदान
गजासुर की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे मनचाहा वरदान मांगने को कहा। गजासुर ने कहा, "प्रभु! आप कैलाश छोड़कर मेरे उदर (पेट) में ही निवास करें।" भोले भंडारी तो ठहरे भक्तों के अधीन, वे तुरंत गजासुर के पेट में समा गए। जब माता पार्वती को शिवजी कहीं नहीं मिले, तो उन्होंने भगवान विष्णु से सहायता मांगी।
श्रीहरि की अद्भुत लीला
श्रीहरि ने शिवजी को मुक्त कराने के लिए एक लीला रची। वे एक चरवाहे का भेष धारण कर मनमोहक बांसुरी बजाने लगे और उनके साथ सजे-धजे नंदी ने गजासुर के सामने अद्भुत नृत्य किया। गजासुर इस कला से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने अपनी सुध-बुध खोकर चरवाहे (विष्णु जी) को मुँहमांगा वरदान देने का वचन दे दिया। श्रीहरि ने तुरंत शिवजी को उसके उदर से मुक्त करने का वरदान मांग लिया।
 गजासुर की अंतिम इच्छा
गजासुर अपने वचन से पीछे नहीं हटा। वह समझ गया कि ये स्वयं नारायण हैं। उसने शिवजी को मुक्त किया और एक भावुक मांग रखी— "प्रभु! मेरे शरीर से आपके जाने के बाद जीवन का कोई मोल नहीं रहा। मुझे ऐसा वरदान दें कि मेरे शरीर का कोई अंश हमेशा आपके साथ पूजित हो।"
तब श्रीहरि ने उसे आशीर्वाद दिया कि समय आने पर उसे अकल्पनीय सम्मान मिलेगा।
प्रथम आराध्य बनने का सौभाग्य
कालान्तर में, जब भगवान गणेश का शीश धड़ से अलग हुआ, तब भगवान विष्णु इसी शिवभक्त गजासुर का शीश काटकर लाए थे और उसे गणपति के धड़ से जोड़ दिया था। इस तरह अपनी निस्वार्थ भक्ति के कारण गजासुर, शिवजी के प्रिय पुत्र के रूप में संसार में प्रथम आराध्य हो गए!