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Monday, December 29, 2025

देवी वेदवती

पुराणों के अनुसार, सतयुग में एक परम तेजस्वी राजा हुए जिनका नाम कुशध्वज था (जो देवगुरु बृहस्पति के पुत्र थे)। उनकी पत्नी मालावती थीं। कठोर तप के बाद उन्हें एक ऐसी कन्या की प्राप्ति हुई, जो साक्षात देवी लक्ष्मी का अंश थीं।जन्म लेते ही इस कन्या के मुख से वेदों का उच्चारण होने लगा, इसी कारण इनका नाम 'वेदवती' पड़ा।वेदवती न केवल अत्यंत रूपवती थीं, बल्कि जन्म से ही वैराग्य और भक्ति में लीन रहती थीं।उनका संकल्प था कि वे त्रिभुवन पति भगवान विष्णु को ही अपने पति के रूप में स्वीकार करेंगी।

कठोर तप और भगवान विष्णु का वचन
अपने संकल्प को पूरा करने के लिए वेदवती ने राजमहल का सुख त्याग दिया और गंधमादन पर्वत पर जाकर घोर तपस्या में लीन हो गईं। उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि एक दिन आकाशवाणी हुई— हे देवी! अगले जन्म में आपको भगवान विष्णु पति रूप में अवश्य प्राप्त होंगे।
किंतु वेदवती ने अपना तप नहीं छोड़ा। अंततः उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रभु नारायण प्रकट हुए और उन्होंने वचन दिया कि, इस जन्म में यह संभव नहीं, परंतु अगले जन्म में जब मैं राम अवतार लूंगा, तब तुम मेरी अर्धांगिनी बनोगी।एक दिन जब वेदवती वन में एकांत में भगवान का ध्यान कर रही थीं, तभी वहां से लंकापति रावण अपने पुष्पक विमान से गुजर रहा था। वेदवती के अलौकिक सौंदर्य और तेज को देखकर रावण अपनी सुध-बुध खो बैठा। कामांध होकर उसने वेदवती के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा।वेदवती ने विनम्रतापूर्वक उसे बताया कि वे भगवान विष्णु की अमानत हैं, लेकिन अहंकारी रावण ने उनकी एक न सुनी। जब उसने वेदवती के साथ बलप्रयोग करने की कोशिश की और उनके केश (बाल) पकड़ लिए, तो वेदवती का क्रोध प्रलयंकारी हो गया।

वेदवती का महाश्राप
अपने तपोबल से वेदवती ने रावण को वहीं जड़वत (स्थिर) कर दिया। रावण का स्पर्श होते ही उन्होंने अपनी देह त्यागने का निर्णय लिया और रावण को वह ऐतिहासिक श्राप दिया जिसने रामायण की रचना की:
दुष्ट! तूने वन में तपस्विनी के साथ अमर्यादित आचरण किया है और मेरे केश पकड़े हैं। अब मैं तेरे सामने ही इस देह का त्याग करती हूं। लेकिन याद रखना, तेरे विनाश के लिए मैं फिर जन्म लूंगी। मैं अयोनिजा (बिना गर्भ के) प्रकट होउंगी और वही मेरा जन्म तेरे और तेरे कुल के सर्वनाश का कारण बनेगा।
यह कहकर वेदवती ने अपनी योग-अग्नि से स्वयं को भस्म कर लिया।वेदवती का वही श्राप त्रेतायुग में सत्य हुआ।
पुनर्जन्म: वेदवती ही बाद में राजा जनक के हल चलाने पर पृथ्वी से 'सीता' के रूप में प्रकट हुईं।
रावण का वध: जिस सीता (वेदवती का स्वरूप) पर रावण ने कुदृष्टि डाली, वही उसके कुल के विनाश का कारण बनीं।
 छाया सीता का रहस्य: कुछ पुराणों (जैसे ब्रह्मवैवर्त पुराण) में यह भी वर्णित है कि वास्तविक सीता का हरण रावण कर ही नहीं सकता था। इसलिए, वनवास के दौरान अग्निदेव की सहायता से 'छाया सीता' (माया सीता) का निर्माण हुआ। रावण ने इसी छाया सीता (जो वेदवती का ही अंश थीं) का हरण किया था।
जब रावण का वध हो गया और सीता जी की अग्नि परीक्षा हुई, तो वह अग्नि परीक्षा वास्तव में छाया सीता (वेदवती) को अग्नि को समर्पित करने और वास्तविक सीता को पुनः प्राप्त करने की लीला थी। इस प्रकार, वेदवती ने अपना बदला पूरा किया और भगवान विष्णु (श्री राम) के चरणों में स्थान प्राप्त किया।

सीख: रावण का बल और ज्ञान उसे बचा नहीं सका क्योंकि स्त्री का अपमान ही उसके पतन का कारण बना। नियति अपना खेल पहले ही रच चुकी थी।