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Friday, December 26, 2025

कन्हैया की माखन-मित्र लीला


(जब पाँच वर्ष के नन्हें कृष्ण ने पक्षियों और बंदरों को माखन भेंट किया)

गोकुल की भोर उस दिन कुछ अलग ही थी।
यमुना की लहरें हल्की गुलाबी आभा से चमक रही थीं और सूरज की पहली किरण नंदभवन की खिड़कियों को स्वर्ण-सी ज्योति से नहला रही थी।
इसी खिड़की पर, एक छोटी-सी मूर्त्ति-से प्यारे बालक बैठे थे—
हमारे पाँच वर्ष के नन्हें कन्हैया!
घुँघराले बाल, माथे पर चंद्र-सी तिलकमाला, और गोरी-गुलाबी मुस्कान।
उनकी गोद में थी—एक बड़ी-सी माखन की मटकी,
जिसे यशोदा माँ ने छुपाकर रखा था… पर कन्हैया तो सब जानते थे—माखन का ठिकाना, दुनिया का सबसे बड़ा रहस्य!

पक्षियों का आगमन
कन्हैया ने मटकी से एक मुट्ठी माखन निकाला और खिड़की पर रखा।
तभी फुदकते हुए नीले पंखों वाले चिड़ियाँ, मैना, गौरैया, लाल टिटहरी—एक-एक करके आने लगीं।
कृष्ण ने हँसते हुए कहा—
“आओ रे मेरे नन्हे साथी! ये माखन सिर्फ मेरे लिए नहीं है… श्रीहरि का भोजन कोई अकेले खाए भला?”
पक्षियों ने चहचहाकर उत्तर दिया, जैसे कह रहे हों—
“कन्हैया! हम तो बस तुम्हारी झलक भर से तृप्त हो जाते हैं।”
कन्हैया ने उन्हें अपने छोटे-छोटे हाथों से माखन खिलाया।
जो चिड़ियाँ डरती थीं, उन्हें वे उंगली से पास बुलाते—
“डर मत, मैं तो तुम्हारा कान्हा हूँ।”

बंदरों का माखन-प्रसाद
थोड़ी देर बाद पेड़ की टहनी से एक समूह बंदर कूदता हुआ आया।
वे माखन की सुगंध दूर से ही पहचान लेते थे।
कन्हैया ने हँसकर कहा—
“लो, तुम लोग भी आ गए! पर झगड़ा मत करना, सबको मिलेगा!”
एक छोटा बंदर ज़रा पास आने में झिझक रहा था।
कृष्ण ने मटकी आगे बढ़ाकर कहा—
“तू सबसे छोटा है न? पहले तुझे दूँगा।”
छोटे बंदर ने कन्हैया का हाथ पकड़कर माखन को नन्हीं आँखों से देखा—
और उसने जैसे ही पहला निवाला लिया, उसके चेहरे पर शुद्ध प्रेम की चमक फैल गई।

ब्रजवासियों की विस्मय-भरी दृष्टी
कुछ ग्वालिनें यह दृश्य देखकर रुक गईं।
एक बोली—
“अरे, हम सोचते थे यह माखन चोर है… पर यह तो संसार का दाता है!”
दूसरी ने कहा—
“जो स्वयं ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं, वे क्या चुराएँगे?
वे तो अपने हाथों से बाँटने आए हैं।”
नंदभवन के बाहर यह प्रेम लीला देखकर सबका हृदय पिघल रहा था।

कन्हैया की अद्वितीय शिक्षा
जब सभी पक्षी और बंदर तृप्त हो गए,
कन्हैया ने माखन की मटकी को हल्का-सा झुकाया और बचे हुए माखन को अपनी हथेलियों पर लगाया।
मुस्कुराकर बोले—
“यशोदा माँ सोचती हैं कि मैं माखन चुराकर खाता हूँ…
पर माँ को कैसे बताऊँ कि ये माखन मैं अपने परिवार को—
पक्षियों को, बंदरों को, गोकुल के जीवों को खिलाता हूँ…
क्योंकि ये सब मेरे अपने हैं।”
उनकी आँखों में करुणा और प्रेम की दिव्यता चमक उठी।

लीला का फल
उस सुबह के बाद,
पक्षी जब भी उड़ते, कन्हैया की खिड़की पर बैठते।
बंदर दरबार लगाते।
और यशोदा माँ आश्चर्य करतीं—
“ये माखन जल्दी क्यों खत्म हो जाता है?”
कन्हैया बस मुस्कुराते हुए कहते—
“माँ! माखन जितना बाँटो उतना बढ़ता है…
जैसे प्रेम बढ़ता है।”
और उस दिन से, गोकुल में यह कथा गूंजने लगी—
“जिसका दिल ब्रह्मांड से बड़ा हो,
उसके घर की मटकी कभी खाली नहीं होती।”