एक दिन सुबह के वक्त, जब वो अपने छोटे से खेत में गया, तो उसकी निगाह एक हरे-भरे पौधे पर पड़ी। हैरानी की बात ये थी कि उसने वहां कुछ बोया ही नहीं था, लेकिन लौकी का पौधा लहलहा रहा था। और उस पर तीन मोटी-ताज़ी लौकियाँ लगी थीं—साफ़, चमकती हुई, मानो खुद कुदरत ने उसे एक तोहफा भेजा हो।
उसने खुशी-खुशी तीनों लौकियाँ तोड़ीं, घर लौटते हुए बच्चों से कहा, "अगर ये बिक गईं, तो मिठाई लाऊंगा।" घरवालों की आंखों में एक उम्मीद सी चमक उठी।
गाँव के हाट में पहुंचकर बृजलाल एक किनारे बैठ गया। भीड़-भाड़ से दूर, सिर पर पुरानी टोपली लगाए, आँखों में एक भोलापन लिए वो राहगीरों की तरफ उम्मीद से देखता रहा।
तभी गाँव के प्रधान जी आये। भारी मूँछें, सीना फुलाया हुआ, और साथ में दो चमचों की टोली। उन्होंने एक लौकी उठाई और बोले, "बृजलाल, बाद में पैसे दे दूंगा।" किसान ने कुछ कहने की कोशिश की, पर शब्द गले में अटक गए। प्रधान चलते बने।
कुछ देर बाद थाने का मुंशी रामदयाल आया। बिना कुछ पूछे दूसरी लौकी उठाई और बोले, "कितनी बढ़िया माल है, भई वाह!" और मुस्कुराते हुए चल दिया।
अब बस एक लौकी बची थी। बृजलाल का मन घबरा रहा था। वह आसमान की तरफ देखकर बुदबुदाया, "हे भगवान, कम से कम ये बचा ले।"
तभी सामने से दरोगा रघुनाथ सिंह आते दिखाई दिए—ऊँचा कद, मूंछें तनी हुईं, आँखों में तेज और चेहरे पर कठोर पर सच्ची इंसानियत का भाव।
उन्होंने रुककर पूछा, “किसके लिए बैठा है लौकी लेकर?”
बृजलाल हकलाते हुए बोला, “मालिक… दो तो ले गए… ये बची है, आप चाहें तो ले जाइए…”
दरोगा ने गौर से देखा। कुछ समझ में आया। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “बताओ, क्या हुआ?”
किसान ने धीरे-धीरे पूरा हाल सुना दिया।
दरोगा मुस्कुराए। बोले, “चलो, मेरे साथ।”
पहले वो प्रधान जी के घर पहुंचे। वहां प्रधान जी चारपाई पर ताव देते बैठे थे और उनकी पत्नी लौकी काट रही थी। दरोगा ने पूछा, “ये लौकी कहाँ से लाई?”
प्रधान बोले, “बाजार से खरीदी है।”
“कितने में?” दरोगा ने फिर पूछा।
अब प्रधान जी की आवाज़ हल्की हो गई, आँखें बृजलाल पर टिक गईं। दरोगा ने तीखा स्वर अपनाया, “सीधा-सीधा बोलो। किसान को एक हज़ार रुपये दो नहीं तो चोरी और दबाव की FIR लिखूँगा।”
बहुत कहासुनी के बाद, प्रधान ने बुझे मन से एक हज़ार रुपये थमा दिए।
फिर दरोगा किसान को लेकर थाने पहुंचे। वहां सब सिपाही कतार में खड़े किए गए। बृजलाल ने कांपते हुए एक हवलदार की तरफ इशारा किया। दरोगा गरजे, “वर्दी में हो और हरकत चोरों जैसी? शर्म नहीं आती?”
उन्होंने जेब से हज़ार रुपये निकलवाए और किसान को सौंप दिए।
अब बृजलाल और भी घबरा गया। सोच रहा था, कहीं दरोगा अब सब रुपये न छीन ले।
वो धीरे से जाने लगा।
तभी दरोगा ने आवाज़ लगाई, “अरे रुक, तीसरी लौकी का क्या?”
फिर उन्होंने अपने पर्स से एक हज़ार का नोट निकाला और किसान के हाथ में रखा।बोले, “ये तीसरी लौकी का दाम है। अब जब भी किसी ने तुझे सताया,सीधे मेरे पास आना।बृजलाल की आंखें भर आईं। वह हाथ जोड़कर बोला, “मालिक,आज के दिन भगवान ने खुद दरोगा का रूप लिया है।