मुम्बई के कभी जाने-माने कपड़ा व्यापारी रहे 74 वर्षीय शिवचरण राम रतन गुप्ता जब जीवन के ढलान पर पहुँचे, तो उन्हें शायद इस बात का गुमान भी नहीं रहा होगा कि जिन तीन बेटियों को उन्होंने उँगली पकड़कर चलना सिखाया, पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाया और धूमधाम से विदा किया, वही बेटियाँ जीवन के अंतिम पड़ाव पर उनके लिए पराए से भी बदतर साबित होंगी। व्यापार में घाटा होने और परिस्थितियाँ विपरीत होने पर शिवचरण जी सोनीपत के वृद्धाश्रम में शरण लेने को मजबूर हुए। अपनी बीमार और मानसिक अवसाद से जूझ रही पत्नी को भी उन्होंने वृद्धाश्रम में ही बुलवाया। दुखद बात यह रही कि कुछ माह बाद जब उनकी पत्नी ने दम तोड़ा, तो तीनों बेटियों में से कोई भी उनके अंतिम दर्शन के लिए नहीं पहुँची। अपनी जन्मदात्री माँ का अंतिम संस्कार बेटियों ने मोबाइल की स्क्रीन पर वीडियो कॉल के जरिए देखा। माँ के जाने के बाद शिवचरण जी अकेले पड़ गए और सोनीपत के ही एक अन्य नि:शुल्क वृद्धाश्रम 'समाज कल्याण शिक्षा समिति' में चले गए, जहाँ वे गुमनामी और अकेलेपन में अपने दिन काटने लगे।
4 अगस्त की अलसुबह जब शिवचरण जी का निधन हुआ, तो वृद्धाश्रम संचालक ने तुरंत उनकी बेटियों को सूचित किया। परंतु संवेदनाओं का दिवालियापन तो देखिए, बड़ी बेटी ने आने से स्पष्ट इनकार कर दिया और अंतिम संस्कार के खर्च के रूप में वृद्धाश्रम के नंबर पर ₹5100 ऑनलाइन ट्रांसफर कर दिए। बेटी का कहना था कि दूरी बहुत ज्यादा है, इसलिए वे नहीं आ सकतीं और पिता का दाह संस्कार करके चिता की वीडियो कॉल से तस्वीर दिखा दी जाए। लावारिसों की तरह समाजसेवियों और स्थानीय श्मशान सेवा समिति के सहयोग से उनका अंतिम संस्कार किया गया और वह ₹5,100 की राशि भी वापस लौटा दी गई। हद तो तब हो गई जब 48 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पिता की अस्थियाँ श्मशान घाट में लावारिस पड़ी रहीं। जब बेटियों से अस्थियाँ ले जाकर गंगा में प्रवाहित करने का अनुरोध किया गया, तो जवाब मिला कि "जब पिताजी ही नहीं रहे, तो अस्थियों का क्या करेंगे, आप ही विसर्जित कर देना।" जिस पिता ने अपना पूरा जीवन बच्चों के भविष्य को सींचने में लगा दिया, उसकी अस्थियों को दो गज पवित्र जल भी अपने औलाद के हाथों नसीब नहीं हुआ।
शिवचरण राम रतन गुप्ता की यह गाथा केवल एक व्यक्ति या परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे भारतीय समाज के नैतिक और सामाजिक पतन का एक भयावह आईना है। आज देश के कोने-कोने में स्थित वृद्धाश्रम ऐसे ही बदनसीब माँ-बाप की चीखों और सिसकियों से भरे पड़े हैं। कहीं प्रोफेसर भाई और शिक्षित भतीजों ने छल से जायदाद अपने नाम करवाकर बुजुर्ग को बेघर कर दिया, तो कहीं 18 किल्ले जमीन के मालिक माँ-बाप को औलाद ने चार दिन तक भूखा रखकर मारपीट कर घर से खदेड़ दिया। विडंबना यह है कि समाज में जैसे-जैसे शिक्षा, संपन्नता और आधुनिकता बढ़ रही है, वैसे-वैसे पारिवारिक मूल्यों और मानवीय मर्यादाओं का क्षरण हो रहा है। उच्च पदों पर बैठे, विदेशों में बसे या अत्यधिक पढ़े-लिखे बच्चे अक्सर आर्थिक दौड़ और पारिवारिक गृह-क्लेश का बहाना बनाकर अपने बूढ़े माँ-बाप को बोझ समझने लगते हैं।
अत्यधिक भौतिकवादी होते इस दौर में 'मर्यादा' और 'मानवता' पूरी तरह तार-तार हो चुकी है। जिस देश में श्रवण कुमार की गाथाएँ गाई जाती थीं, जहाँ माता-पिता को ईश्वर से भी ऊँचा दर्जा दिया जाता था, वहाँ आज औलाद अपने ही जन्मदाताओं की मृत्यु को महज़ एक नोटिफिकेशन और वीडियो कॉल तक सीमित कर चुकी है। आर्थिक तंगी, आपसी अनबन या व्यस्तता चाहे जो भी कारण हों, लेकिन किसी भी तर्क से उस औलाद के अपराध को क्षम्य नहीं ठहराया जा सकता जो जीवित रहते माँ-बाप को दाने-दाने के लिए तरसाए और मरने के बाद उनकी अस्थियों तक का दुलार न दे सके। यदि आज भी समाज ने इस गंभीर पतन पर आत्मचिंतन नहीं किया और अपनी नई पीढ़ी को मानवीय संवेदनाओं के संस्कार नहीं दिए, तो याद रहे कि समय का चक्र निर्दयी है और जो बीज आज बोए जा रहे हैं, कल उसकी फसल इन्हीं औलादों को भी काटनी पड़ेगी।