हम बचपन से पढ़ते और सुनते आ रहे हैं कि "दया धर्म का मूल है" सभी धर्मग्रंथों में दया पर ही अधिक जोर क्यों दिया गया है ? अगर हम दया नहीं कर सकते हैं तो हमारा यह मानव जीवन निरर्थक है, यह तो उसी प्रकार की बात हुई कि जन्म लिया, खाये-पिये, बड़े हुये, विवाह-शादी हुयीं, वंशवृद्धि कर परिवार को आगे बढ़ाया और कालांतर में जीवन यात्रा पूरी कर पहुंच गये अगली योनियों में।
ऐसा जीवन तो पशु-पक्षी भी जीते हैं, तो फिर हम इंसानों व पशु-पक्षियों में क्या अंतर रह जाता है ? छोटे बच्चे, भूखे बीमार, बिलखते बच्चे, बुजुर्ग असहाय वृद्ध-वृद्धा यह फेहरिस्त काफी लंबी है।
हे मनुष्य आत्माओं, तुम इन पर दया करो, तुम्हें भगवान् मिलेंगे, आपको ईश्वर की प्राप्ति के लिए दयालु बनना होगा। मन में दयाभाव व इंसानों के प्रति करुणा, विनम्रता व सहनशील रखना यह वाक्य हम सभी ने कई बार पढ़ा होगा।
सड़क से गुजरते हुये या काम पर जाते समय कोई बीमार या बुजुर्ग व्यक्ति इस तरह की लिफ्ट मांगते हैं और लोग हैं कि इनको नजरअंदाज कर निकल जाते हैं, यह बात विडंबना की ही कही जायेगी, अरे भाई, किसी बीमार या जरूरतमन्द व्यक्ति को अगर हम जाते हुये अपने वाहन पर बिठाकर उसके मुकाम या उसके नजदीकी ठिकाने तक ही छोड़ दें तो हमको उसकी जो दुआयें मिलेंगी, उसी दुआओं से हमारा मानव जीवन सार्थक हो जायेगा।
हमें अपार खुशी तो मिलेगी ही इस बात की कि आज मैंने अपनी जिंदगी में एक अच्छा काम किया, देखियेगा कि हमको ईश्वर-प्राप्ति की गर चाह है तो हमको अपने आचरण को थोड़ा-सा ही सही, लेकिन सुधारना जरूर होगा, ठीक है हमारे पास समय नहीं है तो आज के मोबाइल, ई-मेल व इंटरनेट के जमाने में भी हम दया को अर्पित कर सकते हैं, वो भी घर बैठे ही, वो कैसे ?
ठीक है यदि हमारे पास अनाथालय, वृद्धाश्रम, महिला श्राविका आश्रम, महिला उद्धार गृह, कुष्ठ उद्धार गृह आदि जगहों पर जाने का समय नहीं है तो हम इन आश्रमों के फोन, मोबाइल या सोशल नेटवर्किंग पर संपर्क कर अपनी दान राशि भेंट कर सकते हैं। इन आश्रमों के कर्मचारी हमारे घर आकर दान राशि ले जायेंगे तथा हम पुण्य के भागी बन जायेंगे।
अगर हम किसी की एक छोटी-सी भी मदद करते हैं तो वह व्यक्ति कृतज्ञ भाव से हमारी ओर देखता है, तब हमको जो आत्मसंतोष मिलता है, उसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता है। कभी हम भूखे बच्चों को रोटी खिलाकर, फटेहाल व ठंड में ठिठुरते लोगों को वस्त्र पहनाकर, किसी सताई हुई नारी को यह दिलासा देते हुये कि बहन चिंता मत करो, हम आपके साथ है।
उसके सिर पर अगर हम हाथ रखेंगे तो भावुकतावश हमारी आँखों से भी इस बात को लेकर अश्रुधारा बह निकलेगी कि आज मैंने ज़िन्दगी में अच्छा काम किया है, जब ईश्वर के सामने हम अपने कर्मों का हिसाब-किताब देने हेतु खड़े होंगे तो बिलकुल निश्चिंत होंगे, क्योंकि हमारे मन में यह भाव लगा रहेगा कि मैंने अपनी जिंदगी में किसी आत्मा को कभी कोई कष्ट नहीं पहुंचाया।
एक इंसान होने के नाते हर व्यक्ति को चाहिये कि वह कभी भी किसी को बुरा नहीं बोले और न ही कभी बुरा कर्म ही करें। अगर हम किसी को बुरा बोलते हैं तो उसके वायब्रेशन सारे वायुमंडल में फैल जाते हैं, यह अपने, सामने वाले के साथ ही वातावरण को भी प्रदूषित करते हैं। अत: सदैव मीठा बोलें, यही बात कर्म पर भी लागू होती है, हमारे कर्म जितने अच्छे होंगे, हम ईश्वर के उतने ही करीब होंगे।
ठीक है हमारे पास पैसे नहीं है, तो हम यह काम तो कर ही सकते हैं कि रास्ते में एक पत्थर पड़ा है, जो आते-जाते लोगों को लहूलुहान कर रहा है, कई लोग ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं, कई को गंभीर चोट लग भी सकती है या लगती भी है, तो हमें चाहिये कि वो पत्थर उस जगह से हटा कर एक तरफ रख दें। हमारे इस जरा-से कष्ट से कई लोगों को सुविधा हो जायेगी। अनजाने व खामोशी से किया गया यह कर्म हमको भी आत्मसंतुष्टि देगा व लोगों की दुआयें भी मिलेंगी।
कई चौराहों व रास्तों पर देखा गया है कि बच्चे, बुजुर्ग व महिलायें रास्ता पार करने हेतु ट्रैफिक रुकने का इंतजार कर रहे होते हैं किंतु ट्रैफिक है कि रुकने का ही नाम नहीं लेता। हम ऐसी स्थिति में उनकी मदद के लिहाज से उनका हाथ पकड़कर रास्ता पार करा सकते हैं, यह भी बिना खर्च किये मुफ्त की एक अच्छी मानव-सेवा है।
मानव की सेवा माधव की सेवा के बराबर मानी गई है। हम चाहें चारों धाम की यात्रा करें लेकिन एक इंसान की सेवा अगर जरूरत के समय नहीं करते हैं तो चारों धाम की यात्रा का कोई फल मिलने वाला नहीं। खराब वचन और खराब कर्म करने के बाद भगवान् को जल, अर्घ्य व एक निस्वार्थ असहायों की सेवा करके हम अपने द्वारा किये गये पाप से बरी नहीं हो सकते।
क्योंकि कर्मों का फल तो हर व्यक्ति को भुगतना ही पड़ता है। इससे भगवान भी नहीं बच सके तो इंसान की क्या बिसात? अगर समाज से श्रेष्ठ कर्म यानी दया-भाव का खात्मा हो जाये तो यह बस्ती इंसानों की बस्ती न कहलाकर पशु-पक्षियों से भी गई-बीती बस्ती कहलायेगी। इंसान द्वारा इंसान से प्रेम किया जाना मनुष्यता की पहली पहचान है। इस प्रकार हम भी अधिक नहीं तो थोड़ी सी दया-भावना मन में रखकर पीड़ित मानवता की सेवा कर इस उक्ति को सार्थक कर सकते हैं कि दया धर्म का मूल है।
सज्जनों, मानव सेवा माधव सेवा का जज्बा अपने आप में इतना कूट-कूट कर भर दो। अपने समाज में असहाय बच्चे, असहाय बीमार बुजुर्ग, या समाज की सताई हुई दुखियारी माँ-बहन, सबके प्रति मानव सेवा माधव सेवा' की भावना से कार्य करें। निश्चित रूप से हमको आत्मिय सुख की प्राप्ति होगी, बीमार, अपाहिज, विकलांग, भूखे, नेत्रहीन व कुष्ठ रोगी के प्रति जो करुणा व दया के भाव के साथ हम जीते हैं तो विश्वास करें कि हम भगवान् के निकट जा रहे हैं।
कई सज्जन लोगों में यह भावना कूट-कूट कर भरी हुई है,ऐसे संस्कारी लोगों ने कई असहायों को अपनाया है तथा उनकी सेवा कार्य जारी है,इस प्रकार हम दया-भाव रखकर पीड़ित मानवता की सेवा कर सकते हैं तथा ईश्वर के काफी करीब पहुंच सकते हैं..!!