"यह कहानी भक्त और भगवान के अटूट भाव पर आधारित है।"
लखन नाम का एक शातिर चोर था, जिसके मन में न तो ईश्वर के लिए कोई स्थान था और न ही इंसानियत के लिए। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी चोरी और हेरा-फेरी में गुज़ार दी थी। एक शाम उसे खबर मिली कि पास के गाँव के पुराने राधा-कृष्ण मंदिर में ठाकुर जी को बहुत कीमती और प्राचीन गहने पहनाए गए हैं।
लखन ने मन ही मन तय कर लिया कि आज की यह चोरी उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और आख़िरी चोरी होगी, जिससे वह अपनी आगे की ज़िंदगी ऐशो-आराम से बिताएगा।
आधी रात को जब पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था, लखन मंदिर की दीवार फाँदकर भीतर घुस गया। मंदिर के गर्भगृह में घना अँधेरा था और बस एक छोटा सा दीया टिमटिमा रहा था। जैसे ही वह प्रतिमा के करीब पहुँचा, उसे अचानक हवाओं में एक बहुत ही मधुर बाँसुरी की धुन सुनाई देने लगी।
वह चौंक गया क्योंकि मंदिर में उसके सिवा और कोई नहीं था। उसने अपनी आँखें मलीं और देखा कि राधा-कृष्ण की प्रतिमा से एक हल्की और अलौकिक नीली रोशनी निकल रही है।
लखन ने अपने डर को दबाया और प्रतिमा के गले से हीरों का हार उतारने के लिए हाथ बढ़ाया। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र श्री कृष्ण की मंद-मंद मुस्कुराती मूरत पर पड़ी, उसके हाथ जैसे पत्थर के हो गए। उसे लगा कि वे पत्थर की आँखें उसे देख रही हैं और पूछ रही हैं— "लखन, क्या तू सच में यही लेने आया है?"
उस मुस्कान में इतनी करुणा और ऐसा खिंचाव था कि लखन की हिम्मत जवाब दे गई। उसके हाथ से औज़ार गिर पड़े और वह वहीं घुटनों के बल बैठ गया।
उस अँधेरे मंदिर में लखन को अपने जीवन का एक-एक पाप किसी फिल्म की तरह याद आने लगा। उसे याद आया कि कैसे उसने गरीबों को सताया लोगों की मेहनत की कमाई लूटी। पहली बार उसे अपने कृत्यों पर शर्म महसूस हुई। वह फफक-फफक कर रोने लगा और प्रतिमा के चरणों में सिर रखकर माफी माँगने लगा।
वह कहने लगा— "प्रभु, मैं तो आपको लूटने आया था, पर आपने तो मेरी आत्मा ही बदल दी"। पूरी रात वह उसी संगीत और उस दिव्य रोशनी के घेरे में रोता रहा।
सुबह जब मंदिर के पुजारी जी ने पट खोले, तो उन्होंने देखा कि एक आदमी ठाकुर जी के चरणों में सिर रखकर सोया हुआ है। उसके पास चोरी के औज़ार पड़े थे, लेकिन उसके हाथ में कोई गहना नहीं, बल्कि एक मुरझाया हुआ मोरपंख था जो शायद रात में प्रतिमा से उसके ऊपर गिर गया था।
पुजारी ने जब उसे जगाया, तो लखन की आँखों में वो शातिरपन नहीं, बल्कि एक असीम शांति थी। वह अब चोर नहीं, बल्कि एक 'भगत' बन चुका था। उस दिन के बाद लखन ने मंदिर की सेवा में अपना जीवन लगा दिया।
सीख : परमात्मा की शरण में जाने के लिए पहले से पवित्र होना ज़रूरी नहीं है। उनकी एक नज़र ही सबसे बड़े अपराधी को भी पवित्र करने की शक्ति रखती है। ईश्वर को केवल भाव चाहिए, चाहे वह पश्चाताप के आँसुओं में ही क्यों न हो।