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Thursday, February 26, 2026

भौतिक शक्ति ,प्रभु भक्ति

 ब्राह्मण हाथ में रामायण की पुस्तक लेकर दिन भर इधर से उधर घूमता रहता था कोई भी व्यक्ति रामायण सुनने के लिए मिल जाए मेरे को दान दक्षिणा मिल जाए तो मेरा जीवन चलता रहे वह अपने मन में सोचता रहता है 
भूख प्यास भी लग जाती है पर न उसको कोई खिलाने वाला था और नहीं उसको कोई पिलाने वाला था न कोई उसका घर था ना कोई उसका धोरी था उसके आगे पीछे कोई नहीं था ।
जंगल की तरफ आगे बढ़ता ही जा रहा था पर समझ में नहीं आ रहा था मैं करूं तो क्या करूं जिंदा रहूं या मृत्यु को गले लगाउ यह भी समझ में नहीं आ रहा था 
अचानक उसने देखा जंगल में एक संत उसकी तरफ आ रहे थे जिनके हाथ में कमंडल था संत को देखते हुए चरणों में नतमस्तक हो जाता है निवेदन करता है मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं ।
संत ने कहा तुम एक काम कर तुम यदि मेरे को प्रतिदिन तेरे हाथ में जो रामायण है इस रामायण को सुनना प्रारंभ कर दे मैं तुम्हारे को प्रतिदिन भोजन और अपनी अपनी तरफ से देना प्रारंभ कर दूंगा नदी किनारा पास में है अपन वहां चलते है और वहां पर एक कुटिया बना देते है जहां पर तुम मेरे को हमेशा रामायण सुनाते रहना में गांव में जाकर भिक्षा मांग कर ले आऊंगा तेरा पेट भी भर दूंगा और मैं अपना पेट भी भर लूंगा।
संत के बात पंडित स्वीकार कर लेता है क्योंकि उसको तो अपना पेट भरने से मतलब था दोनों नदी किनारे पहुंच जाते हैं वहां पर एक कुटिया बना लेते है सामने नदी मे सुबह शाम दोनों स्नान कर लेते हैं पंडित कथा सुनना प्रारंभ कर देता है कथा जब पूरी होती है तब संत शहर की ओर रवाना हो जाते हैं रोटी मांग कर ले आते हैं दोनों आपस में बांट कर खा लेते हैं और सो जाते हैं ।
एक बरस पूरा हो जाता है संत पंडित की कथा से बहुत ज्यादा खुश हो जाते हैं और कहते हैं बोल कोई भी तुम वरदान मांगना चाहता है तो मैं आज तेरे को वरदान देने के लिए तैयार हूं बोल तेरे को क्या चाहिए संत ने खुश होकर कहा 
यह बात सुनकर पंडित बहुत ज्यादा खुश हो जाता है हाथ जोड़कर निवेदन करता है महात्मा जी मेरे को कुछ भी नहीं चाहिए केवल मेरे पास में धन की कमी है मेरे को धन मिल जाए तो मैं मानूंगा मेरे को भगवान मिल गए हैं आप इसलिए आप मेरे को धन देने की कृपा करें ।
महात्मा जी तत्काल झोपड़ी का एक तीनका बाहर निकालते हैं अपने हाथों से तोड़ते हैं देखते देखते वहां पर सोने की मोहरे बरसने प्रारंभ हो जाती है। और धन का ढेर लग जाता है यह देखकर वह बहुत ही ज्यादा खुश हो जाता है 
महात्मा ने कहा और भी तेरे को कुछ मांगना हो तो तुम मांग सकता है अभी तेरे हाथ के अंदर है मांगना फिर तेरी हाथ में नहीं रहेगा इसलिए जो भी मांगना हो अभी तुम मांग सकता है ।
अपने सामने धन का भंडार देकर पंडित ने कहा महात्मा जी आपने मेरे को धन तो दे दिया है पर यदि मकान नहीं है तो धन का क्या मूल्य है मेरे को मकान चाहिए जिसके अंदर में आराम से रह सकूं 
महात्मा उसके तरफ देखना प्रारंभ कर देते हैं खुश होकर महात्मा के मुखारविंद से शब्द निकल जाता तथास्तु ।
तथास्तु शब्द निकलते ही ऐसा चमत्कार होता है जंगल के अंदर सात मंजिल की हवेली बनकर तैयार हो जाती है संत ने का यह हवेली तेरे रहने के लिए तैयार हो गया तुम आराम से यहां पर रह सकता है ।
इतनी बड़ी हवेली देखकर पंडित बहुत ज्यादा खुश हो जाता है महात्मा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना प्रारंभ कर देता है ।
महात्मा ने कहा और भी कुछ मांगना हो तो अभी तुम मांग सकते हो अभी तेरे पास में समय है फिर तेरे को वक्त नहीं मिलेगा और कुछ मांगना हो तो मांग ले
पंडित की लालसाएं इच्छाएं बढ़ते ही जा रही थी पंडित जी ने का महात्मा जी आपने धन दे दिया मकान दे दिया पर घर को चालने वाली यदि धर्मपत्नी मिल जाए तो कम से काम आराम से रोटी खाने को तो मिलेगी यदि आप मेरे को कुछ देना ही चाहती हैं तो एक अच्छी धर्मपत्नी मेरे को दे जिससे मेरा जीवन सफल बन जाए ।
महात्मा यह बात सुनकर अपनी नजर एक तरफ उठाकर देखी है और कहा देख पंडित उधर कौन जा रहा है तुम चाहे तो उसको अपने घर पर आराम से रख सकता है ।
पंडित ने देखा सामने एक नवयुवती जा रही थी वो तत्काल उसके पास में जाता है नवयुवती उसको देखते ही उसके प्रति आकर्षित हो जाती है उसके साथ में शादी करने के लिए तैयार हो जाती है शादी करके दोनों अपने मकान में रहना प्रारंभ कर देते है और संतों का सानिध्य है वह नहीं छोड़ते हैं ।
पर पंडित महात्मा को रामायण पाठ सुनाना कभी नहीं भुलता है वह समय पर आ जाता है महात्मा जी की सेवा भी करता है महात्मा जी खुश होकर पूछते हैं बोल भक्त और भी कुछ चाहिए क्या।
पंडित ने कहा महात्मा जी आपने मेरे को धन दे दिया मकान दे दिया पत्नी देदी पर घर में जब तक पुत्र रत्न नहीं हो तब तक घर का क्या मूल्य है वह ऐसी हो जाए तो सब सुख अपने आप ही मेरे को मिलने प्रारंभ हो जाएंगे ।
महात्मा के मुखारविंद से फिर शब्द निकल जाता है तथास्तु देश का परिणाम आता है कुछ समय के पश्चात पंडित के घर पर पुत्र रत्न भी जन्म ले लेता है 
महात्मा जी ने फिर पूछा बोल अब तेरी और कोई इच्छा बाकी रह गई है क्या 
तब पंडित ने कहा महात्मा जी अब केवल एक इच्छा बाकी है परमात्मा से मेरा साक्षात्कार हो जाए ।
महात्मा ने कहा परमात्मा से तेरा साक्षात्कार नहीं हो सकता है क्योंकि तेरा मन तो हमेशा धन में रहता है मकान में रहता है पत्नी में रहता है पुत्र में रहता है जब त तेरा मन इन चीजों में लगा हुआ रहेगा तब तक तेरे को कभी भी परमात्मा से साक्षात्कार करने का अवसर है वह प्राप्त नहीं होगा ।
यह बात कह कर संत वहां से जंगल की तरफ प्रस्थान कर जाते हैं पंडित संसार में उलट कर रह जाता है उसको परमात्मा के कभी भी दर्शन साक्षात्कार करने का अवसर भी प्राप्त नहीं होता है ।
पंडित के कानों में हमेशा ही महात्मा के शब्द गुंजित होते रहते थे जिसका मन भौतिकता में उलझा हुआ होता है उस का मन कभी भी भगवान की भक्ति में नहीं लगता है।