एक बार प्रभु श्रीरामजी और माता सीताजी में एक मीठी बहस छिड़ गई।
विषय था: "हनुमान किसे ज्यादा मानते हैं?"
श्रीरामजी बोले: "हनुमान मेरा भक्त है।"
माता सीताजी बोलीं: "आप भ्रम में हैं प्रभुजी, वह मुझे अधिक मानता है।"
तय हुआ कि हनुमान जी की परीक्षा ली जाए। जब हनुमान जी चरण सेवा के लिए आए, तो दोनों ने एक साथ अपनी-अपनी मांग रख दी।
माता सीताजी बोलीं: "हनुमान! प्यास लगी है, जल ले आओ।"
उसी क्षण श्रीरामजी बोले: "हनुमान! बहुत गर्मी है, पंखा झलो, वरना मैं मूर्छित हो जाऊंगा।"
हनुमान जी ठिठक गए! धर्मसंकट!
पहले जल लाएं या पंखा झलें? दोनों ही कार्य अति शीघ्र करने थे। हनुमान जी समझ गए कि आज "दाल में कुछ काला है"।
हनुमान जी की बुद्धिमत्ता:
उन्होंने जोर से जयकारा लगाया— "जय सियाराम जी!"
और अपनी भक्ति के प्रभाव से अपनी दोनों भुजाएं लंबी कर दीं।
एक हाथ से माता सीताजी को जल का गिलास दिया और उसी क्षण दूसरे हाथ से प्रभु रामजी को पंखा झलने लगे।
हनुमान जी ने हंसकर कहा:
"प्रभुजी! न मैं केवल रामजी का भक्त हूँ, न केवल सीताजी का... मैं तो युगल सरकार 'सीतारामजी' का भक्त हूँ।"
हनुमान जी की यह चतुरता और प्रेम देखकर प्रभु रामजी और माता सीताजी गदगद हो गए और उन्हें गले लगा लिया।
सच है, जहाँ रामजी, वहाँ सीताजी और जहाँ ये दोनों, वहाँ हनुमान!
जय सिया रामजी! जय हनुमानजी!