गाँव का चौपाल आज हमेशा की तरह शांत नहीं था। पुराने पीपल के नीचे लगी लकड़ी की खाटों पर गाँव के बुजुर्ग और पंच बैठे हुए थे। सभी के चेहरों पर गंभीरता थी। कोई तम्बाकू घिस रहा था, कोई चुपचाप सामने देख रहा था—जैसे किसी बड़े फैसले का इंतज़ार हो। आज पंचायत कृपाशंकर जी के परिवार के झगड़े पर बुलाई गई थी।
थोड़ी ही देर में सफेद धोती-कुर्ता पहने, सिर पर गमछा रखे कृपाशंकर जी धीरे-धीरे चलते हुए चौपाल में पहुँचे। उनके चेहरे पर उम्र की लकीरें साफ दिख रहीं थी, लेकिन आँखों में अब भी वही चमक थी—आत्मसम्मान की चमक।
सरपंच ने आगे बढ़कर उन्हें हाथ पकड़कर बैठाया।आओ कृपाशंकर जी, आप ही की बात सुननी है आज। लड़के तो चाहते हैं कि अब जायदाद और जिम्मेदारियों का बँटवारा हो जाए।चौपाल में हल्की-हल्की कानाफूसी होने लगी। महीनों से दोनों बेटों—गिरीश और कुनाल—के बीच घर बाँटने को लेकर तकरार चल रही थी। दोनों की बहुएँ भी अपने-अपने हिस्से का दबाव डाल रही थीं।
सरपंच ने सीधा सवाल रखा,जब साथ में निर्वाह न हो, तो औलाद को अलग कर देना ही ठीक है। अब बताइए कृपाशंकर जी, आप किस बेटे के साथ रहना चाहेंगे?
यह सुनते ही पंचायत का माहौल और शांत हो गया। जैसे किसी ने हवा रोक दी हो। सभी की नजरें कृपाशंकर जी पर टिक गईं—पर वे चुप थे, गहरी सोच में डूबे हुए।
उनकी आँखों के सामने अतीत के दृश्य घूमने लगे—दो नन्हे-नन्हे बच्चे जो उनके कंधों पर सवार हो जाते थे…
गिरीश की मासूम शरारतें…
कुनाल की हँसी…
घर आँगन में गूँजती उनकी किलकारियाँ…
आज वही बच्चे इतने बड़े हो गए कि बाप को किसके पास रहना है, इस पर पंचायत लगानी पड़ रही है।
तभी गिरीश की आवाज़ ने उनकी सोच तोड़ दी।
इसमें क्या पूछना? छह महीने पापा जी मेरे साथ रहेंगे और छह महीने छोटे के पास। बराबर बँटवारा।
जैसे कोई बोझ से मुक्त होने पर खुश हो रहा हो।
सरपंच ने भी सिर हिलाया,
“चलो, बड़ी बात तो तय हो गई। अब जायदाद का भी फैसला कर देते हैं…”
बस, इतना कहना था कि कृपाशंकर जी अचानक खड़े हो गए। उनकी आँखें लाल थीं—दर्द और गुस्से की मिली-जुली आग से भरी हुई।
उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा—
“अबे ओ सरपंच! फैसला क्या हो गया? किसने किया फैसला?”
एकदम सन्नाटा छा गया। गाँव का कोई भी आदमी इस बूढ़े को इस तरह गुस्से में नहीं देख पाया था।
कृपाशंकर जी आगे बोले—
“फैसला मैं करूंगा! और सुन लो दोनों… तुम दोनों को मैं आज ही घर से बाहर कर रहा हूँ।
दोनों बेटे भौंचक्के!
भीड़ में कानाफूसी बढ़ी—
“क्या… पिता अपने ही बेटों को निकाल रहा है?
लेकिन कृपाशंकर जी का स्वर दृढ़ था—
“जब बाप को ‘छह-छह महीने’ में बाँटने की बात तुम दोनों कर सकते हो, तो जायदाद पर हक़ किस मुँह से माँगते हो?
जायदाद का मालिक मैं हूँ… तुम नहीं!
उन्होंने सरपंच की ओर मुड़कर कहा—
“सरपंच जी, इनसे कहिए कि अभी और इसी वक्त मेरे घर से चुपचाप निकल जाएँ। और जमीन-जायदाद चाहिए, तो छ: महीने बारी-बारी से मेरे पास आकर रहें… और बाकी छ: महीने कहीं और अपनी व्यवस्था करें।
जब सेवा, साथ और सम्मान का भाव दिखेगा, तब सोचूँगा कि किसे क्या देना है।”
चौपाल में पूरा माहौल बदल चुका था। इतने वर्षों में पहली बार किसी ने ऐसे नियम बेटे पर लगाए थे। आमतौर पर बेटे बाप को बाँटते थे, पर आज बाप ने बेटों को बाँट दिया था।
गिरीश ने घबराकर कहा,
पिताजी! यह कैसा फैसला? हम तो बराबरी की बात कर रहे थे
कृपाशंकर जी ने कड़े स्वर में कहा,
“बराबरी? बाप को महीने-महीने में बाँटना बराबरी है?
जब छोटे थे, तब क्या तुम दोनों को मैं छह-छह महीनों में बाँट देता?
नहीं न?
तो अब क्यों मैं अपना बुढ़ापा तुम लोगों की गिनती-तौलती जिम्मेदारियों के भरोसे जियूँ?”
कुनाल ने धीमे स्वर में कहा,
लेकिन पिताजी… घर से निकाल रहे हैं?
हाँ निकाल रहा हूँ,” कृपाशंकर जी बोले,
“क्योंकि जब तक जिम्मेदारी का बोझ बेटे पर न पड़े, तब तक बेटा कभी समझदार नहीं बनता।तुम दोनों अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हो। सोचते हो कि बूढ़ा बाप बोझ है।
अब जिम्मेदारी का सच समझो।
पंचायत के बुजुर्ग धीरे-धीरे सिर हिलाने लगे।सही बात है आज पहली बार किसी ने सच्चाई सुनाई है
सरपंच भी प्रभावित हुए बिना न रह सके।
कृपाशंकर जी, आपका फैसला कठोर है… पर न्यायपूर्ण भी। घर और जायदाद का मालिक आप हैं। फैसला आपका ही चलना चाहिए।
गिरीश और कुनाल दोनों की नजरें झुक चुकी थीं। उनके अंदर कहीं न कहीं अपराध-बोध जाग चुका था।
उन्हें समझ आ गया था कि बाप कोई वस्तु नहीं जिसे बाँटा जाए। वह तो वह नींव है जिसके सहारे घर खड़ा होता है—पर जिस नींव को ही कमजोर किया जाए, वह मकान ज्यादा दिन कहाँ टिकता है?
कृपाशंकर जी ने अंतिम शब्द कहे—घर मुझसे है, मैं घर से नहीं। इसे याद रखना।
अगर वास्तव में मेरा हक़ चाहते हो, तो पहले अपना फर्ज निभाओ।
दोनों बेटे चुपचाप घर की ओर जाने लगे—पहली बार उनका घर उनका अपना नहीं लगा।
पहली बार उन्होंने महसूस किया कि पिता का आशीर्वाद और साथ किसी जायदाद से कहीं ज्यादा कीमती होता है।
चौपाल में बैठे बुजुर्गों में से एक बोला-आज के समय को ऐसी ही नई सोच और नई पहल की जरूरत है।
और सचमुच, आज कृपाशंकर जी ने सिर्फ दो बेटों को नहीं, पूरे गाँव को शिक्षा दी थी—सम्मान माँगा नहीं जाता, निभाकर पाया जाता है।
और पिता—कभी बाँटने की चीज नहीं होता।