महामंत्र > हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे|हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे||

Wednesday, January 7, 2026

हनुमान जी किसके भक्त

एक बार प्रभु श्रीरामजी और माता सीताजी में एक मीठी बहस छिड़ गई।
विषय था: "हनुमान किसे ज्यादा मानते हैं?"
श्रीरामजी बोले: "हनुमान मेरा भक्त है।"
माता सीताजी बोलीं: "आप भ्रम में हैं प्रभुजी, वह मुझे अधिक मानता है।"
तय हुआ कि हनुमान जी की परीक्षा ली जाए। जब हनुमान जी चरण सेवा के लिए आए, तो दोनों ने एक साथ अपनी-अपनी मांग रख दी।
 माता सीताजी बोलीं: "हनुमान! प्यास लगी है, जल ले आओ।"
 उसी क्षण श्रीरामजी बोले: "हनुमान! बहुत गर्मी है, पंखा झलो, वरना मैं मूर्छित हो जाऊंगा।"
हनुमान जी ठिठक गए! धर्मसंकट!
पहले जल लाएं या पंखा झलें? दोनों ही कार्य अति शीघ्र करने थे। हनुमान जी समझ गए कि आज "दाल में कुछ काला है"।
 हनुमान जी की बुद्धिमत्ता:
उन्होंने जोर से जयकारा लगाया— "जय सियाराम जी!"
और अपनी भक्ति के प्रभाव से अपनी दोनों भुजाएं लंबी कर दीं।
एक हाथ से माता सीताजी को जल का गिलास दिया और उसी क्षण दूसरे हाथ से प्रभु रामजी को पंखा झलने लगे।
हनुमान जी ने हंसकर कहा:
"प्रभुजी! न मैं केवल रामजी का भक्त हूँ, न केवल सीताजी का... मैं तो युगल सरकार 'सीतारामजी' का भक्त हूँ।"
हनुमान जी की यह चतुरता और प्रेम देखकर प्रभु रामजी और माता सीताजी गदगद हो गए और उन्हें गले लगा लिया।
सच है, जहाँ रामजी, वहाँ सीताजी और जहाँ ये दोनों, वहाँ हनुमान! 
जय सिया रामजी! जय हनुमानजी!

Monday, January 5, 2026

भगवान कहाँ हैं ? कौन हैं ? किसने देखा है ?

मैं कईं दिनों से बेरोजगार था, एक एक रूपये की कीमत जैसे करोड़ो लग रही थी, इस उठापटक में था कि कहीं नौकरी लग जाए।आज एक इंटरव्यू था, पर दूसरे शहर और जाने के लिए जेब में सिर्फ दस रूपये थे। मुझे कम से कम पांच सौ की जरूरत थी।अपने एकलौते इन्टरव्यू वाले कपड़े रात में धो पड़ोसी की प्रेस मांग के तैयार कर पहन अपने योग्यताओं की मोटी फाइल बगल में दबा दो बिस्कुट खा के निकलाl लिफ्ट ले, पैदल जैसे तैसे चिलचिलाती धूप में तरबतर बस स्टेंड शायद कोई पहचान वाला मिल जाए।काफी देर खड़े रहने के बाद भी कोई न दिखा।मन में घबराहट और मायूसी थी, क्या करूंगा अब कैसे पहचुंगा।पास के मंदिर पर जा पहुंचा, दर्शन कर सीढ़ियों पर बैठा था पास में ही एक फकीर बैठा था। उसके कटोरे में मेरी जेब और बैंक एकाउंट से भी ज्यादा पैसे पड़े थे।मेरी नजरे और हालत समझ के बोला,कुछ मदद कर सकता हूं क्या?
 मैं मुस्कुराते हुए बोला, आप क्या मदद करोगे?
 चाहो तो मेरे पूरे पैसे रख लो। वो मुस्कुराते हुए बोला।
 मैं चौंक गया । उसे कैसे पता मेरी जरूरत । 
मैने कहा क्यों ...?"
शायद आप को जरूरत है" वो गंभीरता से बोला।
हां है तो पर तुम्हारा क्या तुम तो दिन भर मांग के कमाते हो । मैने उस का पक्ष रखते बोला।
वो हँसता हुआ बोला, "मैं नहीं मांगता साहब लोग डाल जाते है मेरे कटोरे में पुण्य कमानें l
मैं तो फकीर हूं मुझे इनका कोई मोह नहीं, मुझे सिर्फ भुख लगती है, वो भी एक टाईम और कुछ दवाईंया बस l
मैं तो खुद ये सारे पैसे मंदिर की पेटी में डाल देता हूं । वो सहज था कहते कहते।
मैनें हैरानी से पूछा, "फिर यहां बैठते क्यों हो..?
आप जैसो की मदद करनें ।" वो फिर मंद मंद मुस्कुरा रहा था।
मै उसका मुंह देखता रह गया, उसने पांच सौ मेरे हाथ पर रख दिए और बोला, "जब हो तो लौटा देना। मैं शुक्रिया जताता वहां से अपने गंतव्य तक पहुचा, मेरा इंटरव्यू हुआ, और सिलेक्शन भी ।
मैं खुशी खुशी वापस आया सोचा उस फकीर को धन्यवाद दूं,
मंदिर पहुचां बाहर सीढ़़ियों पर भीड़ थी, मैं घुस के अंदर पहुचा देखा 
वही फकीर मरा पड़ा था l
मैं भौंचक्का रह गया।, मैने दूसरो से पूछा कैसे हुआ l
पता चला, वो किसी बिमारी से परेशान था, सिर्फ दवाईयों पर जिन्दा था आज उसके पास दवाईंया नहीं थी और न उन्हैं खरीदने या अस्पताल जाने के पैसे ।
मै आवाक सा उस फकीर को देख रहा था। अपनी दवाईयों के पैसे वो मुझे दे गया था।
जिन पैसों पे उसकी जिंदगी का दारोमदार था, उन पैसों से मेरी ज़िंदगी बना दी थी....
भीड़ में से कोई बोला, अच्छा हुआ मर गया ये भिखारी भी साले बोझ होते है कोई काम के नहीं।...........
मेरी आँखें डबडबा आयी। वो भिखारी कहां था, वो तो मेरे लिए भगवान ही था।

Saturday, January 3, 2026

मनुष्य के भाग्य में क्या है

एक बार महर्षि नारद वैकुंठ की यात्रा पर जा रहे थे, नारद जी को रास्ते में एक औरत मिली और बोली। 
मुनिवर आप प्रायः भगवान नारायण से मिलने जाते है। मेरे घर में कोई औलाद नहीं है आप प्रभु से पूछना मेरे घर औलाद कब होगी?
 नारद जी ने कहा ठीक है, पूछ लूंगा इतना कह कर नारदजी नारायण नारायण कहते हुए यात्रा पर चल पड़े ।
वैकुंठ पहुंच कर नारायण जी ने नारदजी से जब कुशलता पूछी तो नारदजी बोले जब मैं आ रहा था तो रास्ते में एक औरत जिसके घर कोई औलाद नहीं है। उसने मुझे आपसे पूछने को कहा कि उसके घर पर औलाद कब होगी?
 नारायण बोले तुम उस औरत को जाकर बोल देना कि उसकी किस्मत में औलाद का सुख नहीं है।
 नारदजी जब वापिस लौट रहे थे तो वह औरत बड़ी बेसब्री से नारद जी का इंतज़ार कर रही थी।
औरत ने नारद जी से पूछा कि प्रभु नारायण ने क्या जवाब दिया ?
इस पर नारदजी ने कहा प्रभु ने कहा है कि आपके घर कोई औलाद नहीं होगी। 
यह सुन कर औरत ढाहे मार कर रोने लगी नारद जी चले गये ।
कुछ समय बीत गया। गाँव में एक योगी आया और उस साधू ने उसी औरत के घर के पास ही यह आवाज़ लगायी कि जो मुझे 1 रोटी देगा मैं उसको एक नेक औलाद दूंगा। 
यह सुन कर वो बांझ औरत जल्दी से एक रोटी बना कर ले आई। और जैसा उस योगी ने कहा था वैसा ही हुआ।
 उस औरत के घर एक बेटा पैदा हुआ। उस औरत ने बेटे की ख़ुशी में गरीबो में खाना बांटा और ढोल बजवाये। 
कुछ वर्षों बाद जब नारदजी पुनः वहाँ से गुजरे तो वह औरत कहने लगी क्यूँ नारदजी आप तो हर समय नारायण , नारायण करते रहते हैं ।
आपने तो कहा था मेरे घर औलाद नहीं होगी। यह देखो मेरा राजकुमार बेटा।
फिर उस औरत ने उस योगी के बारे में भी बताया। 
नारदजी को इस बात का जवाब चाहिए था कि यह कैसे हो गया?
 वह जल्दी जल्दी नारायण धाम की ओर गए और प्रभु से ये बात कही कि आपने तो कहा था कि उस औरत के घर औलाद नहीं होगी। 
क्या उस योगी में आपसे भी ज्यादा शक्ति है?
नारायण भगवान बोले आज मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं है ।
 मैं आपकी बात का जवाब बाद में दूंगा पहले आप मेरे लिए औषधि का इंतजाम कीजिए,
 नारदजी बोले आज्ञा दीजिए प्रभु, नारायण बोले नारदजी आप भूलोक जाइए और एक कटोरी रक्त लेकर आइये।
 नारदजी कभी इधर, कभी उधर घूमते रहे पर प्याला भर रक्त नहीं मिला। 
उल्टा लोग उपहास करते कि नारायण बीमार हैं । 
चलते चलते नारद जी किसी जंगल में पहुंचे , वहाँ पर वही साधु मिले , जिसने उस औरत को बेटे का आशीर्वाद दिया था।
वो साधु नारदजी को पहचानते थे, उन्होंने कहा अरे नारदजी आप इस जंगल में इस वक़्त क्या कर रहे है? 
इस पर नारदजी ने जवाब दिया। मुझे प्रभु ने किसी इंसान का रक्त लाने को कहा है यह सुन कर साधु खड़े हो गये और बोले कि प्रभु ने किसी इंसान का रक्त माँगा है। 
उसने कहा आपके पास कोई छुरी या चाक़ू है। 
नारदजी ने कहा कि वह तो मैं हाथ में लेकर घूम रहा हूँ। 
उस साधु ने अपने शरीर से एक प्याला रक्त दे दिया। नारदजी वह रक्त लेकर नारायण जी के पास पहुंचे और कहा आपके लिए मैं औषधि ले आया हूँ।
नारायण ने कहा यही आपके सवाल का जवाब भी है। 
जिस साधू ने मेरे लिए एक प्याला रक्त मांगने पर अपने शरीर से इतना रक्त भेज दिया। 
क्या उस साधु के दुआ करने पर मैं किसी को बेटा भी नहीं दे सकता। 
उस बाँझ औरत के लिए दुआ आप भी तो कर सकते थे पर आपने ऐसा नहीं किया।रक्त तो आपके शरीर में भी था पर आपने नहीं दिया।

Monday, December 29, 2025

चिड़िया की सीख

एक समय की बात है. एक राज्य में एक राजा राज करता था। उसके महल में बहुत ख़ूबसूरत बगीचा था। बगीचे की देखरेख की ज़िम्मेदारी एक माली के कंधों पर थी. माली पूरा दिन बगीचे में रहता और पेड़-पौधों की अच्छे से देखभाल किया करता था। राजा माली के काम से बहुत ख़ुश था।
बगीचे में एक अंगूर की एक बेल लगी हुई थी, जिसमें ढेर सारे अंगूर फले हुए थे। एक दिन एक चिड़िया बगीचे में आई।उनसे अंगूर की बेल पर फले अंगूर चखे । अंगूर स्वाद में मीठे थे. उस दिन के बाद से वह रोज़ बाग़ में आने लगी।
चिड़िया अंगूर की बेल पर बैठती और चुन-चुनकर सारे मीठे अंगूर खा लेती. खट्टे और अधपके अंगूर वह नीचे गिरा देती. चिड़िया की इस हरक़त पर माली को बड़ा क्रोध आता। वह उसे भगाने का प्रयास करता, लेकिन सफ़ल नहीं हो पाता।
बहुत प्रयासों के बाद भी जब माली चिड़िया को भगा पाने में सफ़ल नहीं हो पाया, तो राजा के पास चला गया। उसने राजा को चिड़िया की पूरी कारिस्तानी बता दी और बोला, “महाराज! चिड़िया में मुझे तंग कर दिया है।उसे काबू में करना मेरे बस के बाहर है. अब आप ही कुछ करें।
राजा ने ख़ुद ही चिड़िया से निपटने का निर्णय किया।अगले दिन वह बाग़ में गया और अंगूर की घनी बेल की आड़ में छुपकर बैठ गया।रोज़ की तरह चिड़िया आई और अंगूर की बेल पर बैठकर अंगूर खाने लगी. अवसर पाकर राजा ने उसे पकड़ लिया।
चिड़िया ने राजा की पकड़ से आज़ाद होने का बहुत प्रयास किया, किंतु सब व्यर्थ रहा।अंत में वह राजा से याचना करने लगी कि वो उसे छोड़ दें. राजा इसके लिए तैयार नहीं हुआ. तब चिड़िया बोली, “राजन, यदि तुम मुझे छोड़ दोगे, तो मैं तुम्हें ज्ञान की ४ बातें बताऊंगी।
राजा चिड़िया पर क्रोधित था, किंतु इसके बाद भी उसने यह बात मान ली और बोला, “ठीक है, पहले तुम मुझे ज्ञान की वो ४ बातें बताओ. उन्हें सुनने के बाद ही मैं तय करूंगा कि तुम्हें छोड़ना ठीक रहेगा या नहीं।
चिड़िया बोली, ठीक है राजन, तो सुनो, पहली बात, कभी किसी हाथ आये शत्रु को जाने मत दो।
ठीक है और दूसरी बात?” राजा बोला।
दूसरी ये है कि कभी किसी असंभव बात पर यकीन मत करो चिड़िया बोली।
तीसरी बात-बीती बात पर पछतावा मत करो और
चौथी बात- राजन! चौथी बात बड़ी गहरी है. मैं तुम्हें वो बताना तो चाहती हूँ, किंतु तुमनें मुझे इतनी जोर से जकड़ रखा है कि मेरा दम घुट रहा है. तुम अपनी पकड़ थोड़ी ढीली करो, तो मैं तुम्हें चौथी बात बताऊं.” चिड़िया बोली,
राजा ने चिड़िया की बात मान ली और अपनी पकड़ ढीली कर दी। पकड़ ढ़ीली होने पर चिड़िया राजा एक हाथ छूट गई और उड़कर पेड़ की ऊँची डाल पर बैठ गई. राजा उसे ठगा सा देखता रह गया।
पेड़ की ऊँची डाल पर बैठी चिड़िया बोली, “राजन! चौथी बात ये कि ज्ञान की बात सुनने भर से कुछ नहीं होता. उस पर अमल भी करना पड़ता है। अभी कुछ देर पहले मैंने तुम्हें ज्ञान की ३ बातें बताई, जिन्हें सुनकर भी आपने उन्हें अनसुना कर दिया। पहली बात मैंने आपसे ये कही थी कि हाथ में आये शत्रु को कभी मत छोड़ना. लेकिन आपने अपने हाथ में आये शत्रु अर्थात् मुझे छोड़ दिया। दूसरी बात ये थी कि असंभव बात पर यकीन मत करें. लेकिन जब मैंने कहा कि चौथी बात बड़ी गहरी है, तो आप मेरी बातों में आ गए। तीसरी बात मैंने आपको बताई थी कि बीती बात पर पछतावा न करें और देखिये, मेरे आपके चंगुल से छूट जाने पर आप पछता रहे हैं। इतना कहकर चिड़िया वहाँ से उड़ गई और राजा हाथ मलता रह गया।
शिक्षा:-
मात्र ज्ञान अर्जित करने से कोई ज्ञानी नहीं बन जाता. ज्ञानी वो होता है, जो अर्जित ज्ञान पर अमल करता है।जीवन में जो बीत गया,उस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं,किंतु वर्तमान हमारे हाथों में हैं।आज का वर्तमान कल के भविष्य कल का निर्माण करेगा।इसलिए वर्तमान में रहकर कर्म करें और अपना भविष्य बनायें..!!

अनमोल कथा

एक बार श्रीराम ब्राम्हणों को भोजन करा रहे थे तभी भगवान शिव ब्राम्हण वेश में वहाँ आये. श्रीराम ने लक्ष्मण और हनुमान सहित उनका स्वागत किया और उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। भगवान शिव भोजन करने बैठे किन्तु उनकी क्षुधा को कौन बुझा सकता था ? बात हीं बात में श्रीराम का सारा भण्डार खाली हो गया। लक्ष्मण और हनुमान ये देख कर चिंतित हो गए और आश्चर्य से भर गए. एक ब्राम्हण उनके द्वार से भूखे पेट लौट जाये ये तो बड़े अपमान की बात थी.उन्होंने श्रीराम से और भोजन बनवाने की आज्ञा मांगी।श्रीराम तो सब कुछ जानते हीं थे, उन्होंने मुस्कुराते हुए लक्ष्मण से देवी सीता को बुला लाने के लिए कहा। सीता जी वहाँ आयी और ब्राम्हण वेश में बैठे भगवान शिव का अभिवादन किया। श्रीराम ने मुस्कुराते हुए सीता जी को सारी बातें बताई और उन्हें इस परिस्थिति का समाधान करने को कहा। सीता जी अब स्वयं महादेव को भोजन कराने को उद्धत हुई. उनके हाथ का पहला ग्रास खाते हीं भगवान शिव संतुष्ट हो गए।भोजन के उपरान्त भगवान शिव ने श्रीराम से कहा कि आकण्ठ भोजन करने के कारण वे स्वयं उठने में असमर्थ हैं इसी कारण कोई उन्हें उठा कर शैय्या पर सुला दे। श्रीराम की आज्ञा से हनुमान महादेव को उठाने लगे मगर आश्चर्य, एक विशाल पर्वत को बात हीं बात में उखाड़ देने वाले हनुमान, जिनके बल का कोई पार हीं नहीं था, महादेव को हिला तक नहीं सके। भला रुद्रावतार रूद्र की शक्ति से कैसे पार पा सकते थे ? हनुमान लज्जित हो पीछे हट गए। फिर श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण ये कार्य करने को आये. अब तक वो ये समझ चुके थे कि ये कोई साधारण ब्राम्हण नहीं हैं। अनंत की शक्ति भी अनंत हीं थी. परमपिता ब्रम्हा, नारायण और महादेव का स्मरण करते हुए लक्ष्मण ने उन्हें उठा कर शैय्या पर लिटा दिया। लेटने के बाद भगवान शिव ने श्रीराम से सेवा करने को कहा. स्वयं श्रीराम लक्ष्मण और हनुमान के साथ भगवान शिव की पाद सेवा करने लगे। देवी सीता ने महादेव को पीने के लिए जल दिया. महादेव ने आधा जल पिया और बांकी जल का कुल्ला देवी सीता पर कर दिया। देवी सीता ने हाथ जोड़ कर कहा कि हे ब्राम्हणदेव, आपने अपने जूठन से मुझे पवित्र कर दिया. ऐसा सौभाग्य तो बिरलों को प्राप्त होता है।ये कहते हुए देवी सीता उनके चरण स्पर्श करने बढ़ी, तभी महादेव उपने असली स्वरुप में आ गए। महाकाल के दर्शन होते हीं सभी ने करबद्ध हो उन्हें नमन किया। भगवान शिव ने श्रीराम को अपने ह्रदय से लगाते हुए कहा कि आप सभी मेरी परीक्षा में उत्तीर्ण हुए. ऐसे कई अवसर थे जब किसी भी मनुष्य को क्रोध आ सकता था किन्तु आपने अपना संयम नहीं खोया। इसी कारण संसार आपको मर्यादा पुरुषोत्तम कहता है। उन्होंने श्रीराम को वरदान मांगने को कहा किन्तु श्रीराम ने हाथ जोड़ कर कहा कि आपके आशीर्वाद से मेरे पास सब कुछ है।अगर आप कुछ देना हीं चाहते हैं तो अपने चरणों में सदा की भक्ति का आशीर्वाद दीजिये महादेव ने मुस्कुराते हुए कहा कि आप और मैं कोई अलग नहीं हैं किन्तु फिर भी देवी सीता ने मुझे भोजन करवाया है इसीलिए उन्हें कोई वरदान तो माँगना हीं होगा।
देवी सीता ने कहा कि हे भगवान, अगर आप हमसे प्रसन्न हैं तो कुछ काल तक आप हमारे राजसभा में कथावाचक बनकर रहें, उसके बाद कुछ काल तक भगवान शिव श्रीराम की सभा में कथा सुना कर सबको कृतार्थ करते रहे।

देवी वेदवती

पुराणों के अनुसार, सतयुग में एक परम तेजस्वी राजा हुए जिनका नाम कुशध्वज था (जो देवगुरु बृहस्पति के पुत्र थे)। उनकी पत्नी मालावती थीं। कठोर तप के बाद उन्हें एक ऐसी कन्या की प्राप्ति हुई, जो साक्षात देवी लक्ष्मी का अंश थीं।जन्म लेते ही इस कन्या के मुख से वेदों का उच्चारण होने लगा, इसी कारण इनका नाम 'वेदवती' पड़ा।वेदवती न केवल अत्यंत रूपवती थीं, बल्कि जन्म से ही वैराग्य और भक्ति में लीन रहती थीं।उनका संकल्प था कि वे त्रिभुवन पति भगवान विष्णु को ही अपने पति के रूप में स्वीकार करेंगी।

कठोर तप और भगवान विष्णु का वचन
अपने संकल्प को पूरा करने के लिए वेदवती ने राजमहल का सुख त्याग दिया और गंधमादन पर्वत पर जाकर घोर तपस्या में लीन हो गईं। उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि एक दिन आकाशवाणी हुई— हे देवी! अगले जन्म में आपको भगवान विष्णु पति रूप में अवश्य प्राप्त होंगे।
किंतु वेदवती ने अपना तप नहीं छोड़ा। अंततः उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रभु नारायण प्रकट हुए और उन्होंने वचन दिया कि, इस जन्म में यह संभव नहीं, परंतु अगले जन्म में जब मैं राम अवतार लूंगा, तब तुम मेरी अर्धांगिनी बनोगी।एक दिन जब वेदवती वन में एकांत में भगवान का ध्यान कर रही थीं, तभी वहां से लंकापति रावण अपने पुष्पक विमान से गुजर रहा था। वेदवती के अलौकिक सौंदर्य और तेज को देखकर रावण अपनी सुध-बुध खो बैठा। कामांध होकर उसने वेदवती के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा।वेदवती ने विनम्रतापूर्वक उसे बताया कि वे भगवान विष्णु की अमानत हैं, लेकिन अहंकारी रावण ने उनकी एक न सुनी। जब उसने वेदवती के साथ बलप्रयोग करने की कोशिश की और उनके केश (बाल) पकड़ लिए, तो वेदवती का क्रोध प्रलयंकारी हो गया।

वेदवती का महाश्राप
अपने तपोबल से वेदवती ने रावण को वहीं जड़वत (स्थिर) कर दिया। रावण का स्पर्श होते ही उन्होंने अपनी देह त्यागने का निर्णय लिया और रावण को वह ऐतिहासिक श्राप दिया जिसने रामायण की रचना की:
दुष्ट! तूने वन में तपस्विनी के साथ अमर्यादित आचरण किया है और मेरे केश पकड़े हैं। अब मैं तेरे सामने ही इस देह का त्याग करती हूं। लेकिन याद रखना, तेरे विनाश के लिए मैं फिर जन्म लूंगी। मैं अयोनिजा (बिना गर्भ के) प्रकट होउंगी और वही मेरा जन्म तेरे और तेरे कुल के सर्वनाश का कारण बनेगा।
यह कहकर वेदवती ने अपनी योग-अग्नि से स्वयं को भस्म कर लिया।वेदवती का वही श्राप त्रेतायुग में सत्य हुआ।
पुनर्जन्म: वेदवती ही बाद में राजा जनक के हल चलाने पर पृथ्वी से 'सीता' के रूप में प्रकट हुईं।
रावण का वध: जिस सीता (वेदवती का स्वरूप) पर रावण ने कुदृष्टि डाली, वही उसके कुल के विनाश का कारण बनीं।
 छाया सीता का रहस्य: कुछ पुराणों (जैसे ब्रह्मवैवर्त पुराण) में यह भी वर्णित है कि वास्तविक सीता का हरण रावण कर ही नहीं सकता था। इसलिए, वनवास के दौरान अग्निदेव की सहायता से 'छाया सीता' (माया सीता) का निर्माण हुआ। रावण ने इसी छाया सीता (जो वेदवती का ही अंश थीं) का हरण किया था।
जब रावण का वध हो गया और सीता जी की अग्नि परीक्षा हुई, तो वह अग्नि परीक्षा वास्तव में छाया सीता (वेदवती) को अग्नि को समर्पित करने और वास्तविक सीता को पुनः प्राप्त करने की लीला थी। इस प्रकार, वेदवती ने अपना बदला पूरा किया और भगवान विष्णु (श्री राम) के चरणों में स्थान प्राप्त किया।

सीख: रावण का बल और ज्ञान उसे बचा नहीं सका क्योंकि स्त्री का अपमान ही उसके पतन का कारण बना। नियति अपना खेल पहले ही रच चुकी थी।

Friday, December 26, 2025

कन्हैया की माखन-मित्र लीला


(जब पाँच वर्ष के नन्हें कृष्ण ने पक्षियों और बंदरों को माखन भेंट किया)

गोकुल की भोर उस दिन कुछ अलग ही थी।
यमुना की लहरें हल्की गुलाबी आभा से चमक रही थीं और सूरज की पहली किरण नंदभवन की खिड़कियों को स्वर्ण-सी ज्योति से नहला रही थी।
इसी खिड़की पर, एक छोटी-सी मूर्त्ति-से प्यारे बालक बैठे थे—
हमारे पाँच वर्ष के नन्हें कन्हैया!
घुँघराले बाल, माथे पर चंद्र-सी तिलकमाला, और गोरी-गुलाबी मुस्कान।
उनकी गोद में थी—एक बड़ी-सी माखन की मटकी,
जिसे यशोदा माँ ने छुपाकर रखा था… पर कन्हैया तो सब जानते थे—माखन का ठिकाना, दुनिया का सबसे बड़ा रहस्य!

पक्षियों का आगमन
कन्हैया ने मटकी से एक मुट्ठी माखन निकाला और खिड़की पर रखा।
तभी फुदकते हुए नीले पंखों वाले चिड़ियाँ, मैना, गौरैया, लाल टिटहरी—एक-एक करके आने लगीं।
कृष्ण ने हँसते हुए कहा—
“आओ रे मेरे नन्हे साथी! ये माखन सिर्फ मेरे लिए नहीं है… श्रीहरि का भोजन कोई अकेले खाए भला?”
पक्षियों ने चहचहाकर उत्तर दिया, जैसे कह रहे हों—
“कन्हैया! हम तो बस तुम्हारी झलक भर से तृप्त हो जाते हैं।”
कन्हैया ने उन्हें अपने छोटे-छोटे हाथों से माखन खिलाया।
जो चिड़ियाँ डरती थीं, उन्हें वे उंगली से पास बुलाते—
“डर मत, मैं तो तुम्हारा कान्हा हूँ।”

बंदरों का माखन-प्रसाद
थोड़ी देर बाद पेड़ की टहनी से एक समूह बंदर कूदता हुआ आया।
वे माखन की सुगंध दूर से ही पहचान लेते थे।
कन्हैया ने हँसकर कहा—
“लो, तुम लोग भी आ गए! पर झगड़ा मत करना, सबको मिलेगा!”
एक छोटा बंदर ज़रा पास आने में झिझक रहा था।
कृष्ण ने मटकी आगे बढ़ाकर कहा—
“तू सबसे छोटा है न? पहले तुझे दूँगा।”
छोटे बंदर ने कन्हैया का हाथ पकड़कर माखन को नन्हीं आँखों से देखा—
और उसने जैसे ही पहला निवाला लिया, उसके चेहरे पर शुद्ध प्रेम की चमक फैल गई।

ब्रजवासियों की विस्मय-भरी दृष्टी
कुछ ग्वालिनें यह दृश्य देखकर रुक गईं।
एक बोली—
“अरे, हम सोचते थे यह माखन चोर है… पर यह तो संसार का दाता है!”
दूसरी ने कहा—
“जो स्वयं ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं, वे क्या चुराएँगे?
वे तो अपने हाथों से बाँटने आए हैं।”
नंदभवन के बाहर यह प्रेम लीला देखकर सबका हृदय पिघल रहा था।

कन्हैया की अद्वितीय शिक्षा
जब सभी पक्षी और बंदर तृप्त हो गए,
कन्हैया ने माखन की मटकी को हल्का-सा झुकाया और बचे हुए माखन को अपनी हथेलियों पर लगाया।
मुस्कुराकर बोले—
“यशोदा माँ सोचती हैं कि मैं माखन चुराकर खाता हूँ…
पर माँ को कैसे बताऊँ कि ये माखन मैं अपने परिवार को—
पक्षियों को, बंदरों को, गोकुल के जीवों को खिलाता हूँ…
क्योंकि ये सब मेरे अपने हैं।”
उनकी आँखों में करुणा और प्रेम की दिव्यता चमक उठी।

लीला का फल
उस सुबह के बाद,
पक्षी जब भी उड़ते, कन्हैया की खिड़की पर बैठते।
बंदर दरबार लगाते।
और यशोदा माँ आश्चर्य करतीं—
“ये माखन जल्दी क्यों खत्म हो जाता है?”
कन्हैया बस मुस्कुराते हुए कहते—
“माँ! माखन जितना बाँटो उतना बढ़ता है…
जैसे प्रेम बढ़ता है।”
और उस दिन से, गोकुल में यह कथा गूंजने लगी—
“जिसका दिल ब्रह्मांड से बड़ा हो,
उसके घर की मटकी कभी खाली नहीं होती।”