महामंत्र > हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे|हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे||

Saturday, April 5, 2025

काला टीका

 ऋषि -चिंतन 

एक बार किसी ने भगवान से पूछ दिया महाराज आपने नारद के चरित्र में कलंक क्यों लगवा दिया ? क्योंकि नारद जैसे महात्मा, जिन्होंने काम, क्रोध तथा लोभ तीनों को जीत लिया, पर बीच में आपने विश्वमोहिनी के चक्कर में उन्हें डाल दिया ? भगवान बोले - बात यह है कि अगर बच्चा बहुत सुन्दर हो, तो माँ को बड़ी चिन्ता होती है कि इसको कहीं नजर न लग जाय और नजर से बचाने के लिए माँ एक काला टीका तो अवश्य ही लगा देती है। इसी प्रकार मैंने भी देखा कि नारद ने तो काम, क्रोध, लोभ को जीत लिया है, अब बस इसको नजर लगने ही वाली है। नजर लगने का भी रामचरितमानस में भगवान् राम के संदर्भ में बड़ा सांकेतिक अर्थ दिया गया है।
रामायण में वर्णन आता है कि नजर तीन तरह से लगती है। बालकाण्ड में लिखा है कि कौशल्या जी, सुमित्रा जी, और कैकेयी जी श्रीराम को देखने के पूर्व हाथ में एक तिनका ले लेती हैं और उस तिनके को तोड़ कर फिर श्रीराम को देखती हैं, सीधे श्री राम को नहीं देखतीं - निरखहिं छबि जननी तृन तोरी।
किन्तु तिनके को पहले तोड़कर फिर श्रीराम को देखने का सीधा-सा तात्पर्य है कि माताएँ सोचती हैं कि कहीं हमारी नजर श्रीराम को न लग जाय इसलिए तिनके पर ही सारी नजर का प्रभाव डालकर इसे ही कष्ट में डाल दो और श्रीराम की सुन्दरता को बचाओ। पर 'गीतावली रामायण' में गोस्वामीजी कहते हैं कि जब श्रीराम रोने लगे तो माताओं को लगा कि अवश्य किसी की नजर हमारे बालक को लग गई है। परन्तु किसकी लगी है ? तो उन्होंने विचार किया कि लगता है किसी बुरी स्त्री की नजर लग गई। किन्तु अब क्या किया जाय ? तो तुरन्त गुरु वसिष्ठ को सूचना दी गई। वसिष्ठ जी आए, और, उन्होंने श्रीराम को गोद में ले लिया तथा जो नजर बालक पर पड़ी थी उसे उतारकर उन्हें कौशल्या जी की गोदी में दे दिया। नजर उतरते ही बालक राम दूध पीने लगे।
नजर लगने के तीसरे एक विलक्षण रूप का गोस्वामीजी ने 'गीतावली रामायण' में वर्णन करते हुए लिखा कि श्री राम एक दिन आँगन में खेल रहे थे, और आँगन में जो मणि का खम्भ बना था, अचानक उस ओर भगवान श्रीराम की दृष्टि गई। श्रीराम का प्रतिरूप जब उसमें दिखाई देने लगा तो श्री राम अपने रूप को देखकर इतने मग्न हो गए कि खेलना छोड़कर वे खम्भे की ही ओर देखने लग गए। यह दृश्य सुमित्रा अम्बा देख रही थीं। वे तुरन्त भागी हुई आयीं और आते ही उन्होंने सबसे पहले बालक राम की आँखों पर अपना हाथ रखकर उनकी आँखें बन्द कर दीं। माँ से किसी ने पूछ दिया कि आप श्री राम की आँखें क्यों बन्द कर रही हैं ? माँ ने कहा कि मुझे डर है कि कहीं श्रीराम को श्रीराम, की ही नजर न लग जाय। तो भई ! नजर लगने वाली बात बड़ी अटपटी है। क्योंकि अपनों की नजर लग जाती है, औरों की लग जाती है तथा अपनी भी लग जाया करती है। व्यवहार में हमारे-आपके जीवन में तीनों प्रकार की स्थिति आती है। अपनों की स्नेहभरी दृष्ठि भी लग जाती है,परायों की बुरी दृष्टि लग जाती है, पर सबसे बड़ी बात है कि कभी-कभी हमें अपनी ही दृष्टि लग जाती है कि हम कितने बड़े गुणवान हैं, हम बड़े श्रेष्ठ हैं और हम बड़े सुन्दर हैं। रामायण में इन तीनों दृष्टियों से बचने का उपाय बताया गया है।
भगवान से जब नारद के सन्दर्भ में भक्त ने प्रश्न किया तो भगवान ने कहा कि नारद को दोनों की ही दृष्टि लग गई। क्योंकि एक तो नारद को काम की दृष्टि लग गई, पर उससे भी बड़ा संकट तब पैदा हो गया जब उन्हें अपनी ही दृष्टि लगने लगी। जब नारद ने काम, क्रोध तथा लोभ को हरा दिया तो काम ने आकर चरणों में प्रणाम किया पर जाते-जाते वह नजर लगाता गया। काम ने कहा -- महाराज  आज तक बड़े-बड़े महात्मा उत्पन्न हुए पर आप जैसा कोई नहीं हुआ। किन्तु उसके बाद सबसे बड़ी बात यह हुई है कि काम का वाक्य सुनकर नारद जी अपने आप को देखकर सोचने लगे कि सचमुच मुझमें इतने अधिक गुण हैं और तब भगवान ने काला टीका लगा दिया। उन्हें लगा की नारद के मन में अभिमान उत्पन्न हो गया कि मैं इतना चरित्रवान हूँ। मैं काम क्रोध और लोभ आदि का विजेता हूँ। भगवान ने कहा - नारद तो मेरा नन्हा बालक है। और जैसे बालक को नजर लग जाय तो वह रुग्ण हो जाता है तथा माँ उसकी रुग्णता को दूर करने की चेष्टा करती है, इसी प्रकार नारद को बचाने के लिए मैंने यह खेल किया। वस्तुतः विश्वमोहिनी के प्रति नारद के मन में जो आकर्षण उत्पन्न हुआ, उसके द्वारा मैंने नारद का अभिमान शिथिल कर दिया। बस, यही काला टीका है।

विद्या प्रतिष्ठा न धनं प्रतिष्ठा साऽप्यप्रतिष्ठा विनयव्यपेता ।
 गुणा: प्रतिष्ठा न कुलं प्रतिष्ठा तेऽप्यप्रतिष्ठा यदि नात्मनिष्ठा ।।
विद्या से प्रतिष्ठा होती है, धन से प्रतिष्ठा नहीं । वह भी विद्या विनय के बिना अप्रतिष्ठा होती है । गुणों से प्रतिष्ठा है, कुल से प्रतिष्ठा नहीं । वे गुण यदि आत्मनिष्ठ  नहीं हैं तो अप्रतिष्ठा के कारण बनते हैं। अपने मन को इतना मजबूत बनाये कि,किसी के भी व्यवहार से मन की शांति भंग न होने पाए!
"सम्बन्ध"- मात्र एक शब्द नहीं,अपितु त्याग बलिदान और समर्पण से भरा सम्पूर्ण ग्रन्थ है।

Thursday, April 3, 2025

देवरानी - जेठानी

दीपा और नीता दोनों जेठानी-देवरानी। दीपा नौकरी करती थी और नीता घर संभालती थी। भरा-पूरा परिवार था, सास-ससुर, दोनों के दो बच्चे कुल १० लोगों का परिवार। कई सालों बाद दोनों की बुआ सास कुछ दिन अपने भाई के पास रहने आई। सुबह उठते ही बुआ जी ने देखा दीपा जल्दी-जल्दी अपने काम निपटा रही थी। नीता ने सब का नाश्ता, टिफिन बनाया जिसे दीपा ने सब को परोसा, टिफिन पैक किया और चली गई ऑफिस। नीता ने फिर दोपहर का खाना बनाया और बैठ गयी थोड़ा सास और बुआ सास के पास।
बुआ जी से रहा नहीं गया बोली "छोटी बहू तेरी जेठानी तो अच्छा हुकुम चलाती है तुझ पर, सुबह से देख रही हूं रसोई घर में तू लगी है और वो महारानी दिखावा करने के लिए सबको नाश्ता परोस रही थी जैसे उसी ने बनाया हो।"
नीता और सास ने एक दूसरे को देखा, नीता बोली "नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है बुआ जी।"
बुआ जी बोली "तू भोली है, पर मैं सब समझती हूं।"
नीता से अब रहा नहीं गया और बोली "बुआ जी आपको दीपा दीदी का बाकी सबको नाश्ता परोसना दिखा, शायद ये नहीं दिखा कि उन्होंने मुझे भी सबके साथ नाश्ता करवाया। मुझे डांट कर पहले चाय पिलाई, नहीं तो सबको खिलाकर और टिफिन पैक करने में मेरा नाश्ता तो ठंडा हो चुका रहता या मैं खाती ही नहीं। दीदी सुबह उठकर मंदिर की सफाई करके फूल सजाकर रखती हैं तो मम्मी जी का पूजा करने में अच्छा लगता है। मैं तो नहा कर आते ही रसोई में घुस जाती हूं। शाम को आते हुए दीदी सब्जियां भी लेकर आती हैं क्योंकि आपके भतीजों को रात लेट हो जाती है, तब ताजी सब्जियां नहीं मिलती। ऑफिस में कितनी मेहनत करनी पड़ती है, फिर ऑफिस में काम करके आकर रात को खाना बनाने में मेरी मदद करती हैं। वो मेरी जेठानी नहीं मेरी बड़ी बहन हैं, मैं नहीं समझूंगी तो कौन समझेगा?"
बुआ जी चुप हो गई। शाम को दीपा सब्जी की थैली नीता को पकड़ाते हुए बोली "इसमें तुम्हारी फेवरेट लेखक की किताब है निकाल लेना।"
नीता खुश हो गई और बोली "थैंक्स दीदी।" नीता सब्जी की थैली किचन में रखी और किताब रखने अपने कमरे में चली गई। बुआ जी ने दीपा को आवाज दी "बड़ी बहू, यहां आना।"
दीपा बोली "जी बुआ जी?"
बुआ जी बोली "तुम इतनी मेहनत करके कमाती हो और ऐसे फालतू किताबों में पैसे व्यर्थ करती हो, वो भी अपनी देवरानी के लिए। वो तो वैसे भी घर में करती ही क्या है? तुम दिन भर मेहनत करती हो और वो घर पर आराम।"
दीपा मुस्कुराई बोली "आराम? नीता को तो जबरदस्ती आराम करवाना पड़ता है। सुबह से बेचारी लगी रहती है किचन में सबकी अलग-अलग पसंद, चार बच्चों का टिफिन, सब बनाती है वो भी प्यार से। सुबह की चाय पीने का भी सुध नहीं रहता उसे, दोपहर को जब बच्चे आते हैं फिर उनका खाना, उनकी पढ़ाई सब वही देखती है। वो है इसलिए मुझे ऑफिस में बच्चों की चिंता नहीं रहती। मैं अपना पूरा ध्यान ऑफिस में लगा पाती हूं। कुछ दिन पहले ही प्रमोशन मिला है।
मम्मी पापा की दवाई कब खत्म हुई, कब लानी है उसे पता होता है। रिश्तेदारों के यहां कब फंक्शन है क्या देना है सब ध्यान रहता है उसे। घर संभालना कोई छोटी बात नहीं है। मेहमानों की आवभगत बिना किसी शिकायत के करती है। उसे बस पढ़ने का शौक है, फिर मैं अपनी छोटी बहन की छोटी सी इच्छा पूरी नहीं करुंगी तो कौन करेगा? बुआ जी की बोलती फिर बंद हो गई।
दीपा वहां से उठ कर चली गई। ये सारी बात सास पूजा करते हुए सुन रही थी। बुआ जी के पास आकर बोली "जीजी ये दोनों देवरानी जेठानी सगी बहन जैसी हैं और एक दूसरे का अधूरापन पूरा करती हैं। मेरे घर की मजबूत नींव है ये दोनों जिसे हिलाना नामुमकिन है। ऐसी बातें तो कई लोगों ने दोनों को पढ़ाना चाही, पर मजाल है दोनों ने सामने वाले की बोलती बंद ना की हो?" और सास मुस्कुरा दी। 
बुआ जी की बोलती अब पूरी तरह बंद हैं।

भागवत भक्त काशी

विश्वनाथ काशी जी (बनारस) में एक संत हुए। जिनका नाम भी काशी ही था उनका प्रतिदिन गंगा घाट पर जाकर भागवत पढ़ने का ही नियम था। वह बचपन से ही ऐसा करते थे। काम धंधा तो कुछ नही था बस भागवत जी मे ही मन रमा था इसलिए गंगा घाट पर भागवत पढ़ने का ही कार्य था।माता-पिता को लगा-- काशी का विवाह करवा देते हैं। जब उसके ऊपर जिम्मेवारी पड़ेगी तो वह जरूर कोई ना कोई काम धंधा करेगा । परंतु काशी विवाह के बाद भी ऐसा ही बना रहा।
जब तक माता-पिता थे। जैसे- कैसे घर का गुजारा चल रहा था। माता-पिता के गुजर जाने के बाद घर का गुजारा चलाना बड़ा मुश्किल हो गया। अब काशी की पत्नी ने काशी को कहा- मुझे खाना बनाने का काम बहुत अच्छे से आता है। मैं दो-चार घरों में जाकर खाना बनाने का काम कर लेती हूं।
काशी ने कहा- बहुत अच्छा देवी। जैसे तुम्हें ठीक लगे। काशी को तो बस भागवत जी मे ही आनन्द मिलता था उसमें ही प्रभु का दर्शन होता था इसके अतिरिक्त कुछ और सोच ही नही पाते थे।
एक दिन उस गांव में वैष्णव संतो की टोली आई। उन्होंने गांव वालों को पूछा-- किसी वैष्णव का घर है। जहां पर हम भोजन पा सकते हैं। गांव वालों ने उन वैष्णव संतो को काशी का घर बता दिया।
वैष्णव संत काशी के घर पहुंचे। वहां काशी की पत्नी थी। उन्होंने काशी की पत्नी से कहा-- देवी हम 10 लोग हैं। और 10 लोग भोजन पाना चाहते हैं। भोजन पाकर हम आगे तीर्थ पर जाएंगे।
 काशी की पत्नी संतो को देखकर बहुत प्रसन्न हुई । परंतु काशी के घर में इतना भोजन नहीं था। कि 10 लोगों को खिला सके काशी की पत्नी ने अपने सारे खाने के डिब्बे खोलकर देखें कोई ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती थी। जिससे कुछ बनाया जा सके। उसके पास इतने पैसे भी नहीं थे। जाकर बाजार से कुछ ले आती।
वह हैरान परेशान कभी इधर बैठे कभी उधर बैठे। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। संत थोड़ी देर में सारी बात समझ गए उन्होंने कहा-- बेटी अब हम चलते हैं। भोजन का क्या है। हम वापसी में तुम्हारे घर पर रूक कर पा लेंगे।
आज वैष्णव संत बिना भोजन किए चले गए। काशी की पत्नी को बहुत क्रोध आया। आज तो उसने भागवत जी को ही उठाकर पटक दिया। उसने काशी को बहुत फटकार लगाई और कहा-- यह भागवत तुम्हें क्या दे रही है? कुछ काम धंधा करो जाकर।
काशी ने अपनी पत्नी को बहुत समझाया। मेरे लिए यह भागवत नहीं है। मुझे इसके एक-एक अक्षर में कृष्ण भगवान दिखाई देते हैं। उनकी मोहिनी सूरत को मैं छोड़ नहीं सकता।
परंतु आज काशी की पत्नी कुछ समझने को तैयार नहीं थी काशी भागवत लेकर गंगा किनारे बैठ गया और रोने लगा मुझे नहीं पता मेरी भागवत मुझे क्या दे रही है। पर मुझे अंदर से एक अद्भुत आनंद आता है।
तभी एक छोटा सा बालक सांवली सूरत वाला घुंघराले बाल वाला एक टोकरी लेकर काशी के घर गया और काशी की पत्नी को कहा-- तुम्हारा पति काफी दिनो से किसी के लिए भागवत कर रहा था। जिस यजमान के लिए वह काफी दिनों से गंगा किनारे भागवत कर रहा था। उन यजमान ने आज तक की दक्षिणा भेजी है। उस टोकरी के ऊपर एक लाल कपड़ा ढका हुआ था।
उस बालक ने एक कागज पर कुछ लिखा और उसकी पत्नी को कहा-- यह काशी को दे देना।वह बालक थोड़ी देर में चला गया। काशी की पत्नी ने बालक के जाने के बाद जैसे ही टोकरी के ऊपर से लाल कपड़ा हटाया उसमें हीरे, मोती, मणियां भरी पड़ी थी।अब तो काशी की पत्नी बहुत खुश हुई। उसने सोचा मेरा पति तो बड़ा छुपा रुस्तम निकला। किसी को कुछ बताया भी नहीं और किसी के लिए चुपचाप भागवत कर रहे थे।
उसने अपने पुत्र के हाथ काशी को बुलाया। उसने अपने पुत्र से कहा-- तुम्हारे पिताजी जहां भी हो उनको ढूंढ कर लाओ। उनके पुत्र ने उन्हें गंगा घाट पर ढूंढ लिया और कहा- माता जी आपको बुला रही है।
काशी सोच रहा था। न जाने और कितनी गालियां अभी उसने मुझे देनी होगी। काशी मन मारकर घर गया। आज उसे घर कुछ बदला बदला सा लगा उसकी पत्नी ने भी सुंदर साड़ी पहन रखी थी।
उसने अपनी पत्नी से कहा- देवी क्या बात है। आज घर कुछ बदला बदला सा लग रहा है। और तुम भी सुंदर दिख रही हो।
अब काशी की पत्नी बोली- ज्यादा बनो मत। आज ही मैंने तुम्हें फटकार लगाई। आज ही तुमने मुझे इतनी सारी दौलत दे दी। अब तक छुपा के रखी हुई थी। अब तो तुम मेरी तरफ से रोज भागवत पढ़ो मुझे कोई दिक्कत नहीं है।
काशी को लगा- उसकी पत्नी उसे ताने मार रही है। परंतु तभी उसकी पत्नी ने वह टोकरी दिखाई जिसमें हीरे मोती माणिक भरे पड़े थे।
उसकी पत्नी ने काशी को सारी बात बताई किस तरह एक बालक यह टोकरी देकर गया है। 
काशी ने पूछा- वह बालक कैसा था? काशी की पत्नी ने कहा-- सांवला रूप घुंघराले बाल।
काशी की पत्नी ने कहा- वह तुम्हारे लिए एक पर्चा भी देकर गया है।
काशी ने जैसे ही वह पर्चा खोलकर पढ़ा। उस पर्चे में लिखा था- भागवत क्या नहीं दे सकती। भागवत सब कुछ दे सकती है। जो इच्छा चाहो वह भागवत पूरी कर सकती है। परंतु तुमने तो कभी कोई इच्छा की ही नहीं थी।

 कथा का मर्मज्ञ कहता है कि अपने दैनिक कार्यों के साथ साथ आप कोई भी शास्त्र चाहे वह श्री रामायण जी हैं, श्री भागवत जी हैं या श्री गीता जी हैं। उनका रोज थोड़ा-थोड़ा अध्ययन दर्शन करेंगे तो वह आपको सब कुछ दे सकती है जो आप चाहो। क्योंकि शास्त्र भी भगवान का ही स्वरुप है। हमारे शास्त्र सबसे पहले हमें जीने का तरीका ही सीखाते हैं।

कहाँ हो भगवन

उस दिन सबेरे 6 बजे मैं अपने शहर से दूसरे शहर जाने के लिए निकली, मैं रेलवे स्टेशन पहुंची , पर देरी से पहुचने कारण मेरी ट्रेन निकल चुकी थी, मेरे पास 9.30 की ट्रेन के आलावा कोई चारा नही था, मैंने सोचा कही नाश्ता कर लिया जाए, बहुत जोर की भूख लगी थी मैं होटल की ओर जा रही थी। अचानक रास्ते में मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे दो बच्चों पर पड़ी, दोनों लगभग 10-12 साल के रहे होंगे बच्चों की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। कमजोरी के कारण अस्थिपिंजर साफ दिखाई दे रहे थे, वे भूखे लग रहे थे। छोटा बच्चा बड़े को खाने के बारे में कह रहा था, बड़ा उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था, मैं अचानक रुक गई दौड़ती भागती जिंदगी में पैर ठहर से गये। उनको को देख मेरा मन भर आया , सोचा इन्हें कुछ पैसे दे दिए जाए, मैंने उन्हें ५ रु दे कर आगे बढ़ गई। तुरंत मेरे मन में एक विचार आया कितनी कंजूस हूं मैं, ५ रु क्या खाएंगे ये चाय तक ढंग से न मिलेगी, स्वयं पर शर्म आयी और वापस लौटी। मैंने बच्चों से कहा,कुछ खाओगे ? 
बच्चे थोड़े असमंजस में पड़े मैंने कहा बेटा मैं नाश्ता करने जा रही हूं, तुम भी कर लो, वे दोनों भूखे थे तुरंत तैयार हो गए। उनके कपड़े गंदे होने के कारण होटल वाले ने उनको डांट दिया और भगाने लगा, मैंने कहा भाई साहब उन्हें जो खाना है वो उन्हें दो पैसे मैं दूंगी। होटल वाले ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा उसकी आँखों में उसके बर्ताव के लिए शर्म साफ दिखाई दी। बच्चों ने नाश्ता मिठाई व् लस्सी मांगी। सेल्फ सर्विस के कारण मैंने नाश्ता बच्चों को लेकर दिया बच्चे जब खाने लगे, उनके चेहरे की ख़ुशी देखने वाली थी, मैंने बच्चों को कहा बेटा अब जो मैंने तुम्हे पैसे दिए है उसमे 1 रु का शैम्पू ले कर हैण्ड पम्प के पास नहा लेना और फिर दोपहर शाम का खाना पास के मन्दिर में चलने वाले लंगर में खा लेना, और मैं नाश्ते के पैसे दे कर फिर अपनी दौड़ती दिनचर्या की ओर निकल गई। वहा आसपास के लोग बड़े सम्मान के साथ देख रहे थे होटल वाले के शब्द आदर मे परिवर्तित हो चुके थे। मैं स्टेशन की ओर निकली, थोडा मन भारी लग रहा था मन उनके बारे में सोच कर दुखी हो रहा था। रास्ते में मंदिर आया मैंने मंदिर की ओर देखा और कहा ,हे भगवान आप कहा हो ? इन बच्चों की ये हालत ये भूख देख आप कैसे चुप बैठ सकते है।
दूसरे ही क्षण मेरे मन में विचार आया, पुत्री अभी तक जो उन्हें नाश्ता दे रहा था वो कौन था? क्या तुम्हें लगता है तुमने वह सब अपनी सोच से किया। मैं स्तब्ध हो गई, मेरे सारे प्रश्न समाप्त हो गए। ऐसा लगा जैसे मैंने ईश्वर से बात की हो। मुझे समझ आ चुका था हम निमित्त मात्र है, उसकी लीला अपरंपार है,भगवान हमे किसी की मदद करने तब ही भेजता है जब वह हमे उस काम के लायक समझता है, किसी की मदद को मना करना वैसा ही है जैसे भगवान के काम को मना करना। खुद में ईश्वर को देखना ही ध्यान है, दुसरो में ईश्वर को देखना प्रेम है, ईश्वर को सब में और सब में ईश्वर को देखना ज्ञान है।

भक्त और भगवान का संबंध

एक बार की बात है एक संत जग्गनाथ पूरी से मथुरा की ओर आ रहे थे उनके पास बड़े सुंदर ठाकुर जी थे । वे संत उन ठाकुर जी को हमेशा साथ ही लिए रहते थे और बड़े प्रेम से उनकी पूजा अर्चना कर लाड लड़ाया करते थे। ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने ठाकुर जी को अपनें बगल की सीट पर रख दिया और अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए। जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे तब वे सत्संग में इतनें मग्न हो चुके थे कि झोला गाङी में ही रह गया उसमें रखे ठाकुर जी भी वहीं गाडी में रह गए । संत सत्संग की मस्ती में भावौं मैं ऐसा बहे कि ठाकुर जी को साथ लेकर आना ही भूल गए । बहुत देर बाद जब उस संत के आश्रम पर सब संत पहुंछे और भोजन प्रसाद पाने का समय आया तो उन प्रेमी संत ने अपने ठाकुर जी को खोजा और देखा की हाय हमारे ठाकुर जी तो हैं ही नहीं । संत बहुत व्याकुल हो गए , बहुत रोने लगे परंतु ठाकुर जी मिले नहीं । उन्होंने ठाकुर जी के वियोग अन्न जल लेना स्वीकार नहीं किया ।संत बहुत व्याकुल होकर विरह में अपने ठाकुर जी को पुकारकर रोने लगे । तब उनके एक पहचान के संत ने कहा - महाराज मै आपको बहुत सुंदर चिन्हों से अंकित नये ठाकुर जी दे देता हूँ परंतु उन संत ने कहा की हमें अपने वही ठाकुर चाहिए जिनको हम अब तक लाड लड़ते आये है ।
तभी एक दूसरे संत ने पूछा - आपने उन्हें कहा रखा था ? मुझे तो लगता है गाडी में ही छुट गए होंगे। 
एक संत बोले - अब कई घंटे बीत गए है । गाडी से किसीने निकाल लिए होंगे और फिर गाडी भी बहुत आगे निकल चुकी होगी । 
इस पर वह संत बोले- मै स्टेशन मास्टर से बात करना चाहता हूँ वहाँ जाकर ।सब संत उन महात्मा को लेकर स्टेशन पहुंचे । स्टेशन मास्टर से मिले और ठाकुर जी के गुम होने की शिकायत करने लगे । उन्होंने पूछा की कौनसी गाडी में आप बैठ कर आये थे ।
संतो ने गाडी का नाम स्टेशन मास्टर को बताया तो वह कहने लगा - महाराज ! कई घंटे हो गए ,यही वाली गाडी ही तो यहां खड़ी हो गई है , और किसी प्रकार भी आगे नहीं बढ़ रही है । न कोई खराबी है न अन्य कोई दिक्कत कई सारे इंजीनियर सब कुछ चेक कर चुके है परंतु कोई खराबी दिखती है नही । महात्मा जी बोले - अभी आगे बढ़ेगी ,मेरे बिना मेरे प्यारे कही अन्यत्र कैसे चले जायेंगे ? वे महात्मा अंदर ट्रेन के डिब्बे के अंदर गए और ठाकुर जी वही रखे हुए थे जहां महात्मा ने उन्हें पधराया था । अपने ठाकुर जी को महात्मा ने गले लगाया और जैसे ही महात्मा जी उतरे गाडी आगे बढ़ने लग गयी । ट्रेन का चालाक , स्टेशन मास्टर तथा सभी इंजीनियर सभी आश्चर्य में पड गए और बाद में उन्होंने जब यह पूरी लीला सुनी तो वे गद्गद् हो गए । उसके बाद वे सभी जो वहां उपस्थित उन सभी ने अपना जीवन संत और भगवन्त की सेवा  में लगा दिया।
भक्तो भगवान जी भी खुद कहते है ना भक्त जहाँ मम पग धरे, तहाँ धरूँ में हाथ,
सदा संग लाग्यो फिरूँ, कबहू न छोडू साथ, मत तोला कर इबादत को अपने हिसाब से, ठाकुर जी की रहमतें देखकर अक्सर तराज़ू टूट जाते हैं ।

Sunday, March 30, 2025

क्षमा

देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्‌। 
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि॥

 सेठ जी ने अपने छोटे भाई को तीन लाख रूपये व्यापार के लिये दिये। उसका व्यापार बहुत अच्छा जम गया, लेकिन उसने रूपये बड़े भाई को वापस नहीं लौटाये। आखिर दोनों में झगड़ा हो गया, झगड़ा भी इस सीमा तक बढ़ गया कि दोनों का एक दूसरे के यहाँ आना जाना बिल्कुल बंद हो गया। घृणा व द्वेष का आंतरिक संबंध अत्यंत गहरा हो गया। सेठ जी, हर समय हर संबंधी के सामने अपने छोटे भाई की निंदा-निरादर व आलोचना करने लगे। सेठ जी अच्छे साधक भी थे, लेकिन इस कारण उनकी साधना लड़खड़ाने लगी। भजन पूजन के समय भी उन्हें छोटे भाई का चिंतन होने लगा। मानसिक व्यथा का प्रभाव तन पर भी पड़ने लगा। बेचैनी बढ़ गयी। समाधान नहीं मिल रहा था। आखिर वे एक संत के पास गये और अपनी व्यथा सुनायी। संतश्री ने कहाः- बेटा ! तू चिंता मत कर। ईश्वरकृपा से सब ठीक हो जायेगा। तुम कुछ फल व मिठाइयाँ लेकर छोटे भाई के यहाँ जाना और मिलते ही उससे केवल इतना कहना, अनुज ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा कर दो।
सेठ जी ने कहा महाराज  मैंने ही उनकी मदद की है और क्षमा भी मैं ही माँगू।
     संतश्री ने उत्तर दिया परिवार में ऐसा कोई भी संघर्ष नहीं हो सकता, जिसमें दोनों पक्षों की गलती न हो। चाहे एक पक्ष की भूल एक प्रतिशत हो दूसरे पक्ष की निन्यानवे प्रतिशत, पर भूल दोनों तरफ से होगी। सेठ जी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। 
उसने कहा महाराज  मुझसे क्या भूल हुई
बेटा  तुमने मन ही मन अपने छोटे भाई को बुरा समझा यही है तुम्हारी पहली भूल।तुमने उसकी निंदा आलोचना व तिरस्कार किया  यह है तुम्हारी दूसरी भूल। क्रोध पूर्ण आँखों से उसके दोषों को देखा यह है तुम्हारी तीसरी भूल। अपने कानों से उसकी निंदा सुनी यह है तुम्हारी चौथी भूल। तुम्हारे हृदय में छोटे भाई के प्रति क्रोध व घृणा है यह है तुम्हारी आखिरी भूल। अपनी इन भूलों से तुमने अपने छोटे भाई को दुःख दिया है। तुम्हारा दिया दुःख ही कई गुना हो तुम्हारे पास लौटा है। जाओ, अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगों। नहीं तो तुम न चैन से जी सकोगे, न चैन से मर सकोगे। क्षमा माँगना बहुत बड़ी साधना है। ओर तुम तो एक बहुत अच्छे साधक हो। सेठ जी की आँखें खुल गयीं। संतश्री को प्रणाम करके वे छोटे भाई के घर पहुँचे। सब लोग भोजन की तैयारी में थे। उन्होंने दरवाजा खटखटाया। दरवाजा उनके भतीजे ने खोला। सामने ताऊ जी को देखकर वह अवाक् सा रह गया और खुशी से झूमकर जोर-जोर से चिल्लाने लगा मम्मी पापा देखो कौन आये ! ताऊ जी आये हैं, ताऊ जी आये हैं।
माता-पिता ने दरवाजे की तरफ देखा। सोचा कहीं हम सपना तो नहीं देख रहे। छोटा भाई हर्ष से पुलकित हो उठा, अहा ! पन्द्रह वर्ष के बाद आज बड़े भैया घर पर आये हैं। प्रेम से गला रूँध गया, कुछ बोल न सका। सेठ जी ने फल व मिठाइयाँ टेबल पर रखीं और दोनों हाथ जोड़कर छोटे भाई को कहा भाई सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा करो । क्षमा शब्द निकलते ही उनके हृदय का प्रेम अश्रु बनकर बहने लगा। छोटा भाई उनके चरणों में गिर गया और अपनी भूल के लिए रो-रोकर क्षमा याचना करने लगा। बड़े भाई के प्रेमाश्रु छोटे भाई की पीठ पर और छोटी भाई के पश्चाताप व प्रेममिश्रित अश्रु बड़े भाई के चरणों में गिरने लगे।
     क्षमा व प्रेम का अथाह सागर फूट पड़ा। सब शांत, चुप, सबकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी। छोटा भाई उठ कर गया और रूपये लाकर बडे भाई के सामने रख दिये। बडे भाई ने कहा भाई आज मैं इन कौड़ियों को लेने के लिए नहीं आया हूँ। मैं अपनी भूल मिटाने, अपनी साधना को सजीव बनाने और द्वेष का नाश करके प्रेम की गंगा बहाने आया हूँ ।
     मेरा आना सफल हो गया, मेरा दुःख मिट गया। अब मुझे आनंद का एहसास हो रहा है।
    छोटे भाई ने कहा भैया जब तक आप ये रूपये नहीं लेंगे तब तक मेरे हृदय की तपन नहीं मिटेगी। कृपा करके आप ये रूपये ले लें।
     सेठ जी ने छोटे भाई से रूपये लिये और अपने इच्छानुसार अनुज बधू , भतीजे व भतीजी में बाँट दिये । सब कार में बैठे, घर पहुँचे।
      पन्द्रह वर्ष बाद उस अर्धरात्रि में जब पूरे परिवार, का मिलन हुआ तो ऐसा लग रहा था कि मानो साक्षात् प्रेम ही शरीर धारण किये वहाँ पहुँच गया हो। सारा परिवार प्रेम के अथाह सागर में मस्त हो रहा था। क्षमा माँगने के बाद उस सेठ जी के दुःख, चिंता, तनाव, भय, निराशारूपी मानसिक रोग जड़ से ही मिट गये और साधना सजीव हो उठी। हमें भी अपने दिल में क्षमा रखनी चाहिए अपने सामने छोटा हो या बडा अपनी गलती हो या ना हो क्षमा मांग लेने से सब झगडे समाप्त हो जाते है।

Saturday, March 29, 2025

डॉक्टर और वैज्ञानिक

अच्छा, मेरा स्टेशन आ गया है, मैं चलता हूँ, ईश्वर ने चाहा तो फिर मुलाकात होगी।इतना कह वो अपना बैग उठा ट्रेन के डिब्बे के दरवाजे तक पहुँच गये। मैं उनका सीट से उठना और दरवाजे की ओर जाना देख रहा था। इतने समय का साथ और उनसे बातचीत का दौर अब अंतिम पड़ाव पर था। रेलगाड़ी की रफ़्तार धीरे-धीरे कम होती गयी और वारंगल स्टेशन का प्लेटफ़ॉर्म आ गया। ट्रेन के रुकते ही उन्होंने मुझे एक बार देखा और एक मधुर मुस्कान के साथ हाथ हिला कर उतर गए। मेरी नज़र उनका पीछा करती रही पर कुछ ही क्षण में वो मेरी आँखों से ओझल हो गए। रेलगाड़ी कुछ समय के पश्चात सीटी बजाने के बाद चलने लगी और फिर उसने गति पकड़ ली।मैं बीते हुए समय के भंवर से बाहर आया और अपने आसपास देखा कुछ नहीं बदला था, बस वो नहीं थे, जो पिछले 9-10 घंटे से मेरे साथ यात्रा कर रहे थे। अचानक मुझे उनके बैठे हुए स्थान से भीनी खुशबू का एक झोंका आता प्रतीत हुआ। मैंने आश्चर्य से एक स्लीपर क्लास रेलगाड़ी के डब्बे में फैली खाने की गंध, टॉयलेट से आती बदबू और सहयात्रियों के पसीने की बदबू की जगह एक भीनी महक से मेरा मन प्रसन्न हो गया। परन्तु मेरे जहन में सवाल ये था कि इस बदबू भरे वातावरण में यह भीनी-भीनी खुशबू कैसे फैली, ये जानने के लिए आपको मेरे साथ दस घंटे पहले के क्षणों में जाना होगा।मैं चेन्नई में कार्यरत था और मेरा पैतृक घर भोपाल में था। अचानक घर से पिताजी का फ़ोन आया कि तुरन्त घर चले आओ, कोई अत्यंत आवश्यक कार्य है। मैं आनन फानन में रेलवे स्टेशन पहुंचा और तत्काल रिजर्वेशन की कोशिश की परन्तु गर्मी की छुट्टियाँ होने के कारणवश एक भी सीट उपलब्ध नहीं थी।
सामने प्लेटफार्म पर ग्रैंड ट्रंक एक्सप्रेस खड़ी थी और उसमें भी बैठने की जगह नहीं थी, परन्तु मरता क्या नहीं करता, घर तो कैसे भी जाना था। बिना कुछ सोचे-समझे सामने खड़े स्लीपर क्लास के डिब्बे में घुस गया। मैंने सोचा इतनी भीड़ में रेलवे टी.टी. कुछ नहीं कहेगा। डिब्बे के अन्दर भी बुरा हाल था। जैसे-तैसे जगह बनाने हेतु एक बर्थ पर एक सज्जन को लेटे देखा तो उनसे याचना करते हुए बैठने के लिए जगह मांग ली। सज्जन मुस्कुराये और उठकर बैठ गए और बोले कोई बात नहीं, आप यहाँ बैठ सकते हैं।
मैं उन्हें धन्यवाद दे, वही कोने में बैठ गया। थोड़ी देर बाद ट्रेन ने स्टेशन छोड़ दिया और रफ़्तार पकड़ ली। कुछ मिनटों में जैसे सभी लोग व्यवस्थित हो गए और सभी को बैठने का स्थान मिल गया, और लोग अपने साथ लाया हुआ खाना खोल कर खाने लगे। पूरे डिब्बे में भोजन की महक भर गयी। मैंने अपने सहयात्री को देखा और सोचा बातचीत का सिलसिला शुरू किया जाये। मैंने कहा मेरा नाम आलोक है और मैं इसरो में वैज्ञानिक हूँ। आज़ जरुरी काम से अचानक मुझे घर जाना था इसलिए स्लीपर क्लास में चढ़ गया, वरना मैं ए.सी. से कम में यात्रा नहीं करता। वो मुस्कुराये और बोले वाह ! तो मेरे साथ एक वैज्ञानिक यात्रा कर रहे हैं। मेरा नाम जगमोहन राव है। मैं वारंगल जा रहा हूँ। उसी के पास एक गाँव में मेरा घर है। मैं अक्सर शनिवार को घर जाता हूँ। इतना कह उन्होंने अपना बैग खोला और उसमें से एक डिब्बा निकाला। वो बोले ये मेरे घर का खाना है, आप लेना पसंद करेंगे।मैंने संकोचवश मना कर दिया और अपने बैग से सैंडविच निकाल कर खाने लगा। जगमोहन राव ये नाम कुछ सुना-सुना और जाना-पहचाना सा लग रहा था, परन्तु इस समय याद नहीं आ रहा था। कुछ देर बाद सभी लोगों ने खाना खा लिया और जैसे तैसे सोने की कोशिश करने लगे। हमारी बर्थ के सामने एक परिवार बैठा था। जिसमें एक पिता, माता और दो बड़े बच्चे थे । उन लोगों ने भी खाना खा कर बिस्तर लगा लिए और सोने लगे। मैं बर्थ के पैताने में उकडू बैठ कर अपने मोबाइल में गेम खेलने लगा। रेलगाड़ी तेज़ रफ़्तार से चल रही थी। अचानक मैंने देखा कि सामने वाली बर्थ पर 55-57 साल के जो सज्जन लेटे थे, वो अपनी बर्थ पर तड़पने लगे और उनके मुंह से झाग निकलने लगा। उनका परिवार भी घबरा कर उठ गया और उन्हें पानी पिलाने लगा, परन्तु वो कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थे।मैंने चिल्ला कर पूछा-- अरे ! कोई डॉक्टर को बुलाओ, इमरजेंसी है।
रात में स्लीपर क्लास के डिब्बे में डॉक्टर कहाँ से मिलता उनके परिवार के लोग उन्हें असहाय अवस्था में देख रोने लगे। तभी मेरे साथ वाले जगमोहन राव नींद से जाग गए। उन्होंने मुझसे पूछा क्या हुआ मैंने उन्हें सब बताया। मेरी बात सुनते ही वो लपक के अपने बर्थ के नीचे से अपना सूटकेस को निकाले और खोलने लगे। सूटकेस खुलते ही मैंने देखा उन्होंने स्टेथेस्कोप निकाला और सामने वाले सज्जन के सीने पर रख कर धड़कने सुनने लगे। एक मिनट बाद उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें दिखने लगीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा और सूटकेस में से एक इंजेक्शन निकाला और सज्जन के सीने में लगा दिया और उनका सीना दबा-दबा कर, मुंह पर अपना रूमाल लगा कर अपने मुंह से सांस देने लगे। कुछ मिनट तक सी.पी.आर. देने के बाद मैंने देखा कि रोगी सहयात्री का तड़फना कम हो गया। जगमोहन राव जी ने अपने सूटकेस में से कुछ और गोलियां निकाली और परिवार के बेटे से बोले बेटा ये बात सुनकर घबराना नहीं। आपके पापा को मेसिव हृदयाघात आया था, पहले उनकी जान को ख़तरा था परन्तु मैंने इंजेक्शन दे दिया है और ये दवाइयां उन्हें दे देना। उनका बेटा आश्चर्य से बोला पर आप कौन हो वो बोले मैं एक डॉक्टर हूँ। मैं इनकी केस हिस्ट्री और दवाइयां लिख देता हूँ, अगले स्टेशन पर उतर कर आप लोग इन्हें अच्छे अस्पताल ले जाइएगा। उन्होंने अपने बैग से एक लेटरपेड निकाला और जैसे ही मैंने उस लेटरपेड का हैडिंग पढ़ा, मेरी याददाश्त वापस आ गयी। उस पर छपा था डॉक्टर जगमोहन राव हृदय रोग विशेषज्ञ, अपोलो अस्पताल चेन्नई। अब तक मुझे भी याद आ गया कि कुछ दिन पूर्व मैं जब अपने पिता को चेकअप के लिए अपोलो हस्पताल ले गया था, वहाँ मैंने डॉक्टर जगमोहन राव के बारे में सुना था। वो अस्पताल के सबसे वरिष्ठ, विशेष प्रतिभाशाली हृदय रोग विशेषज्ञ थे। उनका appointment लेने के लिए महीनों का समय लगता था। मैं आश्चर्य से उन्हें देख रहा था। एक इतना बड़ा डॉक्टर स्लीपर क्लास में यात्रा कर रहा था। और मैं एक छोटा सा तृतीय श्रेणी वैज्ञानिक घमंड से ए.सी. में चलने की बात कर रहा था और ये इतने बड़े आदमी इतने सामान्य ढंग से पेश आ रहे थे। इतने में अगला स्टेशन आ गया और वो हृदयाघात से पीड़ित बुजुर्ग एवं उनका परिवार टी.टी. एवं स्टेशन पर बुलवाई गई मेडिकल मदद से उतर गया।
रेल वापस चलने लगी। मैंने उत्सुकतावश उनसे पूछा-- डॉक्टर साहब ! आप तो आराम से ए.सी. में यात्रा कर सकते थे फिर स्लीपर में क्यूँ , वो मुस्कुराये और बोले मैं जब छोटा था और गाँव में रहता था, तब मैंने देखा था कि रेल में कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता, खासकर दूसरे दर्जे में। इसलिए मैं जब भी घर या कहीं जाता हूँ तो स्लीपर क्लास में ही सफ़र करता हूँ न जाने कब किसे मेरी जरुरत पड़ जाए। मैंने डॉक्टरी मेरे जैसे लोगों की सेवा के लिए ही की थी। हमारी पढ़ाई का क्या फ़ायदा यदि हम किसी के काम न आ पाए।इसके बाद सफ़र उनसे यूं ही बात करते बीतने लगा। सुबह के चार बज गए थे। वारंगल आने वाला था। वो यूं ही मुस्कुरा कर लोगों का दर्द बाँट कर, गुमनाम तरीके से मानव सेवा कर, अपने गाँव की ओर निकल लिए और मैं उनके बैठे हुए स्थान से आती हुई खुशबू का आनंद लेते हुए अपनी बाकी यात्रा पूरी करने लगा। अब मेरी समझ में आया था कि इतनी भीड़ के बावजूद डिब्बे में खुशबू कैसे फैली। ये उन महान व्यक्तित्व और पुण्य आत्मा की खुशब थी जिसने मेरा जीवन और मेरी सोच दोनों को महका दिया।